कम्युनिस्ट भी बंदर बांट में फंस गए

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कम्युनिस्ट भी बंदर बांट में फंस गए


आनंद स्वरूप वर्मा

नेपाल में जिस वक़्त दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों, नेकपा माओवादी और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) यानी एमाले की एकता हुई और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी का गठन हुआ, उस वक़्त से यह संदेह था कि पता नहीं कब तक यह एकता चल पाएगी. जिन लोगों को संदेह था उनके दिमाग़ में विचारधारात्मक मसले थे. लेकिन धीरे-धीरे समय बीतने के साथ लगा कि वहां के जो कम्युनिस्ट थे, जिनसे बहुत उम्मीद की जाती थी, मसलन प्रचंड हों, या उनकी स्थिति के अन्य नेता, वे मूलत: विचारधारा को लेकर अब संघर्ष नहीं करते. अब सारी लड़ाई हो गई थी सत्ता की बंदर बांट की.

नेपाल का पिछले डेढ़ महीने का घटनाक्रम आप देखें, कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि नेपाल के जो पांच शीर्ष कम्युनिस्ट नेता हैं, वे पूरी तरह सत्ता संघर्ष में लगे हुए हैं. इनमें से प्रचंड, झलनाथ खनाल और माधव नेपाल तो पूर्व में प्रधानमंत्री रह चुके हैं. केपी ओली अभी प्रधानमंत्री हैं और बामदेव गौतम भी उप प्रधानमंत्री रह चुके हैं. इनकी पार्टी जब से सत्ता में आई है, ये पांचों लोग सिर्फ़ सत्ता संघर्ष में ही लगे हुए हैं.
नेपाल चीन के बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव (बीआरआई) के साथ है. अमेरिका नेपाल को चीन के प्रभाव से बाहर खींचना चाहता है इसलिए वह नेपाल को इंडो-पैसेफ़िक स्ट्रैटेज़ी के तहत लाना चाहता है जिससे नेपाल बच रहा है. तो यह एक अजीब तरह की लड़ाई वहां पर चल रही है. इसलिए नेपाल में आज जो कुछ हो रहा है उसे आप जब तक एक ग्लोबल पर्सपैक्टिव में नहीं देखेंगे, तब तक उसको ठीक से नहीं समझ पाएंगे. सतह पर तो केवल यही दिखाई देता है कि फ़लां प्रधानमंत्री बने या फ़लां बन जाए, इसकी छीना झपटी चल रही है.

नेपाल की सत्तारूढ़ पार्टी में सतह पर दिख रहे सत्ता संघर्ष के बीच चीन की राजदूत नेपाल के प्रमुख नेताओं से मिली हैं हालांकि यह बात सार्वजनिक नहीं है कि उन्होंने क्या बातें की. अगर उनसे पूछा भी जाए तो जवाब यही होगा कि हम नेपाल को एक स्थिर और सम्पन्न राष्ट्र देखना चाहते हैं इसलिए उनसे जो बातचीत हो रही है वह इसी बारे में हो रही है कि सत्तारूढ़ पार्टी में एकता बनी रहे. यह बात भी सही है कि चीन अपने राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखकर यही सोचता होगा कि अगर आज नेपाल में किसी भी वजह से अस्थिरता क़ायम होती है तो इसका फ़ायदा उन ताक़तों को मिल सकता है जो कि चीन विरोधी हैं. और ज़ाहिर सी बात है कि उन ताक़तों से उसका संदर्भ प्रो-अमेरिकन फ़ोर्सेज़ से होगा और मोटेतौर पर यह माना जाता है कि भारत अमेरिका की प्रॉक्सी के रूप में काम करता है. इसलिए इसमें कोई संदेह नहीं कि नेपाल में भारतीय प्रभाव को काउंटर करने के लिए, जो कि ब्लॉकेड के बाद क़ाफ़ी हद तक कम हो गया है, नेपाल में चीन की सक्रियता है.लेकिन इस सबके बीच यह तो नेपाल के नेतृत्व को तय करना है कि वह किस सीमा तक चीन या भारत के इशारे पर काम करता है और आपस में ही सारी समस्याओं का समाधान करता है.अभी जहां तक नेतृत्व के संकट की बात है तो इसमें तो निश्चित तौर पर ओली और प्रचंड दोनों के अपने अपने ‘ईगो’ हैं और दोनों मे से कोई भी झुकने को तैयार नहीं है.

अहं के इस टकराव ने फिर बताया है कि नेपाल में क्रांतिकारी राजनीति किस तरह अवसान पर है. असल में इसकी शुरुआत आज से नहीं बल्कि 2008 में प्रचंड के प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही हो गई थी. उसके बाद से लगातार क्रांतिकारी राजनीति का विघटन होता गया. उसका संकेत स्पष्ट तौर पर तब दिखाई दिया जब संविधान बनने से पहले ही पीएलए (पीपुल्स लिबरेशन आर्मी) को समाप्त कर दिया गया जो पहले से तय नीति के ख़िलाफ़ था. तत्कालीन प्रधान मंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला के नेतृत्व वाली नेपाल सरकार के साथ माओवादियों का जो समझौता हुआ था उसमें कहा गया था कि पहले संविधान बनेगा फिर पीएलए का सेना के साथ एकीकरण होगा. उस समझौते के विपरीत जा कर प्रचंड ने सेना का एकीकरण किया और क्रांतिकारी राजनीति का पतन शुरू हुआ और इसके चलते ही वहां पर नेत्र बिक्रम चंद (बिप्लव) का उदय हुआ. बिप्लव अपनी एक क्रांतिकारी पार्टी लेकर आए.

यह तो हर कोई मानता है कि राजतंत्र की समाप्ति तक संघर्ष ठीक चला लेकिन राजतंत्र की समाप्ति के बाद वाला जो दौर रहा है वह जनपक्षीय राजनीति के नजरिए से बहुत निराशाजनक रहा है. लेकिन यहाँ एक बात और जोड़नी होगी कि दोनों पार्टियों की एकता के बाद नेपाल के अंदर कम्युनिस्ट पार्टी की जो सरकार बनी, और वह भी तक़रीबन दो तिहाई बहुमत से, इस घटना ने अमेरिका को बेचैन कर दिया. हम भले ही यह मानें कि यह पार्टी कोई क्रांतिकारी राजनीति नहीं कर रही है और यह बुर्जुआ राजनीति का ही एक और रूप है लेकिन अमेरिका यह नहीं मान सकता. दक्षिण एशिया के एक छोटे से देश में, वह भी चीन के एकदम बगल के देश में, एक ऐसी सरकार का होना जो घोषित रूप से कम्युनिस्ट सरकार है, इसे अमेरिका कभी बर्दाश्त नहीं करेगा. इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिए. अमेरिका के लिए इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि लाल रंग कितना लाल है, वह गाढ़ा लाल है, हल्का लाल है या फिर गुलाबी हो गया है. उसके लिए कम्युनिस्ट, कम्युनिस्ट हैं. यहां यह भी ध्यान देने की बात है कि नेपाल अगर अब तक अमेरिका के सीधे हस्तक्षेप से बचा हुआ है तो उसके पीछे एकमात्र वजह उसकी जियो-पॉलिटिकल लोकेशन (भौगोलिक-राजनीतिक अवस्थिति) है. वह चीन के एकदम बगल में है. अगर ऐसा नहीं होता तो अमेरिका आज की तारीख़ में कभी बर्दाश्त नहीं करता कि दुनिया में कोई ऐसा देश भी हो जहां कम्युनिस्ट पार्टी का शासन हो.

( रोहित जोशी के साथ बातचीत पर आधारित आलेख )


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