सुमेर सिंह का वह रहस्मय किला

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सुमेर सिंह का वह रहस्मय किला

अंबरीश कुमार

यह डाक बंगला था पर ऐसा कहीं से लगता तो नहीं था .यह तो एक प्राचीन किला था .पता नहीं आप किसी सात साल से ज्यादा पुराने किले में कभी रुके हैं या नहीं .पर हमारा यह पहला अनुभव था .यह किला इटावा के आखिरी राजा सुमेर सिंह का था .जिसमें हम दोपहर में पहुंचे थे और दूसरे दिन भी रहे. तब लिख नही पाया .कल से लगातार हो रही बारिश के बीच आज समय मिला तो लिखने बैठा हूँ .प्राचीन महल जो होटल में तब्दील हो चुके है उनमे कई बार रुकना हुआ पर वह अंततः  होटल की तरह ही महसूस हुआ .इस किले में डाक बंगले जैसा अनुभव हुआ जो कभी बैतूल के डाक बंगले में हुआ था या फिर छतीसगढ के उद्यंती वन्य जीव अभ्यारण्य के तौरंगा के डाक बंगले में हुआ था जो अटल बिहारी वाजपेयी को पसंद आता था .

सुमेर सिंह यह किला इटावा में यमुना के किनारे एक छोटी सी पहाड़ी पर बना है जिसका रास्ता पहाड़ों की तरह घुमावदार है और चढाई भी ठीकठाक है .किले को कुछ साल पहले ही एक आलीशान अतिथिगृह में बदला गया है और यह जंगलात विभाग के अधीन है पर नियंत्रण कलेक्टर करता है .पत्रकार दिनेश शाक्य जो पर्यावरण पर जमकर लिखते है वे हमें सीधे इस किले में ले गए .उत्तर प्रदेश में अब जंगल और जमीन के सवाल पर जिलों में कुछ ही पत्रकार लिखते है इनमे वे भी शामिल है .किले का भव्य और भारी भरकम दरवाजा नया बना है पर पुरानी डिजाइन है जिसके दोनों तरफ द्वारपाल की प्रतिमा लगी है .गाड़ी जाने के लिए पूरा दरवाजा खुला अंदर खूबसूरत सा बगीचा नजर आया जो ठीक पोर्टिको के सामने था .भीतर से भी नजारा एक भव्य किले जैसा ही था .सीढियां चढ कर भीतर गए तो यह किसी चमचमाते होटल जैसा नजर आया पर सन्नाटा छाया था .कुछ दूर चलने के बाद बुर्ज पर जाती सीधी से ऊपर पहुंचे तो लंबा कारीडोर नजर आया और सामने ही चार नंबर का सूट था जिसमे रुकना था .भीतर जाते ही सामने बैठक नजर आई जिसमे आलीशान सोफा और मेज नाश्ते के साथ सजी हुई थी .इसी से एक गैलरी भीतर जाती थी जिसमे बड़ा सा बेड रूम , ड्रेसिंग रूम और फिर बाथरूम आदि था .बेडरूम से लगी बालकनी से उफनती हुई यमुना दिख रही थी .सविता आराम करने गई तो हम दिनेश और उनके सहयोगियों के साथ इस किले के बारे में बात करने लगे .सात सौ साल पुराना किला .तुगलक से लेकर जहांगीर तक किसी न किसी रूप में जुड़े रहे .ज्यादातर तो हमलावर थे .पर यह किला उन्हें आकर्षित करता था .एक तरफ यमुना तो दूसरी तरफ बीहड़ .ये तो आज भी हैं .ऐसे में किसी बरसात में इस किले में कुछ समय गुजारना चाहिए .

रात नींद कई बार टूटी .बिजली भी एक वजह थी .पर एक सुनसान किले में आप अकेले हों यह भी अहसास तो था ही  .दरअसल मुख्य इमारत जिसमें हम थे वह रात में खाली ही था .स्टाफ चला गया था ,दूसरे भवन में .खैर सुबह बहुत सुखद थी .सामने यमुना थी .नीचे टहलने भी निकले .चाय पी तभी जंगलात विभाग के एक अफसर भी आ गए जो चंबल नदी के बारे में बताने लगे .कुछ देर बाद सभी चले गए और तय हुआ कि चार बजे पचनदा की तरफ चला जाएगा .कुछ देर बाद ही बिजली चली गई तो मैंने कार्यक्रम में फेरबदल करते हुए जल्दी निकलने का मन बनाया .और यह ठीक भी रहा .बीहड़ से गुजरती चंबल नदी की खूबसूरती देखते बनती थी .जंगलात विभाग के वाच टावर से नजारा देखा और फोटो भी खींची .आगे बढे तो करीब घंटे भर बाद एक छोटे कस्बे में आगे की गाडी रुकी और दिनेश उतर कर आए और कहा - भाई साहब यहां साबुत मूंग के मुंगोड़े बहुत अच्छे बनते है .हमने कहा चाय के साथ ख्य जा सकता है .पता चला आगरा और इटावा से लोग इसे खाने आते है .दिनभर में पचास किलों मूंग के पकौड़े बनाकर वह चला जाता है .बहुत ही स्वादिष्ट पकौड़े जिसमे साबुत लहसुन और हींग का स्वाद भारी था .बहरहाल पचनदा तक गए और लौटे तो रात हो चुकी थी और हम कमरे में पहुंचे तो बाकी लोग नजर नहीं आए .रिसेप्शन से पूछा तो बताया कि खाना बनवा रहे है .

नहाने के बाद हम यमुना को देखने सामने की बालकनी में आए फिर गरमी की वजह से ड्राइंग रूम में ही बैठ गए .भीतर का एसी ठीक से काम नहीं कर रहा था इसलिए नीचे के कमरे में शिफ्ट हो गए .कुछ देर बाद खाना हो गया तो सभी लोग चले गए .यह बताया कि सुमेर सिंह का दूसरा महल जो कुछ दूरी पर है वह उनके सामंती शौक का गवाह भी रहा है और वे नृत्य के भी बहुत शौकीन रहे थे .और जैसा कि हर महल और किले की कहानियां प्रचलित होती है इनके बारे में भी थी .कहा जाता है गांव वालों को आज भी महल के पास घुंघरू की आवाज सुनाई देती है .पर किले में सन्नाटा था गैलरी के अंतिम छोर तक पहुंचने में भी आठ दस मिनट लग गया.बाहर अंधेरी रात थी और मुख्य द्वार के पास बेला के फूलों की खुशबू फैली हुई थी.पता चला किले में सिर्फ एक कुक और दो चौकीदार रहते है .वे कही दिख नहीं रहे थे.गरमी और उमस के बीच फिर लंबी गैलरी पार कर हम कमरे में पहुंचे तो ग्यारह बज चुके थे.कही कोई आवाज नहीं.बाकी सारे कमरे बंद थे .अजीब सा रहस्मय माहौल था .बालकनी से बाहर भी बहुत दूर रौशनी दिखी आसपास न कोई आबादी न कोई आवाज .ठीक उसी तरह जैसे तौरंगा के डाक बंगले में पहले अंतिम पुलिस चौकी के प्रभारी ने वहां रात गुजरने पर चेतावनी दी फिर डाक बंगले के चौकीदार ने समझाया कि रात में दरवाजा मत खोलिएगा यहां बाघ से लेकर भालू तक आते है .पर यहां बाघ भालू तो कुछ नही था पर फिर भी अजीब सा रहस्मय और डरावना माहौल जरुर था.यह पता चलने के बाद कि इस किले के बहुत प्राचीन कुएं में किसी को मार कर डाला जा चुका  है,डर जरुर लग रहा था .कब नींद आई पता नहीं चला किसी के दरवाजा खटखटाने की आवाज पर नींद खुली तो देखा रसोइया चाय और बिस्कुट के साथ खड़ा है .आसमान में बदल छाए हुए थे और हम बालकनी में यमुना का घुमावदार मोड देखते हुए चाय का स्वाद ले रहे थे .


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