जानलेवा होती टीवी की डिबेट !

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जानलेवा होती टीवी की डिबेट !

आलोक जोशी
कांग्रेस प्रवक्ता और मेरे मित्र राजीव त्यागी का न रहना सिर्फ एक दुखद सूचना नहीं है. यह एक खतरे की घंटी है. यह मीडिया और राजनीति के लिए प्रेशर कुकर की सीटी है. बल्कि इसे किसी इंडस्ट्रियल केमिकल प्लांट का प्रेशर अलार्म कहना ज्यादा सही होगा. क्योंकि इसकी अनदेखी का नतीजा भोपाल गैस कांड जैसा गंभीर हादसा भी हो सकता है.
जब पत्रकारिता का एक पैमाना ‘लंग पावर’ यानी फेफड़े का दम हो जाए, तो टीवी डिबेट के तनाव का जानलेवा हो जाना अनहोनी तो नहीं है. ‘लंग पावर’ मेरी इजाद नहीं है, इस देश के बहुत बड़े समाचार नेटवर्क के आला अफसर की जुबान से निकली तारीफ़ है जो उन्होंने अपने एक खास होनहार सितारे की शान में ट्रॉफी की तरह पेश की थी और अक्सर करते रहते थे.

और संगठनों में और लोग भी करते ही होंगे, तभी तो फेफड़ों में हवा भरने और उसे पूरे ज़ोर के साथ आवाज़ बनाकर निकालने का काम ही टेलिविजन पत्रकारिता का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है. इससे ठीक पहले विचित्र किंतु सत्य और मनोहर कहानियां ब्रांड प्रोग्रामिंग उस पत्रकारिता को तो हाशिए पर पहुंचा ही चुकी थी, जिसे ज़िंदा रखने की, हर कीमत पर बचाए रखने की कसमें आज भी खाई जाती हैं और खाई जाती रहेंगी.

लेकिन तभी एक विस्फोट हुआ और सब कुछ बदल गया. यह विस्फोट अंग्रेजी में हुआ था, मगर इसकी गूंज हिंदी ही नहीं भारत की हर भाषा में और दिल्ली, मुंबई से लेकर देश के हर हिस्से तक तेज़ी से पहुंची थी. यह कारनामा भी किसी पत्रकार का नहीं एक मीडिया मालिक का था. अखबारों के बड़े साम्राज्य का विस्तार करने के लिए टीवी चैनल खोला था. उन्होंने कहा – ‘टेलिविज़न इज ऑल अबाउट नॉइज़’ यानी टीवी का मतलब बस चिल्ला चौंट ही है. और अपने इस दिव्य विचार को साकार करने के लिए उन्हें एक अर्जुन भी मिल गया था. अर्जुन ही तो था जिसे चिड़िया की आंख के अलावा कुछ दिखता नहीं था. उसने अपने आका की इच्छा पूरी करने का संकल्प भी उठा लिया था.
बात दिखता नहीं था तक ही सीमित नहीं थी, उसे कुछ सुनाई भी नहीं पड़ता था. वो किसी को बोलने भी नहीं देता था. आठ, 10 या 12 लोगों तक को साथ बैठाकर उन्हें लगातार चुप कराता रहता था. उसमें अद्भुत ‘लंग पावर’ थी. एक घंटे, डेढ़ घंटे, या और भी समय तक वो लगातार बोल सकता था. बीच बीच में अफेक्ट के लिए आवाज़ हल्की कर लेता, मगर बोलना बंद नहीं करता. शायद योगगुरु ने सिखाया होगा. बहुत से लोग, बहुत दिन तक उसे देखते रहे. देखते ही रहे. इतना देखते रहे कि वो उनकी ज़िंदगी में शामिल होने लगा. वो टीवी के सामने बैठकर उसके साथ बोलने लगे थे. कुछ उसके स्वर में स्वर मिलाते थे, कुछ उसके खिलाफ़ बोलते थे. मगर यह सब वो उसे देखते हुए ही करते थे. इस बीच घर का कोई दूसरा बोले तो उन्हें गुस्सा भी आता था. कोई मेहमान भी.

अब बात हो, बहस हो, शोर हो तो ऐसा कि आग लग जाए. और पर्दे पर सचमुच आग लगा दी गई. पूरे समय नीचे जलती हुई लपटें लपलपाती रहती थीं. और ऊपर चलता था वो जो ये देश जानना चाहता था, अब पता चला है कि पूछता था देश – अंग्रेजी में. इस आग लगाऊ बहस का नतीजा निकला कि वही देश बन गया. वही देश की आवाज़ बन गया. टीआरपी का जलवा दिखा तो पूरे शहर में हड़कंप. हर तरफ़ यही कोशिश कि अब तो हमें भी देश की आवाज़ ही बन जाना है. अंग्रेजी, हिंदी और बाकी सारी जुबानें ही बेमतलब हो गईं. बस फेफड़े में दम और आग जलाने वाली माचिस. इतना ही काफ़ी मान लिया गया.

दूसरे चैनलों में भी धड़ाधड़ स्पाइरोमीटर लगाकर दमदार फेफड़ों की खोज कर ली गई. कुछ प्रतिभाएं पहले से ही मौजूद थीं, जिन्हें उससे पहले के दौर में तिनके का पहाड़ बनाने की महारत हासिल हो चुकी थी, बस अंदाज़ बदलना था, और बाकी कुछ नए होनहार भी मैदान में अपने करतब दिखाने को बेताब थे ही. कहानी अभी थमी नहीं है. बस फर्क यह है कि स्क्रीन पर आग लगाने से बढ़कर अब सचमुच की आग लगाने तक का सफर चल रहा है.

कुछ ही साल पहले रवीश कुमार ने कहा था – ‘ये टीवी आपको बीमार, बहुत बीमार कर देगा.’ एकदम सिगरेट की तरह. बात गलत तो नहीं, मगर अजीब ज़रूर लगी थी. यह आदमी टीवी पर ही बैठकर टीवी को बीमारी बता रहा है. शर्म नहीं आती इसे. फिर एक अवॉर्ड फंक्शन में उसने कहा ‘आप लोग टीवी मत देखिए, मुझे भी मत देखिए.’ तब भी अजीब लगा. फिर तो सिलसिला सा बन गया, वो घूम घूमकर जगह-जगह यही बात कहता रहा. आज भी कह रहा है. अब उसे सुनना उतना अजीब भी नहीं लगता.

बहुत से लोग मिलते हैं जो कहते हैं कि हमने टीवी देखना बंद कर दिया है. डीटीएच का रीचार्ज नहीं कराया और घर में किसी को याद भी नहीं आता. लेकिन क्या इससे बीमारी दूर हो गई? अब आपको टीवी देखने के लिए टीवी की ज़रूरत नहीं है. आपका मोबाइल भी टीवी है और आपके बच्चों का भी. आपके परिवार में पहले तो सबको यह खबर रहती थी कि कौन क्या देख रहा है और लोग टोक देते थे. अब तो किसी को खबर भी नहीं कि दूसरा देख क्या रहा है, पढ़ क्या रहा है.

और टीवी पर आने के साथ ही किसी मसालेदार झगड़े की क्लिप तुरंत सोशल मीडिया पर वायरल हो जाती है. बुधवार शाम जिस वक्त दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी के सबसे प्रखर प्रवक्ता ने ट्विटर पर अपने मित्र राजीव त्यागी को श्रद्धा सुमन अर्पित किए, उसके कुछ ही मिनट के भीतर आज की ही उस डिबेट के टुकड़े वहां छा गए जिनमें वो उन्हें जयचंद बता रहे थे और जन्माष्टमी के दिन उनके माथे पर लगे तिलक का मज़ाक उड़ा रहे थे.

ही नहीं डॉक्टर का बयान भी आ गया कि राजीव त्यागी को टीवी डिबेट के दौरान ही दिल का दौरा पड़ा. और कुछ ही देर में उस डिबेट के वो हिस्से भी आ चुके थे जिनमें राजीव जी कुछ असहज से नज़र आ रहे थे, यह कहना मुश्किल है मगर असंभव नहीं कि शायद उन्हें बेचैनी होने लगी थी, वो हिल डुल रहे थे. मगर यह तो कहा ही जा सकता था कि राजीव त्यागी की आवाज़ बंद की जा चुकी थी और वे अपनी बात पूरी नहीं कर पाए थे. बात पूरी भी हो जाती तो क्या होती अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है.



लेकिन बात को नहीं, बात के मर्म को समझना ज़रूरी है. टीवी तो एक यंत्र या उपकरण है. उसका कोई दोष नहीं. दोष तो उसके भीतर माल भरने वाले मनुष्यों का है. आपको बंद करना है तो उन्हें देखना सुनना ही बंद करना होगा. बंद करेंगे तभी उन पर दबाव बनेगा कि वो कुछ बेहतर करें. और यह काम जल्दी नहीं किया तो खतरा बढ़ता जा रहा है. क्योंकि चैनलों में, अखबारों में और वेबसाइटों में काम करने वाले तमाम मनुष्य तो रोबोट बन ही चुके हैं. अनुमान है कि जल्दी ही उनकी जगह असली रोबोट भी आ सकते हैं. तब तक हालात बदले नहीं तो प्रोग्रामर ऐसे ही रोबोट बना देगा. डिबेट के हिस्सेदार भी रोबोट बन सकते हैं लेकिन तब देखने वाले कब तक इंसान बने रहेंगे? इस सवाल का जवाब ही राजीव त्यागी को श्रद्धांजलि हो सकता है. और समाचार माध्यमों की सामूहिक आत्महत्या को भी शायद टाल सके.द प्रिंट से साभार 

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