बाढ़ में डूबता काजीरंगा

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बाढ़ में डूबता काजीरंगा

प्रभाकर मणि तिवारी

गुवाहाटी .कोरोना की मार से जूझ रहे  असम में इस साल भी बाढ़ कहर ढा रही है. देश में असम में ही सबसे पहले बाढ़ आती है. कोसी नदी को जिस तरह बिहार का शोक कहा जाता है उसी तरह ब्रह्मपुत्र को असम का शोक या अभिशाप कहा जा सकता है. यह राज्य में बाढ़  का दूसरा दौर है. हर साल इसकी भयावहता बढ़ती ही जा रही है. आखिर हर साल असम में आने वाली बाढ़ की भयावहता क्यों बढ़ती जा रही है और इस पर अंकुश लगाने की कोई ठोस पहले क्यों नहीं की जा सकी है?

कोरोना महामारी के बीच इस साल असम में बाढ़ आफत बनकर आई है. राज्य के 33 में से 30 जिले बाढ़ की चपेट में हैं और 60 लाख से ज्यादा लोग प्रभावित हुए हैं. बाढ़ और भूस्खलन से 120 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है. बाढ़ से सबसे ज्यादा नुकसान एक सींग वाले गैंडों के लिए मशहूर काजीरंगा नेशल पार्क को पहुंचा है. पार्क का लगभग 90 फीसदी हिस्सा पानी में डूब गया है और एक सींग वाले गैंडों समेत सवा सौ से ज्यादा जानवर मारे गए हैं.


वैसे, बाढ़ असम के लिए नई नहीं है. इतिहासकारों ने अहोम साम्राज्य के शासनकाल के दौरान भी हर साल आने वाली बाढ़ का जिक्र किया है. पहले के लोगों ने इससे बचने के लिए प्राकृतिक तरीके अपनाए थे. इसलिए बाढ़ की हालत में जान-माल का नुकसान कम से कम होता था. भारत, तिब्बत, भूटान और बांग्लादेश यानी चार देशों से गुजरने वाली ब्रह्मपुत्र नदी असम को दो हिस्सों में बांटती है. इसकी दर्जनों सहायक नदियां भी हैं.तिब्बत से निकलने वाली यह नदी अपने साथ भारी मात्रा में गाद लेकर आती है. वह गाद धीरे-धीरे असम के मैदानी इलाकों में जमा होता रहता है. इससे नदी की गहराई कम होती है. इससे पानी बढ़ने पर बाढ़ और तटकटाव की गंभीर समस्या पैदा हो जाती है.


विशेषज्ञों का कहना है कि इंसानी गतिविधियों ने भी परिस्थिति को और जटिल बना दिया है. बीते करीब छह दशकों के दौरान असम सरकार ने ब्रह्मपुत्र  के किनारे तटबंध बनाने पर तीस हजार करोड़ रुपए खर्च किए हैं. एक गैर-सरकारी संगठन आराण्यक के पार्थ जे. दास कहते हैं, “इन तटबंधों को कम समय के लिए अंतिम उपाय के तौर पर बनाया जाना था. नदी के कैचमेंट इलाके में इंसानी बस्तियों के बसने, जंगलों के तेजी से कटने औऱ आबादी बढ़ने की वजह से समस्या की गंभीरता बढ़ गई है.”

मशहूर पर्यावरणविद दुलाल चंद्र गोस्वामी ने वर्ष 2008 में एक रिपोर्ट में कहा था कि ब्रह्मपुत्र से अकेले गुवाहाटी के पास स्थित पांडू में सालाना प्रति वर्गकिमी 908 टन गाद जमा होती है. इस लिहाज से इस नदी को दुनिया के पांच शीर्ष नदियों में शुमार किया जा सकता है. असम की मौजूदा सरकार ने कुछ साल पहले ब्रह्मपुत्र में जमा गाद साफ करने के लिए 891 वर्ग किलोमीटर की लंबाई में ड्रेजिंग की योजना बनाई थी. मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने तब ड्रेजिंग कार्पोरेशन आफ इंडिया के अधिकारियो के साथ इस मुद्दे पर बैठक भी की थी. उसमें तय हुआ था कि पहले इलाके का सर्वेक्षण कर एक कार्य योजना तैयार की जाएगी. केंद्र सरकार ने भी लगभI 40 हजार करोड़ की इस योजना को मंजूरी दे दी थी. लेकिन यह मामला अब तक फाइलों में ही कैद है. हालांकि विशेषज्ञों ने इसके औचित्य पर सवाल खड़ा करते हुए कहा था कि एक बार गाद की सफाई से खास फायदा नहीं होगा. चूंकि यह एक सतत प्रक्रिया है, इसलिए ड्रेजिंग भी हर साल करनी होगा.

विशेषज्ञों का कहना है कि गर्मी में तिब्बत के ग्लेशियरों के पिघलने और उसके तुरंत बाद मानसून सीजन शुरू होने की वजह से ब्रह्मपुत्र और दूसरी नदियों का पानी काफी तेज गति से असम के मैदानी इलाकों में पहुंचता है. पर्यावरणविद् अरूप कुमार दत्त ने अपनी पुस्तक द ब्रह्मपुत्र में लिखा है कि पहाड़ियों से आने वाला पानी ब्रह्मपुत्र औऱ उसकी सहायक नदियों का जलस्तर अचानक बढ़ा देता है. यही वजह है कि राज्य में सालाना बाढ़ की समस्या गंभीर हो रही है. इसके अलावा भौगोलिक रूप से असम ऐसे जोन में है जहां मानसून के दौरान तो देश के बाकी हिस्सों के मुकाबले ज्यादा बारिश होती ही है, इलाके में जल्दी-जल्दी आने वाले भूकंप समस्या को और गंभीर बना देते हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि बाढ़ की समस्या के लिए मानवीय गलतियां भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं. आबादी बढ़ने के साथ ही नदी के कैचमेंट इलाके में बस्तियां बन गई औऱ जंगल तेजी से काटे जाने लगे. इसके अलावा जलवायु परिवर्तन की भी इस समस्या में अहम भूमिका है. इसके अलावा अरुणाचल प्रदेश में बीते कुछ वर्षों के दौरान पनबिजली परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर बांधों की मंजूरी दी गई है. उसके बाद खासकर वहां और पड़ोसी  असम  में  बाढ़ की विनाशलीला तेज हुई है. 

विशेषज्ञों का कहना है कि असम की बाढ़ पर अंकुश लगाने और जान-माल के नुकसान को कम करने के लिए बहुआयामी उपाय जरूरी हैं. हर साल जो इलाके सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं उनको संवेदनशील की श्रेणी में रख कर वहां अलग उपाय किए जाने चाहिए. इसके अलावा नदियों के करीब किसी स्थायी निर्माण की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए.

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