जनादेश

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एक नदी ,एक भाषा !

अम्बरीश कुमार 

बनगांव में हम इच्छामती नदी के किनारे हैं .यह सरहद की नदी है .कई किलोमीटर तक सीमा बनाती है . यह उनकी भी नदी है और यह हमारी भी नदी है .इस नदी में पद्मा का पानी भी आ जाता है तो हिल्सा भी .ऐसा बताया गया .आज इक्कीस फरवरी का दिन है और हम सरहद से लौट कर इस नदी के किनारे रुक गए .बनगांव के कुछ आगे ही बांग्ला देश की सीमा में भी गए जो आज खुली हुई थी .और जश्न दोनों तरफ मनाया जा रहा था .यह मातृभाषा का जश्न था .इस पार भी बांग्ला भाषी थे तो उसपार भी .एक नदी और एक भाषा .स्कूली बच्चों की भीड़ दोनों तरफ थी जो अपने स्कूल कालेज से इस जश्न में शामिल होने आए थे .किसी भाषा का ऐसा जश्न हम पहली बार देख रहे थे जिसमे सरहद खुली हुई थी और बिना पासपोर्ट कोई भी आ जा सकता था .इसका इतिहास भी बहुत महत्वपूर्ण है .बांग्ला देश जब पूर्वी पकिस्तान था तब वहां की सरकार ने उर्दू को राष्ट्रभाषा बनाने का एलान किया .बांग्ला भाषी नौजवानों ने इसका विरोध किया .वर्ष 1952 में पाकिस्तानी सेना ने उर्दू को राष्ट्रभाषा को बनाए जाने का विरोध कर रहे छात्रों पर गोली चला दी .करीब आधा दर्जन छात्रों की मौत हो गई .मातृभाषा के सवाल पर शहीद हुए इन छात्रों की याद में अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाता है .इस मौके पर दोनों देश की सरहद खोल दी जाती है और लोग एक दूसरे से मिलते हैं ,मिठाई खिलाते हैं .सांस्कृतिक कार्यक्रम होता है .सरहद पर ही .दोनों तरफ पांडाल लगे थे .छोटी बच्चियों से लेकर युवतियां तक अपनी परम्परागत पोशाक में नजर आ रही थी .यह जश्न अपने को हैरान भी कर रहा था .हमने सीमा पर खड़े बीएसएफ जवानो से उधर जाने के बारे में पूछा तो उसने मुस्करा कर कहा ,बिलकुल जाएं .मै सविता और अंबर दूसरे देश यानी बांग्ला देश के भीतर चले गए .भाषा तो समझ में आ नहीं रही थी पर बड़े बड़े होर्डिंग /कट आउट पर रविंद्रनाथ टैगोर और काजी नजरुल इस्लाम को तो पहचान ही सकते थे .टैगोर बांग्ला देश के भी नायक है .उनका गांव भी उधर ही पड़ता है .और बांग्ला देश का राष्ट्रगान ' आमार सोनार बांग्ला ... भी उन्ही का लिखा था . यह बात अलग है कि उसपार तो टैगोर की होर्डिंग और कट आउट तो नजर आ रहे थे पर इस तरफ ऐसा कुछ भी नहीं था .शायद इसलिए भी क्योंकि मातृभाषा की शहादत तो उधर वालों ने दी थी .खैर भाषा का ऐसा रंग बिरंगा उत्सव पहली बार देखा .पर इसकी कोई खबर कोलकोता के किसी भी अखबार में मुझे दूसरे दिन नहीं दिखी . दरअसल हम आए थे ' आपसदारियां ' के बनगांव पड़ाव में शामिल होने के लिए .' आपसदारियां ' मित्र मंडली का मै नया और गैर साहित्यिक सदस्य हूं .यह समूह ऋतू के हिसाब से देश के दूर दराज के हिस्से में मिलता है .इसमें ज्यादातर साहित्यकार हैं तो कुछ फिल्म वाले भी .मकसद गांव ,समाज ,संस्कृति और प्रकृति को करीब से देखना जिससे रचनाकर्म में मदद मिले .इससे पहले मै छतीसगढ़ के चिल्फी घाटी के कार्यक्रम में शामिल हुआ था .यह दूसरा आयोजन था .हालांकि मोबाइल संपर्क कट जाने की वजह से हम सरहद पर नहीं मिल सके .पर बाद में बैठे और अपने अनुभव भी साझा किए . पर इससे पहले कोलकोता के बालीगंज जहां हम ठहरे हुए थे वहां से करीब सौ किलोमीटर बनगांव के इस इच्छामती नदी के घाट पर पहुंचे थे .दोपहर हो गई थी .पर रास्ते भर वर्षा वृक्ष यानी विलायती सिरिस के बड़े बड़े दरख्त सड़क पर धूप को रोके हुए थे .इस दरख्त के बारे में जानकारी दी प्रकृति और विज्ञान के मशहूर लेखक देवेन मेवारी ने .करीब सौ साल के ऐसे दरख्त पहली बार देखे जिसपर छोटे छोटे पौधो ने अपना ठिकाना बना लिया था .यह इस तरफ से चलते हुए देश पार कर गए थे .मेवारी ने बताया कि ये ' रेन ट्री' हैं. इन्हें हिंदी, मराठी, बांगला भाषा में विलायती सिरिस कहा जाता है. मैंने रेन ट्री के खूबसूरत पेड़ कुछ वर्ष पहले होमी भाभा विज्ञान शिक्षण केंद्र, मुंबई के हरे-भरे प्रांगण में देखे थे. इनका वैज्ञानिक नाम ' अलबिज़िया समान ' है.अंग्रेजी में यह ' सिल्क ट्री' भी कहलाता है. इनके फूल गुलाबी-सफेद और रेशमी फुंदनें की तरह होते हैं और बेहद खूबसूरत लगते हैं. इसकी फलियां मीठी और गूदेदार होती हैं जो गिलहरियों तथा बंदरों को बहुत पसंद हैं. इसलिए इस पेड़ को मंकी पौड भी कहा जाता है.खास बात यह है कि भारत में इसे सौ साल से भी पहले अंग्रेज लाए. यह मूल रूप से मध्य अमेरिका और वेस्टइंडीज का निवासी है. हमारे यहां की आबोहवा इसे खूब पसंद आई और यह देश भर में पनप गया. एक और खासियत यह है कि रेन ट्री दूसरे बड़े छायादार पेड़ों के विपरीत एक दलहनी पेड़ है. इसे मटर का बिरादर कह सकते हैं. इसका मतलब यह है कि इस पेड़ की जड़ों में गांठें होती हैं जिनमें वे बैक्टीरिया रहते हैं जो हवा से नाइट्रोजन लेकर इसे भी देते हैं और जमीन को उपजाऊ भी बनाते हैं. जो भी बांग्ला देश को जाती इस सड़क पर गए होंगे उन्हें इतनी जानकारी इस दरख्त के बारे में शायद ही होगी .इसके अलावा जगह जगह ताल तालाब के किनारे केला ,नारियल और सुपारी के लम्बे दरख्त भी दिखे . इच्छामती नदी के दोनों किनारे भी नारियल लहरा रहे थे .नदी का हरा पानी ठाहर हुआ था और किनारे पर जलकुम्भी का अतिक्रमण बढ़ता नजर आ रहा था .बीच धार में एक नाव अकेली थी .न कोई चप्पू न कोई मछुवारा .नदी तो अब बदहाल होती जा रही है .बनगांव के लोग ही इसकी बदहाली के जिम्मेदार है .उधर बांग्ला देश वाले भी इस काम में बराबर के हिस्सेदार हैं .यही तो वह नदी है जिसके बारे में रविंद्रनाथ टैगोर ने लिखा था ,' बारिशों का मौसम है.और मैं नाव पर इस छोटी से नदी इच्छामति से उस पार जा रहा हूं . इसके दोनों किनारों पर गांवों की कतारें हैं .गन्ना,बेंत और पटुवाके पौधे सभी जगह उग आयें हैं .ऐसा लगता है किसी कविता का छंद बार बार दोहराया जा रहा है .और इस वक्त उसका मजा भी लिया जा सकता है .पद्मा जैसे विशाल नदी का छंद याद करना मुश्किल है .लेकिन इस छोटी सी नदी की बलखाती चाल जो बारिश से घटती है और बढ़ती है, एक न भूलने वाला छंद के जैसा ही है. (संदर्भ - टैगोर की चिट्ठियां : पाबना के रास्ते ). नदी के किनारे कुछ देर रहे फिर शहर की तरफ बढे .बांग्ला देश की तरफ से बनगांव की तरफ चलेंगे तो इच्छामती नदी पर बना पुल पार करते ही शहर शुरू हो जाता है .कुछ आगे बढ़ने पर एक रास्ता बाएं घूम जाता है .हम इसी रास्ते पर चल पड़े .हम बनगांव जंक्शन जा रहे थे .यह बांग्ला देश से पहले भारत का प्रमुख स्टेशन है .इसके बाद पेट्रोपोल पड़ता हैं जहां पासपोर्ट /वीजा की औपचारिकता पूरी की जाती है .यह स्टेशन हमें सीमा पर दिखा भी था .पर बनगांव बड़ा स्टेशन है इसलिए इधर आए .दो पटरियों वाले स्टेशन पर लोग कोलकता की तरफ जाने के लिए आते हैं तो बांग्ला देश की तरफ जाने के लिए भी .हालांकि यह देश के अन्य स्टेशन की तरह ही मामूली सा स्टेशन लगा जिसके प्रवेश का रास्ता काफी संक्रा था .स्टेशन पर न तो कोई ट्रेन खड़ी थी न किसी ट्रेन के आने का समय हो रहा था .इसलिए भीड़ भी नहीं थी .प्लेटफार्म नंबर एक पर कुछ देर गुजारने के बाद हम लौट आए .ड्राइवर का कहना था कि शाम से पहले अगर कोलकता से करीब नहीं पहुंचे तो अंधेरा होते ही समस्या हो जाएगी .उसे रात में सामने से गाड़ियों की रौशनी से दिक्कत होती है .बनगांव कोलकता का रास्ता भी काफी पुराना और संकरा है .ट्रैफिक दिन में बढ़ जाता है इसलिए रफ़्तार भी कम रखनी पड़ती है . फिर विलायती सिरिस के बड़े दरख्त से घिरी सड़क पर लौट आए . भारत बांग्ला देश सीमा पर गांव एक जैसे ही हैं .चाहे इस पार हो या उस पार .खान पान ,भाषा और संस्कृति सब एक जैसे .ज्यादातर गांव के कुछ घर के आगे ताल तालाब जरुर मिला .ताल के किनारे नारियल ,सुपारी और केले के साथ ताड़ भी .तालाब से पानी भी ये लेते हैं तो मछली भी .कई जगह धान के खेत से घिरे ताल देखते बनते थे .आज सड़क पर भी कुछ ज्यादा ही ट्रैफिक था .वजह भाषा दिवस के चलते बहुत से लोग सीमा पर होने वाले कार्यक्रम में जा रहे थे या लौट रहे थे .इनमे स्कूल कालेज के बच्चों की संख्या ज्यादा थी .सजी संवरी बच्चियां और युवतियां शायद सांस्कृतिक कार्यक्रम में हिस्सा लेने आई थी .दरअसल सीमा पर दोनों और ही सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहे थे .भारतीय सीमा से पहले कुछ लड़कों ने गाडी रोकी और कहां कि इधर ही पार्किंग में गाडी खड़ी कर दे आगे जाने नहीं मिलेगा .बात सही निकली .सड़क पर काफी भीड़ थी .सीमा पर कुछ दूकानों पर टूटी फूटी हिंदी भी मिली .खास बात यह थी कि करेंसी दोनों देशों की चल रही थी .जो भी सामान लेना चाहा तो कीमत टका में बताई गई .बाद में पता चला यह बांग्ला देश की करेंसी की बात कर रहा है .भारतीय मुद्रा भारी थी टका पर .नेपाल की तरह .सीमा पर हो रहे सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बारे में सोच रहा था तभी ड्राइवर ने कहा ,साहब यहां चाय पी लेते हैं .कोई छोटा सा क़स्बा था .मिटटी के छोटे छोटे कुल्हड़ देखा तो कार से उतर आया और बिना चीनी की चाय के लिए बोला .खाने के लिए मुरी यानी चटपटी लाई के पैकेट थे .बहुत अच्छी चाय वह भी खूबसूरत से छोटे कुल्हड़ में मिली .आमतौर पर अब प्लास्टिक के छोटे से कप में चाय पकड़ा दी जाती है .इसलिए अच्छा लगा . कोलकता हवाई अड्डे से पहले ही हमने ड्राइवर से कहा कि हमें हुगली किनारे दक्षिणेश्वर के काली मंदिर जाना है .इस मंदिर में १८५६ में रामकृष्ण परमहंस को पुरोहित के तौर पर नियुक्त किया गया. विशाल मंदिर परिसर के मध्य भाग में काली मंदिर में दर्शन करने वालों की लाइन लगी हुई थी .परिसर में और तो बहुत सी फोटो थी पर शहीद भगत सिंह की फोटो ने जरुर ध्यान आकर्षित किया .मंदिर परिसर हुगली यानी गंगा नदी से लगा हुआ है .हुगली के किनारे कुछ देर बैठे तो अच्छा लगा .अब लौटना था .भूख भी लग रही थी .दरअसल सुबह जो भारी नाश्ता किया था उसके बाद से कही खाने की ढंग की जगह नहीं दिखी .हम बालीगंज के सनी एपार्टमेंट स्थित एक गेस्ट हाउस में ठाहरे हुए थे .वहा सुविशा तो सब तरह की थी .लेकिन सामने सड़क पार करते ही हल्दी राम का पांच मंजिला रेस्तरां था इसलिए वही नाश्ता करने चले जाते थे.इससे पहली रात जो सिटी माल के पास ' शोला (सोलह ) आना बंगाली ' में बंगाली भोजन करने गए ठेव .इसके बारे में जनसत्ता के अपने सहयोगी पत्रकार प्रभाकर मणि तिवारी ने बताया था .दरअसल अपने को हिल्सा यानी इलिश का स्वाद लेना था इसलिए गए .सविता तो शुद्ध शाकाहारी है इसलिए उनके लिए पोस्तो आलू से लेकर बैगन भाजा तक मंगाया .पर मैंने अपने और अंबर के लिए इलिश के साथ चिंगरी यानी झींगा चावल का आर्डर दिया था .अच्चा रेस्तरां है.पर सभी को इसका स्वाद पसंद आए यह जरुरी नहीं .आज दूसरी जगह जाना था इसलिए जल्दी बालीगंज पहुंचना चाहता था .

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