करौंदे का एक पौधा भी लगाएं

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करौंदे का एक पौधा भी लगाएं

 डॉ शारिक़ अहमद ख़ान

कभी-कभार उम्मीद से ज़्यादा और छप्पर फाड़ पेड़-पौधे इंसान को देते हैं.कुदरत शायद इनाम देती है.हमको भी ऐसा ही इनाम मिल रहा है.जब हमने होश संभाला तो मेरे घर के आसपास पेड़-पौधे लगाने का चलन नहीं था.लॉन में बस सजावटी फूल लोग लगाया करते.तब हमने अपने लॉन को संवारना शुरू किया,पेड़-पौधे लगाए जो देखते ही देखते बड़े हो गए.लॉन चमन हुआ और परिंदों का बसेरा तो आसपास के लोगों ने बहुत तारीफ़ की और अपने-अपने यहां पेड़ लगाने शुरू किए.अब ये हाल है कि यहाँ इतनी हरियाली है कि बाहर से आने वाले पारखी नज़र लोग कहते हैं जैसे लगता है ये इलाका केरल हो.ख़ैर,तभी हमने सिर्फ़ एक अदद करौंदे का पेड़ लगाया था,कई बार कटाई-छँटाई भी हुए,छोटा किया गया है,एक बरस कम फल देता है तो एक बरस ज़्यादा.इस बार तो रिकार्ड तोड़ दिया,सिर्फ़ एक पेड़ से इतने करौंदे हो रहे हैं कि लोग हैरान हैं,हमने तोड़वाया,बंटवाया,अचार बनवाया,कई दोस्तों को अचार बांटा और अब भी बांट रहे हैं,सेंधे नमक में अचार बनवाते हैं,हेल्थ के प्रति सचेत क़रीबी पसंद करते हैं.एक साहब को अचार दिया था,वो ख़त्म कर फिर सुबह आ गए,हमने उन्हें ये दो शीशी अचार दिया और एलान किया कि अब बस ख़त्म.अब हमारे खाने भर बचा है.अब अगले के अगले बरस.इसी तरह से एक बार हमने सिर्फ़ एक लौकी का बीज ज़मीन में रोप दिया.वो गोल लौकी थी,उससे इतनी लौकियां पैदा होतीं कि बांटे ख़त्म नहीं होतीं,पूरे दोस्त-अहबाब-परिचित -पड़ोसी गोल लौकी खाकर अघा गए.फिर एक दिन वो आया कि लोग डरने लगे कि हम कहीं उनके यहाँ लौकी ना भेजवा दें.कुदरत जब ख़ुश होती है तो इसी तरह छप्पर फाड़ रहमत बरसाती है.


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