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परिजन आंदोलन में बदला बहुजन आंदोलन

राजेन्द्र कुमार 

लखनऊ .बीएसपी सुप्रीमों मायावती अदभुत हैं. वह बिजली की तेज़ी से फैसले लेती हैं. किसी दल से राजनीतिक गठबंधन करना हो या उसे तोड़ना हो. इसका फैसला करने में वक्त जाया नहीं करती. अपनी इसी आदत के अनुसार उन्होंने 23 जून की दोपहर अपने भाई आनंद कुमार को फिर से बहुजन समाज पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अपने भतीजे आकाश आनंद को राष्ट्रीय कोआर्डिनेटर बनाये जाने का ऐलान कर दिया. अपने भाई को पार्टी में अपने बाद नंबर दो की हैसियत देने का फैसला उन्होंने दूसरी बार लिया है. इसके आलावा मायावती ने बीते चुनाव के दौरान पहली बार एक चुनावी सभा में मायावती का लिखित भाषण पढ़ने वाले आकाश आनंद को रामजी गौतम के साथ राष्ट्रीय कोआर्डिनेटर बनाये जाने का भी निर्णय लिया है. मायावती के इन फैसलों से कांशीराम में आस्था रखने वाले बीएसपी समर्थक सकते में हैं. कांशीराम के इन समर्थकों को लगता है कि बीएसबी मुखिया मायावती ने अब पार्टी के संस्थापक कांशीराम की सोच को ताक पर रखने का फैसला कर लिया है. जिसके चलते अब मायावती खुद पार्टी में परिवारवाद को बढ़ाने में जुट गई है, जबकि पहले खुद मायावती दूसरे दलों पर परिवारवाद को बढ़ाने का आरोप लगाती थी.

कांशीराम के साथ काम कर चुके कई दलित नेताओं ने मायावती के फैसले की निंदा की है. इन नेताओं के अनुसार  कांशीराम ने दलित आंदोलन के प्रति पूर्ण समर्पण के लिए अपने परिवार से सारे संपर्क तोड़ लिए थे. और  मायावती को अपना राजनीतिक वारिस बनाया था. कांशीराम ने यह उम्मीद की थी कि मायावती दलित समाज को आगे बढ़ाएंगी, अपने परिवार को नहीं. जिन्होंने कांशीराम के साथ काम किया है और उनके संघर्ष की दास्तान को पढ़ा है, वह जानते हैं कि  देश के दलित आंदोलन को व्यापक रूप देने और बामसेफ तथा डीएस-4 जैसे संगठनों के जरिए बहुजन समाज पार्टी को खड़ा करने वाले कांशीराम ने अपने परिवार को छोड़ किया था, ताकि दलित समाज के लिए पूरे जीवन काम कर सकें. कांशीराम के साथ काम कर चुके आरके चौधरी बतातें हैं कि सन् 1978 में बामसेफ (बैकवर्ड एंड माइनॉरिटीज कम्युनिटीज एम्प्लॉई फेडरेशन) को संगठन का औपचारिक रूप देने के बाद कांशीराम ने पुणे में अपनी नौकरी छोड़ दी थी. फिर वह  पूरी तरह दलित आंदोलन के लिए समर्पित हो गए और यह फैसला किया कि अब अपने परिवार से भी कोई ताल्लुक नहीं रखेंगे. आरके चौधरी के मुताबिक़ परिवार के दूरी बनाने के बाद कांशीराम ने ना तो अपनी बहन से राखी बंधवायी और ना ही उसकी शादी में भी शामिल होने गए. ना  ही उसकी अचानक हुई मृत्यु पर गए. बड़े बेटे होने के बावजूद वे अपने पिता की चिता को अग्नि देने नहीं गये. ऐसे कांशीराम के संपत्ति अर्जित करने का तो सवाल ही नहीं था. नौकरी छोड़ने के बाद वे अपने बकाया भत्ते लेने भी दफ्तर नहीं गए थे. कांशीराम का पूरा जीवन दलितों की आजादी और उनके अधिकारों के लिए जबर्दस्त संघर्ष और त्याग का उदाहरण है. मायावती से भी उन्होंने ऐसी ही अपेक्षा की थी, जब यह कहा था कि मेरी दिली तमन्ना है कि मेरी मृत्यु के बाद मायावती मेरे कामों को आगे बढ़ाएंगी. 

अब उन्ही मायावती ने दूसरी बार अपने भाई को बीएसपी में नंबर दो बना दिया है. इससे पहले मायावती ने वर्ष 2017 में लम्बे समय से पार्टी उपाध्यक्ष रहे राजाराम को बिना कारण बताते हुए हटाकर आनंद  को उपाध्यक्ष बनाया था. फिर उन्होंने आनंद को देशभर के प्रमुख शहरों में रैली करके घुमाया, ताकि लोगों को यह संदेश दिया जा सके कि  मेरे बाद  पार्टी की कमान यही संभालेंगे. परन्तु जब इसका जनता में कोई रिस्पांस नहीं आया तो आनंद को  हटाकर मायावती ने एक अन्य अनजान चेहरा जय प्रकाश सिंह को उपाध्यक्ष बना दिया, फिर उसको भी हटकर रामजी गौतम को उपाध्यक्ष बना दिया. और अब फिर अपने भाई को पार्टी में जगह दे दी. हालांकि मायावती ने अपने भाई आनंद कुमार को पिछले दरवाज़े से बसपा की कमान देने की शुरुआत वर्ष 2007 में ही कर दी थी. तब मायावती सरकार में पंचमतल पर तैनात रहे एक आईएएस अफसर के अनुसार, मायावती ने वर्ष 2007 में बहुजन प्रेरणा ट्रस्ट बनाकर बीएसपी की दिल्ली, नोएडा, लखनऊ जैसे शहरों की प्रॉपर्टी को धीरे-धीरे इस ट्रस्ट के नाम करना शुरू किया था. वो ख़ुद इस ट्रस्ट की अध्यक्ष हैं, और उनके भाई उसके सदस्य. अन्य सदस्यों के नामों को लेकर उक्त अधिकारी कहते हैं की इन नामों का खुलासा वह नहीं करेंगे. लेकिन इतना तय है कि बहुजन प्रेरणा ट्रस्ट को मैनेज करने के बहाने आनंद कुमार 2009 से पिछले दरवाज़े से बसपा को भी मैनेज कर रहे हैं, क्योंकि पार्टी का ज़्यादातर संसाधन इसी ट्रस्ट के नाम है. ऐसे में मायावती को अपने भाई आनंद जो कि एक रियल एस्टेट बिजनेसमैन हैं, की जरूरत है. 

शायद इसी सोच के तहत उन्होंने अपने भाई को फिर पार्टी में जिम्मेदारी दी है. और अपने इस फैसले की होने वाली आलोचना की उन्हें परवाह नहीं है. हालांकि परिवार के लोगों और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों के लोगों को ही पार्टी में बढ़ावा देने से अति-पिछड़े समाज के तमाम नेता पार्टी में उपेक्षित महसूस कर रहें हैं, मायावती को इसकी जानकारी भी है, पर वह आनंद और आकाश को पार्टी में बढ़ाने में लगी हैं. जिसे देखते हुए एक बुजुर्ग बीएसपी नेता कहतें हैं, कि कांशीराम जी गरीब दलित व्यक्ति के यहां जाने में संकोच नहीं करते थे. उन्होंने दलित समाज की सभी जातियों को बीएसपी से जोड़ने का प्रयास किया, इसलिए वह बहुजन समाज के बड़े नेता बने.  जबकि मायावती अब दलित समाज ही कुछ ही जातियों की नेता रह गई हैं. बीते चुनाव परिणाम से यह साबित भी हुआ है, इसी लिए अब कहा जा रहा है कि  कांशीराम जी बहुजनों के नेता थे, और अब मायावती परिजनों की नेता बन कर ही रह गई हैं.

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