मंदिर का तामझाम उचाट करता है!

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मंदिर का तामझाम उचाट करता है!

शंभूनाथ शुक्ल 

नई दिल्ली .कर्नाटक में हम्पी, कश्मीर में अवंतीपुर और ओडिसा में कोणार्क के मंदिर ध्वस्त पड़े हैं. लेकिन फिर भी दूर-दूर से लोग उन्हें देखने जाते हैं. क्योंकि ध्वस्त मंदिरों का भी अपना वैभव होता है, उनका अपना आकर्षण होता है. सबको पता है, कि यदि उनका मलबा हटा कर उन्हें दोबारा बनवाया जाए, तो यह सम्भव नहीं है, कि ये मंदिर आज उसे शैली में बनवा दिए जा सकेंगे. यहाँ आने वाले लोग इन्हें देखते हैं, और उस काल की स्थापत्य शैली से परिचित होते हैं. अपने अतीत की विशालता को नज़दीक से देखने की ललक उन्हें वहाँ खींच ले जाती है. उत्तराखंड, हिमाचल की दुर्गम पहाड़ियों पर स्थित मंदिर आस्था और शांति के लिए लोगों का ध्यान आकर्षित करते हैं. लेकिन किसी सेठ, उद्योगपति द्वारा बनवाए गए मंदिर खूब बड़े और चकाचौंध भरे क्यों न हों, वे लोगों को अपनी तरफ़ नहीं खींचते. 

मैं स्वयं जब पिछले साल सौराष्ट्र गया, तो सोमनाथ भी पहुँचा. यह बहुत भव्य और विशाल है. सुना, कि वहाँ चढ़ावे के लिए पुजारी प्रेरित नहीं करते और और साफ़-सफ़ाई भी खूब है. लेकिन मुझे उसकी विशालता, भव्यता और स्वच्छता आकर्षित नहीं कर सकी.और मैं उसके पीछे जाकर प्रभाष-पट्टन का इलाक़ा देख कर लौट आया. यूँ भी सोमनाथ का महत्त्व उसके स्थान को लेकर है. ठीक यही बात अयोध्या में लागू होगी. रामलला का मंदिर भव्य और विशाल तो होगा, लेकिन आस्थावान लोगों के अंदर वह आध्यात्मिकता नहीं ला पाएगा. इसकी वजह है, मंदिर अपनी प्राचीनता और लोक आस्था एवं प्रतिष्ठा के कारण जाने जाते हैं. जैसे  वैष्णो देवी, बाला जी मंदिर, संकटमोचन मंदिर या लखनऊ का बड़े हनुमान जी का मंदिर अपनी लोक आस्था के कारण प्रतिष्ठित हैं. तो अयोध्या का हनुमानगढ़ी और कनक भवन या दक्षिण भारत के पद्मनाभ मंदिर और काँची का मंदिर तथा मदुरै का मीनाक्षी मंदिर अपनी विशालता और भव्यता के कारण. जबकि काशी का विश्वनाथ मंदिर, वृंदावन का बाँकेबिहारी मंदिर आदि अपनी प्राचीनता के कारण. लेकिन वे मंदिर, जिन्हें उद्योगपतियों ने बनवाए हैं, वे सिर्फ़ पिकनिक स्पॉट हैं, जैसे कोलकाता या दिल्ली के बिड़ला मंदिर या कानपुर का जेके मंदिर. अयोध्या में जो राम मंदिर बनने जा रहा है, उसमें न लोक आस्था है, न प्राचीनता और न ही शास्त्रोक्त स्विधि-विधान. इसलिए इसके भी दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर की तरह वीकेंड में भीड़ जुटाने वाले मंदिर जैसे बन जाने का अंदेशा है. हिंदुओं में मंदिर बनवाने की विधि सम्मत प्रक्रिया है, उसका अनुकरण यहाँ नहीं हो रहा है. इसलिए अयोध्या का राम जन्म स्थान मंदिर शोभा स्थल बन जाएगा.  मंदिर बनवाने का शास्त्रोक्त विधान है और उसके स्थापत्य का भी. इसके बाद उसमें प्राण-प्रतिष्ठा होती है. 

यह राजाओं-महरजाओं का समय नहीं है, कि सरकार के बुलाने पर वेद और शास्त्रों के ज्ञाता पंडित आ जाएँगे. हाँ चाटुकार अवश्य आ सकते हैं. यूँ भी एक लोकतंत्र में मंदिर विधायिका है. इसलिए आप सांसद और विधान सभा बनवाएँ. अयोध्या में राम मंदिर जनता खुद बना लेगी. सरकार द्वारा बनवाए जाने या तामझाम करने का क्या मतलब है? अब अयोध्या में राम मंदिर भले खूब धूमधाम से बन जाए, लेकिन राम भक्त शबरी उसमें जा नहीं पाएगी. वहाँ पर बार-बार होने वाली तलाशी, सरकारी रक्षकों का उजड्ड व्यवहार और सरकारी पंडों की उदासीनता किसी भी आस्थावान हिंदू के मन को उचाट करेगी. इसलिए अयोध्या में सरकार भले विराजे, शबरी और गुह के राम नहीं विराजेंगे. 


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