धर्म-धुरंधर’ फिर भीख पर गुज़ारा करेंगे

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धर्म-धुरंधर’ फिर भीख पर गुज़ारा करेंगे

शंभूनाथ शुक्ल
नई दिल्ली .धर्म धुरंधर होने का तमग़ा लटकाये ब्राह्मणों का भविष्य अंधकारमय नज़र आने लग है. इस बार केंद्रीय लोक सेवा आयोग ने मंगलवार को 2019 का नतीजा घोषित किया, उसमें 729 अभ्यर्थी सफल रहे. देश की सर्वाधिक प्रभावशाली इन नौकरियों में ब्राह्मण मात्र 0.5 परसेंट ही सफल हो पाए. यह शायद पहली बार हुआ है, कि यूपीएससी के सफल अभ्यर्थियों में ब्राह्मण और कायस्थों के नाम ग़ायब हैं. कायस्थ भी कुल एक प्रतिशत सफल रहे. अगड़ी जातियों में राजपूत अव्वल रहे, फिर मुस्लिम और बनिया. बाक़ी पिछड़े और दलित हैं. इस बार सामान्य वर्ग में भी ओबीसी का दबदबा रहा. यह संकेत है, कि क्रीमी लेयर वाली इन सरकारी नौकरियों में अगड़े अब नहीं आ पा रहे. वह भी तब, जबकि अगड़ी जातियों की पार्टी कही जाने वाली भाजपा सत्तारूढ़ है. आर्थिक रूप से कमजोर अगड़ों के लिए दस प्रतिशत आरक्षण भी है. तब यह हाल कैसे और क्यों हुआ? सच तो यह है, कि धर्म ‘धुरंधर’ कही जाने वाली इन जातियों के युवा धर्म को लेकर जितने ज़ेहादी होते जा रहे हैं, पढ़ाई-लिखाई में उतने ही सिफ़र. ऊपर से पिछड़ी और दलित जातियों के लेखक और चिंतक उन पर अनवरत हमलावर हैं. ब्राह्मणवाद के नाम पर वे ब्राह्मणों को ही मिटा देने को तत्पर हैं. भले वे हमला तुलसी पर कर रहे हों, या डॉक्टर राम विलास शर्मा पर किंतु उनका मक़सद पहले ब्राह्मणों को समाप्त करना है. क्योंकि ब्राह्मणों पर हमला करते-करते वे स्वयं ही ब्राह्मणवादी होते जा रहे हैं. तो ज़ाहिर है, वे नए ब्राह्मण बनने की तैयारी में हैं. लेकिन भारत में यह जाति का ज़हर कैसे फैला, इसकी क्रोनोलाजी समझने की ज़रूरत है.

दरअसल आज़ादी के पहले तक गाँवों में अस्सी परसेंट पटवारी कायस्थ थे. लेकिन आज़ादी की सुगबुगाहट मिलते ही उन्होंने गाँव छोड़ने शुरू कर दिए. खेती में उनकी ख़ास दिलचस्पी नहीं थी. गाँव की ज़मीन औने-पौने दामों में बेच कर वे शहर आ गए. उनके बाद की पीढ़ी ने अपनी जीविका के लिए वकालत को वरीयता दी, क्योंकि आज़ादी के चार दशकों बाद तक अदालती कामकाज में उर्दू के शब्द खूब थे. इसके बाद वे अन्य सरकारी नौकरियों में गए. फिर ब्राह्मणों ने भी गांव छोड़ा, और जीविका की तलाश में वे शहर आ गए. पीढ़ियों से पढ़ाई-लिखाई में दिलचस्पी रखने वाले ब्राह्मणों को शहर आने का लाभ मिला. आज़ादी के बाद जब हिंदी राष्ट्रभाषा हुई तो वे बाज़ी मार ले गए. कायस्थ उर्दू, फ़ारसी तक सिमटे रहे, लेकिन ब्राह्मण हिंदी, संस्कृत और अंग्रेज़ी में निकल गए. चूँकि संस्कृत और हिंदी में उन्हें विशेष श्रम की ज़रूरत नहीं थी, इसलिए उन्होंने सारा ध्यान अंग्रेज़ी में लगाया और बाक़ी ख़ाली समय में कांग्रेस की राजनीति में. वे कांग्रेस के वह वोट बैंक थे, जो इस पार्टी को लीड भी करते थे. इसके बाद बनियों ने गाँव छोड़ा, कुछ दलितों में भी. शहर में व्यापार बनियों का फला-फूला, नौकरियों कायस्थों व ब्राह्मणों को मिलीं. दस्तकारी जानने वाली जातियों ने अपने धंधे शुरू किए, और दलितों में दो तबके बने. एक, जो सरकारी नौकरी पा गया, दूसरा जो दिहाड़ी का मज़दूर बना. गाँव में राजपूत और ओबीसी तथा दलित बचे. केंद्रीय नौकरियों मंडल आयोग की सिफ़ारिश लागू कर जब वीपी सिंह ने एक नया युग शुरू किया, तो सबसे बड़ा झटका ब्राह्मणों और कायस्थों को लगा. किंतु फिर भी अपनी मेधा और श्रम से वे डटे रहे. लेकिन पिछले वर्ष गरीब अगड़ों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने की जो पॉलिसी मोदी सरकार लाई, उससे ब्राह्मणों और कायस्थों को सबसे अधिक नुक़सान हुआ.

यूपीएससी की लिखित परीक्षा में पास होने वाले अभ्यर्थियों का एक मोचक इंटरव्यू दिल्ली के मुखर्जी नगर इलाक़े में स्थित जीएस वर्ल्ड नाम के संस्थान ने इस वर्ष फ़रवरी में किया था, मुझे भी इसमें बतौर एक्सपर्ट बुलाया गया था. मैंने तब पाया था, कि अगड़ी जाति के युवाओं में देश-दुनियाँ की समझ बहुत कम है. वे बस अपनी दुनियाँ में खोये हैं, और हवाई क़िले बनाने में मगन है. उस समय दिल्ली में सीएए और एनआरसी को लेकर शाहीं बाग, चाँद बाग में प्रदर्शन चल रहे थे. अगड़ी जाति के युवाओं का रुख़ इस प्रदर्शन के बारे में निष्पक्ष तो बिल्कुल नहीं था. अगर उनकी राजनीतिक समझ इतनी कमजोर है, तो वही होगा जो हुआ है.


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