कृष्ण पर राममनोहर लोहिया

शंकर गुहा नियोगी को भी याद करें नौकरी छीन रही है सरकार मौसम बदल रहा है ,खाने का जरुर ध्यान रखें किसान विरोधी कानून रद्द करने की मांग की क्या बिहार में सत्ता के लिए लोगों की जान से खेल रही है सरकार कांकेर ने जो घंटी बजाई है ,क्या भूपेश बघेल ने सुना उसे ? क्या मुग़ल काल भारत की गुलामी का दौर था? अधर में लटक गए छात्र पत्रकारों के बीमा का दायरा बढ़ाए सरकार बिहार चुनाव से दूर जाता सुशांत का मुद्दा सड़क पर उतरे ऐक्टू व ट्रेड यूनियन नेता किसानों के प्रतिरोध की आवाज दूर और देर तक सुनाई देगी क्या मोदी के वोटर तक आपकी बात पहुंच रही है .... खेती को तबाह कर देगा कृषि विधेयक- मजदूर किसान मंच दशहरे से दिवाली के बीच लोकतंत्र का पर्व बेनूर हो गई वो रुहानी कश्मीरी रुमानियत सिविल सर्जन तो भाग खड़े हो गए चंचल .. चलो भांग पिया जाए क्यों भड़काने वाले बयान देते हैं फारूक अब्दुल्ला एक समाजवादी धरोहर जेपी अंतरराष्ट्रीय सेंटर को बेचने की तैयारी

कृष्ण पर राममनोहर लोहिया

-राममनोहर लोहिया

कृष्ण की सभी चीजें दो हैं, दो मां, दो बाप, दो नगर, दो प्रेमिकाएं, या यों कहिए अनेक। जो चीज संसारी अर्थ में बाद की या स्वीकृत या सामाजिक है, वह असली से भी श्रेष्ठ और अधिक प्रिय हो गयी है। यों कृष्ण देवकीनन्दन भी हैं, लेकिन यशोदानन्दन अधिक। ऐसे लोग मिल सकते हैं जो कृष्ण की असली मां, पेट-मां का नाम न जानते हों, लेकिन बाद वाली, दूध वाली, यशोदा का नाम न जानने वाला कोई विरला ही होगा। उसी तरह, वासुदेव कुछ हारे हुए से हैं, और नन्द को असली बाप से कुछ बढ़कर ही रुतबा मिल गया है। द्वारका और मथुरा की होड़ करना कुछ ठीक नहीं, क्योंकि भूगोल और इतिहास ने मथुरा का साथ दिया है। किन्तु यदि कृष्ण की चले तो द्वारका और द्वारकाधीश, मथुरा और मथुरापति से अधिक प्रिय रहे। मथुरा से तो बाललीला और यौवन-क्रीड़ा की दृष्टि से, वृन्दावन और बरसाना वगैरह अधिक महत्वपूर्ण हैं। प्रमिकाओं का प्रश्न जरा उलझा हुआ है। किसकी तुलना की जाए, रुक्मिणी और सत्यभामा की, राधा और रुक्मिणी की, या राधा और द्रौपदी की। प्रेमिका शब्द का अर्थ संकुचित न कर सखा-सखी भाव को ले के चलना होगा। अब तो मीरा ने भी होड़ लगानी शुरू की है। जो हो, अभी तो राधा ही बड़भागिनी है कि तीन लोक का स्वामी उसके चरणों का दास है। समय का फेर और महाकाल शायद द्रौपदी या मीरा को राधा की जगह न पहुंचाएं, लेकिन इतना सम्भव नहीं लगता। हर हालत में रुक्मिणी राधा से टक्कर कभी नहीं ले सकेगी। 

कृष्ण के पहले, भारतीय देव, आसमान के देवता हैं। निस्सन्देह, अवतार कृष्ष्ण के पहले से शुरू हो गई। किन्तु त्रेता का राम ऐसा मनुष्य है जो निरन्तर देव बनने की कोशिश करता रहा। इसीलिए उसमें आसमान के देवता का अंश कुछ अधिक है। द्वापर का कृष्ण ऐसा देव है, जो निरन्तर मनुष्य बनने की कोशिशकरता रहा। उसमें उसे सम्पूर्ण सफलता मिली। कृष्ण सम्पूर्ण और अबाध मनुष्य है, खूब खाया-पिलाया, खुद प्यार किया और प्यार सिखाया, जनगण की रक्षा की और उसका रास्ता बताया, निर्लिप्त भोग का महान् त्यागी और योगी बना। 

इस प्रसंग में यह प्रश्न बेमतलब है कि मनुष्य के लिए, विशेषकर राजकीय मनुष्य के लिए, राम का रास्ता सुकर और उचित उचित है या कृष्ण का। मतलब की बात तो यह है कि कृष्ण देव होता हुआ निरंतर मनुष्य बनता रहा। देव और निस्व और असीमित होने के नाते कृष्ण में जो असम्भव मनुष्यताएं हैं जैसे झूठ, धोखा और हत्या, उनकी नकल करने वाले लोग मूर्ख हैं, उसमें कृष्ण का क्या दोष। कृष्ण की सम्भव और पूर्ण मनुष्यताओं पर ध्यान देना ही उचित है, और एकाग्र ध्यान। कृष्ण ने इन्द्र का हराया, वास लेने वाले देवों को भगाया, खाने वाले देवों को प्रतिष्ठित किया, हाड़, खून, मांस वाले मनुष्य को देव बनाया, जनगण में भावना जागृत की कि देव को आसमान में मत खोजो, खोजों यहीं अपने बीच, पृथ्वी पर। पृथ्वी वाला देव खाता है, प्यार करता है, मिल कर रक्षा करता है। 

बेचारे कृष्ण ने इतनी निःस्वार्थ मेहनत की, लेकिन जन-मन में राम ही आगे रहा। सिर्फ बंगाल में ही पूर्व-‘‘बोल हरि, हरि बोल‘‘ के उच्चारण से-अपनी आखरी यात्रा पर निकाले जाते हैं, नहीं तो कुछ दक्षिण को छोड़कर सारे भारत में हिन्दू मुर्दे-‘‘राम नाम सत्य है‘‘ के ही साथ ले जाये जाते हैं। बंगाल में इतना तो नहीं, किर भी उड़ीसा और असम में कृष्ण का स्थान अच्छा है। कहना मुश्किल है कि राम और कृष्ण में कौन उन्नीस, कौन बीस है। सबसे आश्चर्य की बात है कि स्वयं ब्रज के चारों ओर की भूमि के लोग भी वहां एक दूसरे को ‘‘जैरामजी‘‘ से नमस्ते करते हैं। सड़क चलते अनजान लोगों को भी यह ‘‘जैरामजी‘‘ बड़ा मीठा लगता है, शायद एक कारण यह भी हो। 

राम त्रेता के मीठे, शान्त और सुसंस्कृत युग का देव है। कृष्ण पके, जटिल, तीखे अैर प्रखर बुद्धि युग का देव है। राम सत्य है। कृष्ण अगम्य हैै। कृष्ण ने इतनी अधिक मेहनत की कि उसके वंशज उसे अपना अंतिम आदर्श बनाने से घबड़ाते हैं, यदि बनाते भी हैं, तो उसके मित्रभेद और कूटनीति की नकल करते हैं, उसका अथक निस्व उनके लिए असाध्य रहता है। इसीलिए कृष्ण हिन्दुस्तान में कर्म का देव न बन सका। कृष्ण ने कर्म राम से ज्यादा किये हैं। कितने सन्धि और विग्रह और प्रदेशों के आपसी सम्बन्धों के धागे उसे पलटने पड़ते हैं। यह बड़ी मेहनत और बड़ा पराक्रम था। इसके यह मतलब नहीं कि प्रदेशों के आपसी सम्बन्धों में कृष्ण-नीति अब भी चलायाी जाए। कृष्ण जो पूर्व-पश्चिम की एकता दे गया, उसी के साथ-साथ उस नीति का औचित्य भी खतम हो गया। बच गया कृष्ण का मन, और उसकी वाणी। और बच गया राम का कर्म। अभी तक हिन्दुस्तानी इन दोनों का समन्वय नहीं कर पाये हैं। करें, तो राम के कर्म में भी परिवर्तन आये। राम रोऊ हैं। इतना कि मर्यादा भंग होती है। कृष्ण कभी रोता नहीं। आंखें जरूर डबडबाती हैं उसकी, कुछ मौकों पर जैसे जब किसी सखी सा नारी को दुष्ट लोग नंगा करने की कोशिश करते हैं। (एक लंबे निबंध का अंश)।

  • |

Comments

Subscribe

Receive updates and latest news direct from our team. Simply enter your email below :