राहत इंदौरी का ऐसे चला जाना

बाबरी मस्जिद विध्वंस मामला, एक रुके हुए फैसले का इंतजार नीतीश कुमार का पलड़ा भारी है क्या ? डिजिटल इंडिया का नारा पर आधी आबादी अब भी दूर पत्रकार ने पत्रकार को पीटा चिराग पासवान की जिद से कहीं बिगड़ न जाए एनडीए का खेल चिराग पासवान की जिद से कहीं बिगड़ न जाए एनडीए का खेल शंकर गुहा नियोगी को भी याद करें नौकरी छीन रही है सरकार मौसम बदल रहा है ,खाने का जरुर ध्यान रखें किसान विरोधी कानून रद्द करने की मांग की क्या बिहार में सत्ता के लिए लोगों की जान से खेल रही है सरकार कांकेर ने जो घंटी बजाई है ,क्या भूपेश बघेल ने सुना उसे ? क्या मुग़ल काल भारत की गुलामी का दौर था? अधर में लटक गए छात्र पत्रकारों के बीमा का दायरा बढ़ाए सरकार बिहार चुनाव से दूर जाता सुशांत का मुद्दा सड़क पर उतरे ऐक्टू व ट्रेड यूनियन नेता किसानों के प्रतिरोध की आवाज दूर और देर तक सुनाई देगी क्या मोदी के वोटर तक आपकी बात पहुंच रही है .... खेती को तबाह कर देगा कृषि विधेयक- मजदूर किसान मंच

राहत इंदौरी का ऐसे चला जाना

डा शारिक अहमद खान 

राहत इंदौरी का जो मज़ाहिया अंदाज़ और तंज़ हुआ करता वो भी ख़ूब होता।राहत इंदौरी की किसी ने तस्वीर लेनी चाही तो उन्होंने कहा कि भई मेरी तस्वीर क्यों ले रहे हैं,कुछ नहीं आएगा,आपकी रील ज़ाया होगी।ये अपने रंग को लेकर उनका ख़ुद के ऊपर मज़ाहिया कमेंट था।राहत एक दौर तक पक्के शराबी रहे,बिना पिए मुशायरों में शिरकत नहीं करते।ये बात ख़ूब मशहूर थी,जहाँ जाते शराब की मांग करते।जब अधेड़ हुए तो शराब छोड़ दी।उसके बाद भी जब किसी जगह जाते और पानी पीने लगते तो लोग शक करते,राहत को एक मुद्दत तक कहना पड़ा कि भई पानी है पानी।बीती सदी के आख़िरी बरसों तक राहत के इतने जलवे नहीं थे,क्योंकि कई धांसू शायर उस वक़्त तक ज़िन्दा थे।एक बार क्या हुआ कि बीती सदी के आख़िरी के बरसों में आज़मगढ़ में एक मुशायरा था,शायर ट्रेन से शाहगंज जंक्शन पहुंचने लगे,सबको इकट्ठा किया गया,राहत भी उसमें आए थे,आयोजक मजरूह सुल्तानपुरी,ख़ुमार बाराबंकवी,कृष्ण बिहारी नूर,कैफ़ी आज़मी,महेंद्र सिंह बेदी को दो अंबेसडर कारों में बैठाकर साथ ले गए और राहत इंदौरी को जूनियर मान छोड़ दिया,उनको रोडवेज़ की बस में बैठा दिया,रास्ते में बस ख़राब हो गई,कोई रोडवेज़ की बस ही आती ना दिखे,तब राहत इंदौरी सवारी ढोने वाली जीप में पीछे बैठकर तशरीफ़ लाए,बुरा नहीं माना,कोई शिकन नहीं,मलंग आदमी थे।तब उनको नारेबाज़ शायर ही माना जाता।जब पुराने शायर फ़ानी दुनिया से रूख़्सत हो गए तो मैदान ख़ाली हुआ,अब बशीर बद्र,वसीम बरेलवी और राहत की तिकड़ी छा गई।राहत तंज़ ख़ूब करते।एक नेता के घुटनों में दर्द हो गया।वो कुंवारे थे,राहत इंदौरी मंच से पढ़ा करते कि 'चेहरा ज़र्द-ज़र्द कैसा है,आईना गर्द-गर्द कैसा है,काम जब कभी घुटनों से लिया ही नहीं,तो फिर ये घुटनों में दर्द कैसा है'।ठहाके लगते।राहत दोअर्थी शेर भी ख़ूब पढ़ा करते।मसलन'शहरों में तो नमरूदों का मौसम है,गाँव चलो,अमरूदों का मौसम है'।फिर कहते कि आप वही लोग हैं जो अमरूदों का मतलब जानते हैं।ये भी पढ़ते कि 'चांद रात दरिया में कुछ यूँ उतर आया,इस कश्ती पर ख़ूब सवारी किया करो '।ये पढ़ने के साथ-साथ पेट के नीचे का अगला हिस्सा ज़रा आगे-पीछे ले जाकर हिलाते,कहते कि भोर होने को आयी,जाइये कश्ती में सवारी कीजिए,भोर में कश्ती की सवारी का मज़ा ही दूसरा है।गंभीर शेरों के बाद वो इस तरह मज़ाकिया शेर पढ़कर माहौल को हल्का कर देते और ठहाके लगवा देते।उनको महफ़िल लूटने की कला बाद में ख़ूब आ गई थी,राहत समझ गए थे कि अब मुशायरे के ज़्यादातर श्रोताओं का मानसिक स्तर कैसा है,उसी स्तर की बातें कर वो मुशायरा लूट लेते।युवाओं को ख़ुश रखते,वजह कि मुशायरा युवा ही लुटवाते हैं।एक बार तो उन्होंने बनारस में कहा कि मैं यहाँ बनने आया था नज़ीर बनारसी,लेकिन आप लोगों का लेवल देखकर सांड बनारसी बन जाता हूँ।आज कोरोना की वजह से राहत इंदौरी की बेवक़्त हुई मौत ने उदास कर दिया,अभी ये उनके जाने की उम्र नहीं थी।दिल के वो पुराने मरीज़ थे,उनको इसका आभास था,कई बार उन्होंने कहा भी कि शायद ये मेरा आख़िरी मुशायरा हो।अलविदा राहत इंदौरी,आप अपने कलामों की वजह से हमेशा ज़िन्दा रहेंगे।फ़िरकापरस्तों को ललकारते गए कि 'सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में,किसी के बाप का हिंदोस्तान थोड़ी है '।

  • |

Comments

Subscribe

Receive updates and latest news direct from our team. Simply enter your email below :