जब युद्ध का नगाड़ा बजाए मीडिया

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जब युद्ध का नगाड़ा बजाए मीडिया

रुचिर गर्ग 

जिस देश का मीडिया युद्ध के नगाड़ा बजाता हो,युद्ध का उन्माद पैदा करता हो तब पहला हमला उस देश के अपने ही नागरिकों की चेतना पर होता है.मीडिया की तैयार की गई धुन पर देश में बज रहा राफ़ेल-संगीत और उस पर झूमते लोग इस बात का गवाह हैं.इस कर्कश युद्ध-संगीत के शोर में देश की अब तक की सैन्य ताकत से लेकर राफ़ेल पर उठते सवाल मानो दब गए हैं.अब न पड़ोसी देशों से मधुर संबंधों की ज़रूरत बची है,न सीमाओं के विवादों पर तर्कपूर्ण चर्चा की गुंजाइश.शांति की ज़रूरत तो अब डस्टबिन में है और सवालों के लिए तो जगह है ही नहीं.

एक देश खरीदने वाला और दूसरा बेचने वाला.बेचने वाले ने और भी देशों को यह फाइटर प्लेन बेचा है.लेकिन हम झूम रहे हैं.क्यों?पूछिये मत!पूछेंगे तो देशभक्ति पर सवाल उठेगा.कोरोना मरीज 15 लाख से ज़्यादा हो गए पर सवाल मत करिए क्योंकि अभी देश में राफ़ेल-उत्सव चल रहा है. हम उत्सवी लोग हैं.चैनलों से भांग परोसी जाती है और हम नाचने लग जाते हैं.हम उत्सवी लोग हैं.अर्थव्यवस्था,रोजगार वगैरह हमारे सोचने का विषय नहीं है.हम उत्सवी लोग हैं.कोई चुनी हुई सरकार गिरा दी जाए तो विधायक का रेट नहीं पूछेंगे,नाचते-गाते फिर वोट की लाइन में लग जाएंगे.हम उत्सवी लोग हैं.कभी पूछेंगे नहीं कि देश क्या सिर्फ राफ़ेल से बच जाएगा या भीतर के हमलों से भी देश को बचाने की ज़रूरत है?

राजभवनों की दहलीज पर पड़ा जीर्णशीर्ण लोकतंत्र हम लोगों को नज़र नहीं आएगा क्योंकि अभी हम उत्सवग्रस्त हैं ,क्योंकि अभी देश में राफ़ेल आ गया है!राफ़ेल के आगमन पर सत्ता से लेकर मीडिया के अधिकांश हिस्से तक ने संकटग्रस्त देश में जिस तरह त्योहार का माहौल खड़ा कर दिया वो चिंतित करने वाला है.पहले हमें बताया जाता है कि हम कितना असुरक्षित हैं और फिर राफ़ेल आ गया!!!

जितना ज़रूरी देश की सीमाओं की सुरक्षा है क्या उतना ही ज़रूरी देश के भीतर लोकतंत्र की सुरक्षा भी नहीं है?कमज़ोर लोकतंत्र को ढहने से कोई राफ़ेल नहीं बचा सकेगा लेकिन क्या अब हमारे लिए लोकतांत्रिक मूल्यों के पोषण की ज़रूरत गैर जरूरी हो गई है?दरअसल ऐसा ही होता जा रहा है और ऐसा इसलिए भी होता जा रहा है क्योंकि मीडिया नाम के उद्योग में अब सवालों का उत्पादन बन्द ही हो गया है.


मीडिया की स्वतंत्रता पर तमाम बहसें आत्मनियंत्रण पर जा कर खत्म हो जाती हैं.फासिस्ट देशों के मीडिया की हालत देख कर नेहरू जी ने इस बारे में अपने समय में ही आगाह किया था.लेकिन हम तेज़ी से उस दौर में जा रहे हैं जहां हर वक़्त हमें एक असुरक्षित देश दिखेगा, हर वक़्त हमें दुश्मन देश नज़र आएंगे,हर वक़्त हमें अपनी सीमाएं खतरे में नज़र आएंगी,हर वक़्त हमारे सामने युद्ध के नगाड़े बजाता मीडिया होगा और हर वक़्त हम खुद को नागरिक से ज़्यादा मोर्चे पर तैनात एक सैनिक की तरह महसूस करेंगे.और तभी राफ़ेल आ जायेगा और तभी हमें सुरक्षा का बोध भी होगा लेकिन तब भी ना तो मीडिया का दायित्व-बोध मुद्दा होगा,ना सरकार से सवाल करने की मीडिया की ज़िम्मेदारी पर सवाल होंगे और न हम खुद को अमन पसंद या लोकतंत्र पसंद नागरिक की तरह ही देखना चाहेंगे.

राफ़ेल-उत्सव संकेत है.ये संकेत है कि समाज को युद्ध पसंद बना दिया जा रहा है.ये संकेत है कि मीडिया हमारे लोकतंत्र की रखवाली नहीं करेगा, मीडिया हमारी चेतना की परवरिश नहीं करेगा बल्कि मीडिया एक ऐसे औजार में तब्दील होता जा रहा है जिसका काम एक चेतना विहीन, रक्तपिपासु पीढ़ी ही तैयार करना होगा.राफ़ेल-उत्सव तो सिर्फ इशारा है.अगर हमारी चेतना पर ऐसे सुनियोजित हमले हो रहे हों तो ज़रूरी है कि हम खुद को थोड़ा झकझोरे.ज़रूरी है कि थोड़े सवाल उछालें.ज़रूरी है कि अतीत को कुरेदें और वर्तमान का विश्लेषण करें.ज़रूरी है कि हम बेहतर भविष्य की बात करें.ज़रूरी है कि हम अपनी अगली पीढ़ी को सैन्यतंत्र के बजाए एक मजबूत लोकतन्त्र सौंपें.हमें मजबूत सेना तो चाहिए,हमें आधुनिक हथियार तो चाहिए लेकिन ज़रूरी है कि हमारी चेतना का सैन्यीकरण न हो.इसलिए ज़रूरी है कि हम राफ़ेल-उत्सव मना रही मीडिया की धुन पर नाचना बन्द करें.


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