प्रणब मुखर्जी -दो बार हाथों से फिसली थी प्रधानमंत्री की कुर्सी

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प्रणब मुखर्जी -दो बार हाथों से फिसली थी प्रधानमंत्री की कुर्सी

प्रभाकर मणि तिवारी

कोलकाता.अंग्रेजी में दो मशहूर कहावतें हैं—--देयर इज मेनी ए स्लिप बिटवीन द कप एंड द लिप और सो नियर येट सो फार. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी पर यह दोनों एकदम सटीक बैठती हैं. पांच दशक से भी लंबे राजनीतिक करियर में कम से कम दो ऐसे मौके आए थे जब प्रधानमंत्री की कुर्सी उनकी पहुंच के भीतर थी. लेकिन तेजी से बदले राजनीतिक समीकरणों की वजह से दोनों बार यह कुर्सी उनके हाथों से फिसल गई थी. अगर ऐसा नहीं होता तो प्रणब के नाम इस पद तक पहुंचने वाले पश्चिम बंगाल के पहले नेता का रिकार्ड दर्ज होता.

प्रणब दा के नाम से मशहूर प्रणब मुखर्जी के जीवन में प्रधानमंत्री बनने का पहला मौका वर्ष 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के तुरंत बाद आया था. उस रात वे कोलकाता से विशेष विमान से दिल्ली पहुंचे थे. लेकिन बाद में अंदरखाने बदले समीकरणों की वजह से राजीव गांधी को प्रधानमंत्री की शपथ दिला दी गई. इसी तरह वर्ष 2004 के लोकसभा चुनावों के बाद जब सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर दिया तो प्रणब का इस कुर्सी पर पहुंचना लगभग तय माना जा रहा था. लेकिन इस बार भी बाजी आखिरी क्षणों में पलट गई थी.

वर्ष 1984 में अक्तूबर के आखिरी दिन प्रणब मुखर्जी राजीव गांधी के साथ पश्चिम बंगाल के दौरे पर थे. उसी समय इंदिरा गांधी की हत्या की खबर मिली. अपनी आत्मकथा द टर्बूलेंट ईयर्सः1980—1996 में वे लिखते हैं, “यह खबर मिलते ही मेरी आंखों से आंसू निकलने लगे और मैं बेतहाशा रोने लगा. कुछ देर बाद ही खुद को संभाल सका. आखिर राजनीति में मैं जो भी था उनकी दौलत ही वहां तक पहुंचा था.” राजीव गांधी के साथ विशेष विमान से प्रणब जब तक दिल्ली पहुंचे तब तक प्रधानमंत्री के नाम पर शह औऱ मात का सियासी खेल शुरू हो गया था और इसमें उनको मात खानी पड़ी. लेकिन कुछ महीने बाद मुखर्जी को अपने करियर का सबसे करारा झटका उस समय लगा जब लोकसभा चुनावों के बाद मंत्रिमंडल के गठन के समय राजीव गांधी ने उनको जगह नहीं दी. मुखर्जी ने लिखा है, “जब मुझे केबिनेट में शामिल नहीं किए जाने की जानकारी मिली तो मुझे बेहद झटका लगा था. लेकिन फिर भी मैंने खुद को संयत रखा और पत्नी के साथ टेलीविजन पर शपथग्रहण समारोह देखा.”


उसके बाद वर्ष 1986 में उन्होंने पश्चिम बंगाल में राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस का गठन किया. लेकिन तीन साल बाद राजीव गांधी के साथ समझौता होने पर उनकी पार्टी का कांग्रेस में विलय हो गया था.

वर्ष 2004 के लोकसभा चुनावों के बाद सोनिया गांधी ने जब प्रधानमंत्री पद की पेशकश ठुकरा दी तो माना जा रहा था कि वे यह जिम्मा प्रणब मुखर्जी को ही सौंपेंगी. प्रणब को भी यही उम्मीद थी. उन्होंने द कोलिशन ईयर्स (1996-2012) में लिखा है, “सोनिया गाधी के इंकार के बाद सबको यही उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री पद के लिए अगली पसंद मैं ही रहूंगा. शायद सरकार में मेरे व्यापक अनुभव की वजह से यह उम्मीद बंधी होगी. दूसरी ओर, मनमोहन सिंह एक नौकरशाह थे औऱ पांच साल तक सुधारवादी वित्त मंत्री रहे थे.”


लेकिन तमाम उम्मीदों के विपरीत सोनिया ने प्रणब की जगह प्रधानमंत्री पद के लिए मनमोहन सिंह को चुना और एक बार फिर यह कुर्सी प्रणब के हाथों से फिसल गई. कोई तीन साल पहले अक्तूबर, 2017 में प्रणब की आत्मकथा के तीसरे खंड द कोलिशन ईयर्सः1996-2012 के विमोचन समारोह में कांग्रेस में उनके सहयोगी पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यह कह कर सबको चौंका दिया था कि मुखर्जी प्रधानमंत्री पद के लिए उनसे योग्य उम्मीदवार थे. सिंह ने कहा था, “वर्ष 2004 में सोनिया जी ने मुझे प्रधानमंत्री चुना था. तब प्रणब जी मेरे सबसे योग्य सहयोगी थे. उनके पास नाराज़गी की वजह थी. प्रधानमंत्री पद के लिए वह मुझसे बेहतर औऱ योग्य उम्मीदवार थे. लेकिन उनको यह भी मालूम था कि इस मामले में मेरे पास कोई विकल्प नहीं था.”


हालांकि, प्रणब ने इंडिया टूडे को दिए गए एक इंटरव्यू में इस बात से इंकार कर दिया कि मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने की वजह से वह निराश थे. उनका कहना था, “मैं निराश नहीं था. राजनीतिक करियर में ज्यादातर समय तक राज्यसभा का सदस्य होने और हिंदी नहीं जानने की वजह से मैं देश का प्रधानमंत्री बनने के काबिल नहीं था. पहली बार 2004 में मैंने लोकसभा चुनाव जीता था.” प्रणब ने कहा था, “लोकसभा चुनाव जीतने के बावजूद मुझे हिंदी नहीं आती थी. औऱ हिंदी जाने बिना किसी को प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा नहीं पालनी चाहिए. कामराज ने एक बार कहा था...हिंदी नहीं तो प्रधानमंत्रित्व भी नहीं.”

वर्ष 2012 में कांग्रेस ने जब उनको राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया तो राजनीतिक हलकों में यही संदेश गया कि दो-दो बार प्रधानमंत्री की दावेदारी हाथ से निकलने की वजह से ही कांग्रेस ने उनको मुआवज़े के तौर पर राष्ट्रपति भवन भेजने का फैसला किया है.

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