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भटनी -बरहज लूप लाइन

अंबरीश कुमार

यह 55103 अप पैसेंजर है .यह ट्रेन भटनी से बरहज बाजार तक जाती है .लूप लाइन है .पिकोल ,सलेमपुर ,देवरहा बाबा रोड ,सतरांव ,सिसई गुलाबराय होते हुए बरहज पहुंचाती है .सिसई गुलाबराय नाम अपने फूफा जी के पर बाबा के नाम पड़ा .इस हाल्ट स्टेशन के लिए उन्होंने न सिर्फ जमीन मुहैया कराई बल्कि स्टेशन बनाने का बुनियादी काम भी गांव वालों के श्रमदान से कराया .हाल्ट स्टेशन  की जिम्मेदारी भी अपने फुफेरे भाई अभय ही देखते है,अच्छी आमदनी भी हो जाती है .स्टेशन के लिए दी गई जमीन की यह रायल्टी समझिए . पापा रेलवे में इंजीनियर रहे तो रेल की यात्रा खूब हुई और तरह तरह की ट्रेन और डब्बों में भी .तब उन्हें जो फर्स्ट क्लास मिलता था वह पूरा डिब्बा ही होता था ,चार बर्थ का .बाथरूम में नहाने की भी व्यवस्था .डिब्बा इतना बड़ा होता था कि ट्रेन जब खड़ी हो तो स्टोप जलाकर चाय बन जाए .इसपर दूसरी पोस्ट में विस्तार से .फिलहाल लूप लाइन की इस ट्रेन पर .

बरहज के लोग इसे बरहजिया बोलते हैं, बरहजिया गाड़ी.अभी भी चल रही है.मईल के पास एक रेलवे क्रॉसिंग है जिसका गेट बरहजिया का ड्राइवर बंद कर के ट्रेन गुजारता है और फिर ट्रेन खड़ी कर देता है.फिर टी टी क्रॉसिंग का गेट खोल देता है.और ट्रेन आगे चल देती है.इसमें शशि थरूर के शब्दों में सिर्फ कैटल क्लास ही होता .इसलिए लोग बकरी /बकरा लेकर भी यात्रा कर लेते .खिड़की वाली सीट के लिए मारामारी होती .लकड़ी वाली सीट .और स्टेशन पर शरबत जैसी चाय और समोसा के अलावा चना मुरमरा से लेकर मौसमी फल भी मिल जाता .

भटनी से साढ़े तीन बजे यह लूप लाइन की ट्रेन निकलती और शाम करीब पांच बजे बरहज बाजार पहुंचा देती .गांव से आई बैलगाड़ी से आगे का करीब तीन किलोमीटर का सफ़र होता .पर इस ट्रेन में हर तरह का मनोरंजन भी होता तो राजनैतिक चर्चा भी .कुछ लोग ताश भी खेलते तो बीड़ी का धुआं भी भर जाता .खिड़की खुली रहती और जब आम के बगीचे के बगल से गुजरती तो आम तोड़ने की बड़ी इच्छा भी होती .सिसई गुलाबराय हाल्ट स्टेशन के बगल में ही फूफा जी का भी आम का बगीचा दिखता .सभी देसी आम के पेड़ .बाढ़ के समय सरजू नदी का पानी भी पास आ जाता .याद है गर्मी की छुट्टी में जब अपने गांव राजपुर जाते तो साइकिल से बुआ के घर जाते .इसी बगीचे में खसी कटता .देर रात तक दावत होती .कुएं का पानी ,पत्तल और कुल्हड़ का इस्तेमाल होता .नीचे बैठते और लालटेन या पेट्रोमैक्स की रौशनी होती .याद आया .

लूप लाइन की ट्रेनों में कोई आपाधापी नहीं होती न ही किसी और दिशा से कोई ट्रेन आती .यह तो बैलगाड़ी की तरह एक लीक पर चलने वाली ट्रेन होती है और भटनी -बरहज की दूरी भी डेढ़ दो घंटे की .कभी लूप लाइन की ट्रेन की यात्रा भी करें ,जनरल डिब्बे में .गांव के लोग भी तब चलते थे अब तो सत्तर साल में खुद की गाड़ी ले ली है तो सीधे देवरिया निकल जाते हैं .ज्यादातर गरीब गुरबा ही इस ट्रेन पर चलता है .और इससे पहले वाला स्टेशन का नाम देवराहा बाबा के नाम पर है जो पास में ही रहते थे .सरयू में मचान पर बैठते थे .इंदिरा गांधी भी आशीर्वाद लेने आई थी .हालांकि पास के पैना गांव के लोग स्टेशन का नाम अपने गांव के नाम पर चाहते थे .

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