प्रेमचंद को कैसे देखें ?

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प्रेमचंद को कैसे देखें ?

प्रेमकुमार मणि

किसी भी लेखक की रचना का मूल्यांकन उसके समय -काल और परिस्थितियों के सापेक्ष होना चाहिए . उसी जमीन से उसकी इतिहास -दृष्टि की भी समीक्षा होनी चाहिए . कबीर या शेक्सपियर ,या ग़ालिब को हम उनके ज़माने में रख कर देखते हैं . हमारी दृष्टि आज की होती है . जब हम अपनी आधुनिकता के बहुत करीब उन्हें देखते हैं ,तो आश्चर्यचकित होते हैं . इसी तरह हम प्रेमचंद को पढ़ आश्चर्यचकित होते हैं कि वह हमारी सोच के कितने करीब हैं .


नयी परिस्थितियों में प्रेमचंद का एकबार फिर से मूल्यांकन होना चाहिए . जब मैं पुनर्मूल्यांकन की बात कर रहा हूँ ,तब यह नकारात्मक अर्थों में नहीं ,सकारात्मक अर्थों में कह रहा हूँ . प्रेमचंद को अभी पूरी तरह नहीं समझा गया है . आज की अनेक समस्याओं के जवाब उनके लेखन में मौजूद है ,हमें उन्हें रेखांकित करने हैं . जोतिबा फुले और आम्बेडकर के महत्व को समझने में हमे वक़्त लगा ,प्रेमचंद को भी हमें अभी अच्छी तरह समझना है . . हालांकि उनकी लोकप्रियता कम नहीं है ,लेकिन वह अपने समय से बहुत आगे थे . उनकी कहानियों और उपन्यासों के पुनर्पाठ की जरुरत तो है ही ,उनके सम्पादकीय आलेखों में उनके विचारों को भी हमे देखना -समझना चाहिए .


अपने समय में उन्हें साहित्य की दुनिया बनानी थी . वह उर्दू में लिखते थे , हिंदी में बाद में आये . वह उन लेखकों में थे ,जो हिंदी -उर्दू को अलग नहीं मानते थे . राष्ट्रीयता की मांग थी कि हिंदी राष्ट्र की जुबान बने . पेंच लिपि को लेकर था . एक खास तबके का जोर नागरी लिपि पर अधिक था, इसका कारण इस लिपि की देसी पृष्ठभूमि और इतिहास था . हमारे यहां हिंदी प्रचारिणी सभाएं नहीं बनी, नागरी प्रचारिणी सभाएं बनी . प्रेमचंद ने भी नागरी को अपनाया और हिंदी के लेखक हो गए . अपने वक़्त के तिलस्मी और दरबारी साहित्यिक माहौल को उन्होंने आमजन से प्रगल्भ किया ,उसका जनतंत्रीकरण किया . हिंदी कथा साहित्य को किसानों -मजदूरों की पीड़ा से जोड़ा . आम्बेडकर के चवदार जल आंदोलन के पूर्व ही उन्होंने 'ठाकुर का कुआँ ' कहानी लिखी . हामिद के दिल की धड़कन ( ईदगाह ) को वही समझ सकते थे . होरी जैसा किसान उनके उपन्यास का नायक बनता है . प्रेमचंद ही हैं जो दलितों द्वारा ब्राह्मणों के मुंह में हड्डी डलवाने जैसा 'कूड़ा -कर्म ' कर सकते हैं .


जैसा कि मैंने पहले कहा ,एक कथालेखक के अलावे विचारक के रूप में भी वह मुझे प्रौढ़ दिखते हैं . टैगोर केअलावे और कोई भारतीय लेखक इस रूप में उनका मुकाबला नहीं कर सकता . उनकी एक सुसंगत विचारधारा है ,जिस पर व्यवस्थित कार्य अब तक नहीं हुआ है . वाणी प्रकाशन ने तीन खण्डों में उनके सम्पादकीय लेखों और टिप्पणियों को संकलित -प्रकाशित किया है . उसे पलटते हुए मेरे मन में यह विचार आया कि इस विषय पर लिखूंगा . उस लेख के लिए पुस्तकों के विहंगावलोकन के क्रम में अमृत राय द्वारा लिखित ' प्रेमचंद -कलम का सिपाही ' देखते हुए कुछ दिलचस्प तथ्य मिले . प्रेमचंद की कोई मुलाकात टैगोर से नहीं हो सकी . बनारसीदास चतुर्वेदी , हज़ारीप्रसाद द्विवेदी और कुछ अन्य लोगों ने इस दिशा में कई प्रयास किये ,लेकिन यह सम्भव न हुआ . अगस्त 1935 में चतुर्वेदीजी ने कलकत्ते में तुलसी जयंती के आयोजन की योजना बनाई और अध्यक्षता करने के लिए प्रेमचंद को आमंत्रित किया . इस समारोह में रवि बाबू को भी बुलाने की बात थी . प्रेमचंद ने टालते हुए लिखा -' जहाँ तक तुलसी जयंती की बात है ,मैं इस काम केलिए सबसे कम योग्य हूँ . एक ऐसे समारोह का सभापतित्व करना जिसमे मुझे कभी कोई रूचि नहीं रही .बिलकुल मज़ाक की बात होगी . मुझे बड़ा डर लगता है . सच तो यह है कि मैंने उनकी रामायण आद्योपांत पढ़ी भी नहीं है . '


कुछ समय बाद 17 अगस्त 1935 का एक पत्र - " मैं वहां पहुंचा नहीं .इसके लिए आप मुझे भला -बुरा मत कहिएगा . आपने अगर तुलसी जयंती की कैद मेरे ऊपर न लगाई होती तो मैं आ जाता . लेकिन तुलसी जयंती का सभापतित्व एक ऐसा व्यक्ति करे जिसने कभी तुलसी का अध्ययन नहीं किया और जो उनके नाम के साथ जुडी हुई अतिमानव बातों में विश्वास नहीं करता ,यह बात मुझे हास्यास्पद जान पड़ती है . उन्होंने राम का दर्शन किया ,हनुमान का दर्शन किया ,वह बन्दर वाली घटना सब ऊलजलूल बातें हैं . लेकिन तुलसी -भक्त लोग क्या मेरी यह नास्तिकताभरी बातें पसंद करेंगे . इससे क्या आता जाता है कि उनका जन्म विक्रम सम्वत १० में हुआ २० में या ४० में ? बुद्धि का इतना अपव्यय क्यों जब इतना कुछ करने को है ? वह महान कवि थे , उनकी व्याख्या करो , लेकिन उन्हें भगवान क्यों बनाते हो ? '


कुछ समय बाद उन्होंने फिर बुलावा भेजा . जापानी कवि नोगुची शांतिनिकेतन आये हुए थे . गुरुदेव ने भी इच्छा की थी . 9 सितम्बर 1935 को जैनेन्द्र को इस बारे में लिखा - ' चतुर्वेदी जी ने कलकत्ते बुलाया था कि आकर जापानी कवि नोगुची का भाषण सुन जाओ . नोगुची हिन्दू यूनिवर्सिटी आये ,उनका व्याख्यान भी हो गया ,मगर मैं न जा सका . अक्ल की बात सुनते और पढ़ते उम्र बीत गई . ईश्वर पर विश्वास नहीं आता ,कैसे श्रद्धा होती . तुम आस्तिकता की ओर जा रहे हो ,जा नहीं रहे बल्कि पक्के भगत बन रहे हो ,मैं संदेह से पक्का नास्तिक होता जा रहा हूँ .'


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उन्नीस सौ तीस का दशक भारतीय इतिहास का बेहद कोलाहल भरा दशक था . राष्ट्रीय आन्दोलन जोर पर था . जाने कितनी घटनाएं नितप्रति दिन घट रही थीं . यही समय था जब प्रेमचंद ने सारे खतरे लेकर पत्रिकाएं निकालीं . उनकी सम्पादकीय टिप्पणियां सामाजिक -राजनीतिक विषयों पर अधिक होती थीं ,साहित्यिक विषयों पर कम . 1932 में दलितों के प्रश्न को लेकर जब गाँधी ने अनशन किया तब प्रेमचंद ने इसे गंभीरता से लिया . दलित समस्या की गंभीरता को लेकर कई लेख लिखे . वर्णवाद -पुरोहितवाद की खुलकर धज्जियाँ उड़ाई . ब्रुसेल्स जाकर नेहरू ने जो सन्देश दिया था ,प्रेमचंद ने उसकी सराहना की . युद्ध और राष्ट्रवाद विरोधी एक अंतर्राष्ट्रीय अपील जिस पर जवाहरलाल नेहरू , रवीन्द्रनाथ टैगोर आदि के हस्ताक्षर थे ,उनसे भी हस्ताक्षर लिए गए . उन्होंने कांग्रेस में उभर रहे समाजवादी आवेगों को रेखांकित किया . प्रगतिशील लेखक संघ के स्थापना सम्मेलन में ऐतिहासिक भाषण दिया . जीवन की आखिरी साँस तक चेतना संपन्न बने रहे .

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बहुत समय पहले प्रेमचंद के गांव लमही गया था ,जो बनारस से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर स्थित है . प्रेमचंद का दोमंजिला पक्का घर ,जिसे उन्होंने स्वयं बनवाया था , जीर्ण -शीर्ण हो गया था . वहां कोई रहता नहीं था . गौर करने वाली चीज घर से जुड़ा हुआ पक्का कुआँ था ,जो आधा घर के भीतर था ,आधा बाहर . अर्थात कुँए के बीच एक दीवार थी . पता हुआ ,प्रेमचंद ने इस कुँए से सबको,खास कर दलितों को , पानी लेने केलिए ऐसा किया था ,अन्यथा वह पूरा कुआँ अपने आंगन में कर सकते थे . उनके घर के आसपास दलित और महतो किसान थे . प्रेमचंद बनारस में भी घर बनवा सकते थे . लेकिन गाँव को उन्होंने रहने केलिए चुना . इससे उन की रूचि को समझा जा सकता है .प्रेमकुमार मणि की फेसबुक वाल से साभार 

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