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पार्टी में घमासान पर तेजस्वी यादव हवा में

फज़ल इमाम मल्लिक

पटना .बिहार में सियासी बिसात बिछ गई है. दलों में तोड़फोड़ की कवायद जारी है और वोटरों को लुभाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिहार रेजिमेंट की याद करते हैं बिहार के स्वाभिमान को ललकारते हैं. मजदूरों, गरीबों, छात्रों और बेरोजगारी के मुद्दे से भटकाने के लिए सत्ता लगातार कोशिश कर रही है. तरह-तरह के लुभावने नारे उछाल रही है और पंद्रह साल बनाम पंद्रह साल का नारा तो दे रही है लेकिन वह यह भूल गई है कि उसके दामन पर मुजफ्फरपुर शेल्टर होम कांड से लेकर सृजन घोटाला व मोबाइल घोटाले जैसे दाग हैं और मुद्दा नीतीश कुमार का पंद्रह साल ही रहेगा. रोजगार,शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर चुनाव होगा.

 

राष्ट्रीय जनता दल बाहरी और भीतरी दोनों तरह के खतरों से जूझ रहा है. घर के अंदर टूट मची है. पांच एमएलसी पार्टी छोड़ कर जदयू के हो गए. लेकिन बड़ा झटका पार्टी के वरिष्ठ नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने दिया. उन्होंने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया. सवाल यह है कि राजद अपने अंतरकलह से जूझ रहा है या पार्टी अपने अहंकार और तेजस्वी यादव के नेतृत्व की अपरिपक्वता की वजह से बिखर रही है. पार्टी में बिखराव है. तेजस्वी यादव जमीन की बजाय सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं लेकिन पार्टी के शीर्ष नेताओं का दंभ और ऐंठ-अकड़ ने पार्टी के अंदर ही कई खेमे बना डाले हैं. फिर महागठबंधन को लेकर राजद का रवैया और भी हैरानी भरा है. जाहिर है कि महागठबंधन के दल राजद के रवैये से हैरान भी हैं और अपमानित भी महसूस कर रहे हैं. 

राजद के पांच विधान पार्षदों ने दल बदलकर लालू प्रसाद के नए नेतृत्व यानी तेजस्वी यादव को झटका दिया है. लेकिन सबसे ज्यादा चोट तो रघुवंश प्रसाद सिंह के तेवर पहुंचाई. रघुवंश प्रसाद सिंह पूर्व सांसद रामा सिंह के राजद में लाने के कारण नाराज हैं. उन्होंने पार्टी को पहले ही बता दिया दिया था कि या तो राजद में रघुवंश प्रसाद रहेंगे या रामा सिंह रहेंगे. लोकसभा के 2014 के चुनाव में रघुवंश सिंह को रामा सिंह ने ही हराया था.चुनाव से पहले लगातार लगे झटकों से संभलना तेजस्वी यादव के लिए कड़ी चुनौती होगी. पार्टी में भगदड़ से कार्यकर्ताओं के मनोबल पर भी असर पड़ सकता है. फिलहाल राजद के पांच विधान पार्षदों के पार्टी छोड़ने की वजहों की समीक्षा की जा रही है. संजय प्रसाद, कमर आलम, राधा चरण सेठ, रणविजय सिंह और दिलीप राय ने पाला क्यों बदला, यह बड़ा सवाल है.


रामा सिंह के राजद में आने की चर्चा भर से बुरी तरह खफा पूर्व केंद्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह ने पार्टी के उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा तो दिया ही, साथ ही पहली बार लालू परिवार के खिलाफ कड़ी टिप्पणी भी की. राजद में टूट की खबर सुनने के बाद उनका गुस्सा फूटा. उन्होंने कहा कि पार्टी को नरक बना दिया है. मैंने हर संकट में लालू प्रसाद का साथ दिया. लेकिन पैसे लेकर टिकट बेचना बर्दाश्त नहीं. पार्टी के लिए समर्पित कार्यकर्ताओं की उपेक्षा सहन नहीं हो रही है. पटना एम्स में कोरोना का इलाज करा रहे रघुवंश ने कहा कि कहने को तो बहुत कुछ है. लेकिन स्वस्थ होने दीजिए फिर बात करते हैं.


वैसे चुनाव नजदीक आते-आते इस तरह का आना-जाना लगा रहेगा. राजद की चुनौती अपने विधायकों को संभालना है. कई विधायक राजद नेतृत्व और तेजस्वी यादव व पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह के कामकाज के तरीके से नाराज बताए जाते हैं.


फिर चुनौती महागठबंधन को भी एक रखने की है. हालांकि फिलहाल राजद का रवैया सहयोगियों के साथ तो ठीक नहीं ही दिखा. एक क्षेत्रीय चैनल के कार्यक्रम में भी तेजस्वी ने सहयोगियों के सवाल पर जिस तरह की प्रतिक्रिया दी उससे राजद का अहंकरा ही झलकता है. हालांकि राष्ट्रीय लोक समता पार्टी ने तो चैनल के चुनावी चर्चा में इस बात का उल्लेख किया कि चुनाव रोजगार और पलायन जैसे मुद्दों पर ही होगा. पार्टी प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने बहुत साफगोई से रोजगार और पलायन का मुद्दा उठा कर नीतीश कुमार की घेरेबंदी की. पक्ष-विपक्ष ने चुनावी चर्चा में हिस्सा लिया. राजद नेता तेजस्वी यादव भी थे तो हम के जीतनराम मांझी भी. तेजस्वी थोड़ा तल्ख दिखे. सहयोगियों को लेकर उनकी खीझ सामने आई. गठबंधन के लिए इसे ठीक नहीं कहा जा सकता. हो सकता है पार्टी में चल रही उठापटक इस खीझ की वजह रही हो. हालांकि इस बीच जीतनराम मांझी दिल्ली में कांग्रेस नेताओं से मिल कर दिल का दर्द बयान किया है. माना जा रहा है कि जल्द ही वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए सहयोगी दलों की बैठक होगी. मांझी समन्वय समिति की मांग पर अड़े हैं.वैसे चुनाव नजदीक आते-आते इस तरह का आना-जाना लगा रहेगा. राजद की चुनौती अपने विधायकों को संभालना है. कई विधायक राजद नेतृत्व और तेजस्वी यादव व पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह के कामकाज के तरीके से नाराज बताए जाते हैं.यह सब तो होता ही रहता है और होता ही रहेगा. लेकिन राजद को भी अपने व्यवहार में लचक लानी होगी. सहयोगियों के साथ चलना है तो सहयोगियों को राजद का कार्यकर्ता समझने से परहेज करना होगा. 


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