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रन टू द मून यानी चांद तक दौड़ और जुगाड़ फंड का

  फज़ल इमाम मल्लिक   

नई दिल्ली .सालों पहले कैफ भोपाली ने लिखा था चलो दिलदार चलो, चांद के पार चलो. पाकीज़ा फिल्म का यह गीत काफी गुनगुनाया गया. आज भी इस गीत के कद्रदान कम नहीं हैं. कोरोना काल में खेलों की दुनिया से एक ख़बर आई तो अचानक यह गीत फिर से जेहन के दरीचों से झांकने लगा. कोरोना की वजह से खेल के मैदान भी सूने-सूने हैं और स्टेडियम वीरान. हालांकि कोरोना ने खेलों का अंदाज भी बदला. आनलाइन कई तरह की प्रतियोगिताएं हुईं लेकिन लोकप्रियता न के बराबर. अब एक नई तरह की दौड़ का आयोजन किया गया और नाम रखा गया रन टू द मून.

कोरोना महामारी के दौरान मुश्किलों से घिरे कोचों और सपोर्ट स्टाफ की मदद के लिए फंड जुटाने के लिए आईडीबीआई फेडरल लाइफ इंश्योरेंस और एनईबी स्पोटर्स की एक पहल पर पंद्रह देशों के चौदह हजार से अधिक धावकों ने इसमें हिस्सा लेने की ख्वाहिश जताई है. इस पहल के तहत आईडीबीआई फेडरल लाइफ इंश्योरेंस और एनईबी स्पोटर्स एक अलग तरह के दौड़ का आयोजन करने जा रहे हैं. इस पहल में भारतीय बैडमिंटन टीम के मुख्य कोच पुलेला गोपीचंद, अर्जुन अवार्डी अश्विनी नचप्पा और मालथी होला का साथ मिला है. इस रन को ‘रन टू द मून’ नाम दिया गया है और इसका आयोजन 21 जुलाई को इंसान के चांद पर पहुंचने की 51वीं सालगिरह पर आयोजित की जानी है.


इस रेस के आयोजन दुनिया भर में लगभग एक साथ होगा. इस तरह इस रेस के तहत प्रतिभागी 3.84 लाख किलोमीटर की दूरी तय करेंगे. यह दूरी धऱती और चांद के बीच की दूरी के बराबर है. द्रोणाचार्य गोपीचंद का मानना है कि मौजूदा संकट ने कोच और स्पोटर्स सटाफ को प्रभावित किया है. मैं रन टू द मून के सभी प्रतिभागियों का धन्यवाद करना चाहता हूं. आईडीबीआई फेडरल लाइफ इंश्योरेंस के सीईओ वग्नेश साहाने ने कहा कि रन टू द मून को लेकर लोगों में गजब का उत्साह है और हम इससे काफी खुश हैं. दुनिया भर के लोगों का इस रेस में हिस्सा लेना अद्भुत संयोग है और हम इसे लेकर काफी उत्साहित हैं. रणजी ट्राफी खेल चुके साहाने ने कहा कि इस रेस से होने वाली आय से कोचों और सपोर्ट स्टाफ की मदद की जाएगी.

एनईबी के प्रमुख नागराज अडीगा का कहना है कि  रन टू द मून के जरिए हम धावकों की एक एसी कम्यूनिटी बनाना चाहते हैं, जो इस एतिहासिक पल का हिस्सा बनना चाहते हैं. हम सभी धावकों से अनुरोध करते हैं कि वे अपनी सीमाओं से परे जाएं और अपने रनिंग गोल्स के प्रति कमिटेड रहें. इससे हमें 3.84 लाख की दूरी तय करने में मदद मिलेगी. इस रेस के लिए पंजीकरण भारत के 945 शहरों से प्राप्त हुए हैं और इनमें से मुंबई, बंगलुरू और दिल्ली के सबसे अधिक धावक हैं. इनमें दस साल की मुंबई निवासी रिशोन फर्नांडीज सबसे कम उमर के धावक हैं जबकि बंगलुरू के 87 साल के जी लक्ष्मन सबसे वयोवृद्ध धावक हैं. इस रेस में भारत के अलावा आस्ट्रेलिया, अमेरिका, ब्रिटेन, बहरीन, फिनलैंड, आयरलैंड, जापान, जार्डन, मलेशिया, नीदरलैंड्स, संयुक्त अरब अमीरात , बांग्लादेश और ईरान के धावकों ने हिस्सा लेने की पुष्टि की है.


प्रतिभागियों की ओर से चौदह लाख रुपये का अनुदान दिया जा चुका है. यह रकम गोपीचंद बैडमिंटन अकादमी, अश्विनी स्पोटर्स फाउंडेशन और मालथी होलाज मारथू फाउंडेशन को दिया जा चुका है. ये लोग उन कोच और सहयोगी स्टाफ की पहचान करेंगे, जिन्हें आर्थिक मदद की जरूरत है.

पंजीकृत धावक जहां हैं वहां से दौड़ सकते हैं. इन धावकों को हर दिन दौड़ने की जरूरत नहीं है. ये एक महीने के भीतर अगर 65 किलोमीटर की दूरी तय करते हैं तो उनकी इंट्री मान्य रहेगी. एक दिन में हालांकि एक धावक को कम से कम ढाई किलोमीटर जरूर दौडऩा है और एक दिन में अधिकतम दस किलोमीटर ही दौड़ना है. इससे ही उनकी योग्यता बनी रहेगी. डेली डिस्टेंस रन को लाइव डैशबोर्ड के जरिए ट्रैक किया जाएगा. यह डैशबोर्ड एनईबी स्पोटर्स वेबसाइट पर है. रेस के दौरान धावकों को केंद्र और राज्य सरकारों के तय लाकडाउन नियमों का पालन करना होगा और इस दौरान सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखने के साथ-साथ मास्क लगाना होगा.


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