राजस्थान का गुर्जर समाज किसके साथ

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राजस्थान का गुर्जर समाज किसके साथ

यशोदा श्रीवास्तव
राजस्थान में सत्ता को लेकर उठापटक शायद अभी थमता नजर नहीं आ रहा है. काफी हीलाहवाली के बाद राज्यपाल कलराज मिश्र ने 14 अगस्त को विधानसभा सत्र बुलाने की हामी भर दी है लेकिन उसके पहले भी और उसके बाद भी बहुत कुछ हो जाने की संभावना बनी हुई है. फिलहाल यह तो बाद की बात है. थोड़ा पीछे यानी राजेश पायलेट की दुर्घटना में मौत के बाद सचिन पायलेट के किसान नेता यानी स्व पिता के उत्तराधिकारी के रूप में ताज पोशी की वक्त को देखें तो एक सवाल मन में कौंधता है कि क्या तब अशोक गहलौत ने साचा था कि एक ऐसा भी वक्त आएगा जब जिस सचिन को जातिय संतुलन साधने के लिए भारी भरकम रैली में विधिवत राजनीति की राह दिखाई थी,उसी सचिन को नाकारा और किसी काम का नहीं है, भी कहना पड़ेगा? यह सवाल इस लिए आज समीचीन है कि वर्ष 2002 में जब जयपुर के विधानसभा भवन के सामने सचिन का किसानाभिषेक हुआ था तब भी गहलौत राजस्थान के मुख्यमंत्री थे.उस साल के 10 फरवरी को आयोजित अखिल भारतीय किसान मजदूर महापंचायत के बैनर तले आयोजित विशाल रैली में अशोक गहलौत ने सचिन को राजस्थान का भविष्य बताते हुए उन्हें अपने पिता स्व राजेश पायलेट के सपनों को साकर करने का आर्शिवाद दिया था तो कांग्रेस आलाकमान सोनिया गांधी ने लिखित संदेश भेजवा कर सचिन पायलट को बधाई और शुभकामना दी थी.
अब ऐसा क्या हो गया कि सचिन पायलट अपने कुछ विधायकों को साथ लेकर  गहलौत और कोंग्रेस आलाकमान को चुनौती देने को मजबूर हुए? इस ओर झांकने की जरूरत नहीं है क्योंकि अभी दोनो ओर से आरोप प्रत्यारोप का दौर चल रहा है जिसका निष्कर्श निकलना अभी बाकी है. अभी राजस्थान के जातीय समीकरण को देखना जरूरी है जिस नाते स्व राजेश पायलट अथवा उनके पुत्र सचिन पायलेट राजस्थान की राजनीति में अपरिहार्य हुए.वर्ष 2002 का भी अशोक गहलौत का शासन बड़ा संकटपूर्ण रहा है.जाट आरक्षण को लेकर अन्य पिछड़ी जातियां गहलौत सरकार से खफा थीं तो भीलवाड़ा में गुर्जर जाति के देवनारायण मंदिर और एतिहासिक कलंदरी मस्जिद विवाद चरम पर था. तभी महसूस हुआ कि गुर्जर जाति के गुस्से को शांत करने के लिए राजेश पायलेट के पुत्र सचिन पायलेट को किसान नेता के बहाने सक्रिय किया जाय.
सचिन के पिता राजेश पायलट ने जब राजनीति की पारी शुरू की तो बहुत तेजी से उन्होंने अपनी छवि किसान नेता के रूप में स्थापित कर ली थी.वे राजस्थान के दौसा लोकसभा सीट से कांग्रेस से सांसद चुने जाते रहे.10 फरवरी 2001 को सड़क दुर्घटना में उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी रमा पायलेट इस सीट से सांसद चुनी गई थीं लेकिन उन्होंने तय कर रखा था कि लंबे समय तक उनका राजनीति में बने रहना संभव नहीं है लिहाजा बेटे सचिन को आगे लाना होगा. कुछ अंतराल बाद ही स्थित ऐसी हुई कि गुर्जर समाज को स्व राजेश पायलट की कमी खलने लगी और मुख्यमंत्री गहलौत के प्रति गुर्जरों में नाराजगी भी बढ़ने लगी. तभी स्व राजेश पायलेट के दूसरी पुण्यतिथि पर यानी 10 फरवरी 2002 को ही स्व राजेश पायलट द्वारा स्थापित अखिल भारतीय किसान मजदूर महापंचायत के बैनर तले एक विशाल रैली की योजना बनी. राजस्थान विधानसभा भवन के सामने बड़े भूभाग पर आयोजित इस रैली में तकरीबन 75 हजार गुर्जर जुटे थे. इस रैली में राजस्थान कांग्रेस पार्टी की तत्कालीन अध्यक्ष गिरिजा ब्यास ने सचिन पायलेट को कांग्रेस में शामिल होने की विधिवत घोषणा की.सचिन पायलट के राजनीतिकरण को स्थानीय मीडिया ने किसानाभिषेक की संज्ञा दी थी.इस रैली में मुख्यमंत्री गहलौत ने स्व. राजेश पायलट के सपनों को साकार करने का वचन भी दिया था. स्व राजेश पायलट की राजनीति मुख्यतः गांव,गरीब,किसान,मजदूर हितों पर आधारित थी.आगे चलकर अपने स्व. पिता के चुनाव क्षेत्र से वे भी सांसद चुने गए.सबसे कम उम्र के सांसद सचिन को कांग्रेस में वह रुतबा हासिल था जो उनके पिता को हासिल था.मात्र 42 साल की उम्र तक दस साल तक केंद्रीय मंत्री,राजस्थान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और जब सूबे में कांग्रेस वापस हुई तो डिप्टी सीएम का पद भी.बावजूद इसके कुछ शेष रह गया होगा जो कांग्रेस में न मिल पा रहा हो लिहाजा वे दूसरी राह पकड़ने को मजबूर हुए.
सचिन की दूसरी राह यद्दपि कि तय है लेकिन अभी इसका प्रकटीकरण होना बाकी है. कांग्रेस से अलग होकर सचिन अपने पिता की थाती कितना सुरक्षित रख पाते हैं,यह एक चुनौती है. सचिन को यदि अपने गुर्जर समाज पर भरोसा है तो वे भी अब किसी एक व्यक्ति के हाथ शायद ही बंधा रहना चाहे. स्व.राजेश पायलेट के वक्त को ही देखें तो उनके चुनाव क्षेत्र दौसा में उनका जनाधार हर चुनाव में घटता ही रहा. इंदरा गांधी की हत्या के बाद 1984 के लोकसभा चुनाव में दौसा से वे पहली बार लड़े तो जीत गए लेकिन 1989 में वे जब जाट बाहुल्य क्षेत्र भरतपुर से लड़े तो हार गए. फिर वे अपनी पुरानी यानी गुर्जर बाहुल्य सीट दौसा लौट आए. इस सीट से वे 1999 के चूनाव तक सांसद रहे लेकिन ध्यान रहे कि 1999 के लोकसभा चुनाव में उनकी जीत का अंतर मात्र सात हजार पर ही अटक गया. इस तरह उनके रहते ही गुर्जर समाज का प्रभाव घटता चला गया.
 इसमें कोई शक नहीं कि सचिन पायलट में अपने दिवंगत पिता के सारे गुण विद्यमान हैं, पिता की ही तरह अगंतुकों का अभिवादन भी खास अंदाज में करते हैं.लेकिन यह सबकुछ तब कामयाब था जब तक वे खुद को कांग्रेस का पला बढ़ा किसान नेता कहते थे. सचिन ने स्वयं को अभी कांग्रेस से अलग नहीं घोषित किया है लेकिन सत्ता रूढ़ दल का प्रदेश अध्यक्ष होने के बावजूद वे  अपनी ही सरकार को संकट में डालने के आरोप से कैसे बचेंगे? आने वाले दिनों में यदि सचिन पायलट कांग्रेस से रुखसत होते हैं,जैसी कि संभावना है, तो राजस्थान के दो तीन जिलों में फैले गुर्जर समाज के लोग सचिन के साथ रहेंगे या गहलोत के?यह सवाल है जिसका जवाब गहलौत को भी ढूंढना होगा और कांग्रेस को भी.क्योंकि इस बात से बिलकुल नहीं इनकार किया जा सकता कि राजस्थान के तीन चार जिलों में फैले र्गुजर समाज की संख्या इतनी है कि उनके वोट इधर उधर हो जाने से 8 से 12 सीट प्रभावित हो सकती है.ऐसे में समझा जा सकता है कि 200 सदस्यीय राजस्थान विधानसभा में 8 से 12 विधायकों की अहमियत क्या है?






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