जनादेश

जेएनयू में यह सब क्यों हो रहा है. कानून के राज को 'एक झटका' यह फैसला दिक्कत पैदा कर सकता है ! मेरे मित्र टीएन शेषन ! मोदी सरकार के समर्थन का यह कीमत मिली - तवलीन फैसला विसंगतियों से भरा- भाकपा (माले) तथ्यों से धराशाही हुए सियासत के तर्क! आरटीआई की धार भोथरी करती सरकार ! शाहनजफ़ इमामबाड़ा में ईद-ए-ज़हरा ! भाषा को रामनामी से मत ढकिये ! पर रात का खीरा तो पीड़ा ! नीतीश कुमार के दावे हवा-हवाई झारखंड चुनाव में बिखर रही हैं गंठबंधन की गांठें जांच के नामपर लीपापोती तो नहीं ? पीएफ घोटाले में बचाने और फंसाने का खेल ? कश्मीर के बाद नगालैंड की बारी ? गोंडा जंक्शन ! कभी इस डाक बंगला में भी तो रुके ! बिकाऊ है चंडीगढ़ रेलवे स्टेशन,खरीदेंगे ? झटका तो यूपी बिहार में भी लग गया !

एसपी फिर याद आए

चंचल 

मित्र संतोष भारती के इस कथन से हम कत्तई सहमत नही हैं कि- एसपी में भगवान शंकर के सारे गुण मौजूद थे .एसपी जिंदा होते तो हम एसपी के सामने ही जो जवाब देते वह यकीनन ' नॉन वेज ' भाषा मे एक 'वल्गर ' संकेत होता और सबसे ज्यादा उस पर एस पी हंसते . हम लोंगो के बीच जो संवाद हिट होते रहे वो सब इसी तरह के रहे . गवाह जिंदा है - भाई राम कृपाल , कमर वहीद नकवी , बाकी तो अब उदयन रहे नही , राजीव शुक्ला क्रिकेट के ठेके में हैं . 

मुआफी चाहता हूं भाई ! एसपी का मतलब सुरेंद्र प्रताप सिंह , संपादक , रविवार , नवभारत टाइम्स और 'आजतक ' चैनल का हीरो . बात इनके बारे में हो रही है . मैकियावेली का 'डिस्कोर्स ' न पढ़ा होता तो एस पी के उस हरकत को निहायत ही घटिया और दुर्भाग्यपूर्ण बताता जो उन्होंने हमारे साथ 78 मे बहैसियत एक पत्रकार के की थी . 77 में हम विश्विद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष बने . इसी समय एस पी से हमारी दोस्ती हो गई थी . 78 तक आते आते कलकत्ता के अमृत बाजार पत्रिका के हिंदी प्रकाशन ' रविवार ' ने जिसके संपादक सुरेंद्र प्रताप रहे , हमे निशाने पर ले लिए . 

रविवार की कवर स्टोरी आई 

चंचल : असामाजिक तत्वों का ठेकेदार . 

लेखक एक छद्म नाम जिसे हम हम जानते थे, जिसके दो रिश्तेदारों के बच्चों का दाखिला हमने विश्वविद्यालय में उसी के कहने पर कराया था . आज हम उस पर अनगिनत वजह बता सकते हैं कि उसने ऐसा क्यों किया ? लेकिन क्या फायदा . पत्रकारिता के लिहाज से वह निहायत ही घटिया और नीच दस्तावेज था . बाद में एस पी ने उसे स्वीकारा . ' चंचल शराब और शबाब में डूबा रहता है ' यहां तक जायज था . तुम्हे कुंठा है कोई लड़की पूछती नही , लिख सकते हो .लेकिन लड़कियों का नाम सार्वजिनक करना यह पत्रकारिता के एथिक को तोड़ता था . बहरहाल यह बात एस पी को कचोटती रही . जो भी रहा . इस रपट को हमने सामान्य ढंग से लिया . मैकिया वेली को सामने कर दिया - ' तुम मुझसे प्यार करो , या नफ़रत लेकिन नेपथ्य में मत डालो ' . चंचल को रविवार ने जेरे बहस कर दिया . दूसरे दिन इंडिया टुडे के आब्दी आ ये . दिनमान , धर्मयुग , गरज ये की किस पत्र ने नही उठाया . 

एसपी जब दिल्ली आए तो हमारी जम गई . आखिर तक हमारी दोस्ती बनी रही . 

कई दिलचस्प घटनाओं का बखान उस वक्त की राजनीति का खुलासा करती है . लिख चुका हूं - मानसिंह पैलेस में पत्रकारों का जमावड़ा है राजेन्द्र माथुर जी सदारत कर रहे थे चंद्रशेखर जी बहैसियत प्रधानमंत्री इस जलसे के मुख्य अतिथि हैं . हम यायु यस पी लाबी में बैठे बतिया रहे थे इतने में चंद्रशेखर जी आ गए, ठिठके , अपनी भाषा मे हाल चाल लिए और बोले हमने एक पोस्टर निकाला है चालीस साल बनाम चार महीने . हमने जोर से हंस दिया . चंद्रशेखर जी चुप फिर बोले - काहे हंसा हो ? 

जवाब दिया एसपी ने - चालीस साल में जितना पाप कांग्रेस ने किया उसे चार महीने में ही हमने . चंद्रशेखर जी भी हंसने लगे . 

हमे एक और दुर्भाग्य मिला था . हम हिंदुस्थान न्यूज़ एजेंसी के संपादक हो गए . यह संघियों का संस्थान रहा . हमारे जिम्मे दो काम दिन भर इस संस्था के कर्मचारियों का प्रदर्शन झेलूँ , शाम को दफ्तर से निकलते हुए आठ दस को बाहर करना . एसपी नवभारत के संपादक थे , हमारी एजेंसी टेली प्रिंटर वहां लगा था . दो एक खबर हम हर रोज हम लिखते थे और उसे एस पी उठा लेते . 

एक दिन एसपी का फोन आया - कोई खबर नही आ रही . हमने रामजी सिंह अच्छे पत्रकार थे लेकिन थे संघी , हम उन्हें पसंद नही थे , हमने उन्हें कहा अभी एक न्यूज हमने दिया है इसे रिपीट करिये . नीचे का कर्मचारी गर सहयोग न करे तो संस्था बैठ ही जाएगी . सारे देश मे हमारी खबर जा रही थी - पिलखुआ में ट्रेन से टकरा कर भैस मरी .एसपी ने फोन किया - ग्यारह बार भैंस मर चुकी है आगे तो चलाओ . मतलब सुन लो भाई ! कोई भी संस्थान आपसी लगाव से ही चल सकता है . 

हम याद कर रहे हैं एसपी . 

प्रणाम

फोटो -साभार 

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