हरीश अडयालकर का जाना अभाव पैदा कर गया

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हरीश अडयालकर का जाना अभाव पैदा कर गया

आनंद कुमार 
हर व्यक्ति की जीवन यात्रा का एक प्रारम्भ और एक समापन का क्षण होता है और इसके बीच की अवधि में जिए गए समय की स्मृति शेष रहती है. यह कर्मकाय शरीर के न रहने के  बावजूद व्यक्ति की याद का हिस्सा हो जाता है. ८३ बरस तक समाज हितकारी जीवन के प्रति समर्पण की सफल साधना के बाद श्री हरीश अडयालकर जी का नागपुर में देहांत होना न सिर्फ उनके परिवारजनों और मित्रों बल्कि देशभर के समाजवादियों, मजदूर आन्दोलन के नायकों, लघु-पत्रिका संपादकों, और तिब्बत मुक्ति साधना के समर्थकों के लिए अपूरणीय क्षति का समाचार है. क्योंकि ट्रेड यूनियन के कामकाज से लेकर समाजवादी अभियानों, हिंदी साहित्य संवर्धन, लघु पत्रिका संपादन और प्रकाशन, देशहित के सवालों और हिमालय की सुरक्षा और तिब्बत की आज़ादी तक उनके सरोकारों का अति-विस्तृत दायरा था.
१९७४ की ऐतिहासिक राष्ट्रीय रेल हडताल में मध्य भारत रेल कर्मचारियों के प्रमुख संगठनकर्ता होने के नाते अपनी गिरफ्तारी और फिर रेलसेवा से निष्कासन को बड़े गर्व से याद रखनेवाले हरीश भाई आजीवन समाजवादी रहे. लोहिया-विचार उनकी आस्था और सपनों की बुनियाद थे. लेकिन १९७७ में अपने नायक जार्ज फर्नांडीज के सीधे जेल से केन्द्रीय सरकार मंत्री बनने को चमत्कारी उपलब्धि मानने के बावजूद हरीश जी ने समाजवादियों के जनता पार्टी सरकार में हिस्सेदार होने का कोई निजी लाभ नहीं उठाया. रेल की सेवा में वापस नहीं लौटे. नागपुर को अपनी जीवन की धुरी बनाकर स्वयं को पूरी तरह से समाजवादी विचारों के प्रचार-प्रसार में जोड़ दिया. यही संकल्प आगे के चार दशकों के सार्वजनिक जीवन का मूल मन्त्र बन गया.
हरीश जी द्वारा नागपुर में स्थापित ‘लोहिया अध्ययन केंद्र’ उनके समर्पण का साक्ष्य है. वोट के जुगाड़ में जुटे राजनीतिक कार्यकर्ताओं से अलग एक रचनात्मक कार्यकर्ता की निष्ठा के उदाहरण के रूप में यह पूरे भारत में अपने ढंग का एकमात्र समाजवादी अध्ययन केंद्र है. उन्होंने अपने मुट्ठीभर सहयोगियों के साथ मिलकर इसमें आचार्य नरेन्द्रदेव, लोकनायक जयप्रकाश नारायण, डा. राममनोहर लोहिया, मधु लिमये, किशन पटनायक जैसे समाजवादियों की रचनाओं के साथ ही महात्मा गाँधी और बाबा साहब डा. आम्बेडकर समेत सभी राष्ट्रनायकों की किताबें संकलित की. दो मंजिला इमारत बनाकर एक साथ पुस्तकालय, वाचनालय और गोष्ठी सदन की व्यवस्था की गयी. पूरा भवन पूरे भारत के समाजवादी जननायकों के आकर्षक चित्रों से सुसज्जित किया. उनके नि:स्वार्थ प्रयास से यह चिंतन-मनन का जीवंत केंद्र बनकर उभरा. पिछले कई वर्षों से यह सामयिक और वैचारिक प्रश्नों पर संवादों का यह प्रसिद्ध पीठ बन चुका है.       
लोहिया अध्ययन केंद्र के जरिये वर्ष में तीन बार ‘सामान्य जन’ नाम की एक आकर्षक और पठनीय हिंदी पत्रिका का संपादन और प्रकाशन भी हरीश जी के कर्मयोग का एक आकर्षक पक्ष रहा. हर अंक के आवरण पृष्ठ को किसी कलाकार की कृति से सजाया जाता था. शुरू के दो तीन लेख गांधी, लोहिया, मधु लिमये जैसे राष्ट्र-निर्माताओं के रखते थे. फिर समकालीन राजनीति और समाज से जुड़े विश्लेषण को जगह मिलती थी. साहित्य के भी विविध पक्षों का प्रतिनिधित्व अनिवार्य था. एक हिस्सा आन्दोलन संवाद – परिचर्चा – समागम - स्मृति समाचारों का रहता था. हिंदी की लघु पत्रिकाओं की उच्च मृत्यु दर के दौर में उन्होंने ‘सामान्य जन’ को न सिर्फ दीर्घजीवी बनाया बल्कि हर अंक को बेहतर बनाने की चेष्ठ भी करते थे. 
मुझे उनके कर्मयोगी पक्ष का अपरिचय आरम्भ में ‘सामान्य जन’ से ही मिला. बाद में भारत तिब्बत मैत्री संघ के राष्ट्रीय अधिवेशन का नागपुर में संयोजन हुआ तो उनका हार्दिक सहयोग पाकर सुखद आश्चर्य हुआ. उनसे तिब्बत मुक्ति साधना से जुड़ने का आग्रह किया. वह हमारे राष्ट्रीय संगठन के लिए महाराष्ट्र में नायक बने और भारत तिब्बत मैत्री संघ के महाराष्ट्र प्रदेश के अध्यक्ष के पद को सुशोभित किया. उनके नेतृत्व में महाराष्ट्र में इसके कार्य को विस्तार मिला. अभी जुलाई-अगस्त में भारत तिब्बत मैत्री संघ की ओर से लद्दाख से लेकर अरुणाचल तक चीन द्वारा  पैदा किये तनाव के विरुद्ध आयोजित संवादों में उनकी गरिमामय हिस्सेदारी रही. 
वह नागपुर के नागरिक समाज के गौरव थे. उनकी समाजवादी पहचान के बावजूद सभी सरोकारी समूहों और संगठनों से एक विशिष्ट अपनत्व था. हमारे जैसे लोगों की नागपुर यात्राओं में हरीश जी से लोहिया अध्ययन केंद्र जाकर भेंट करना एक सुखद अनुभव रहता था. २०१९ में में एक से अधिक बार वर्धा और नागपुर गया. हर बार हरीश भाई ने मेरे लिए समय निकाला. उनकी गरिमामय अध्यक्षता में लोहिया अध्ययन केंद्र में तिब्बत की आज़ादी और भारत की सुरक्षा पर एक सार्वजनिक संवाद का आयोजन हुआ. अपने स्वभाव के अनुकूल उन्होंने मुझे पर्याप्त समय दिया. अच्छा प्रश्न-उत्तर चला. फिर अति संक्षिप्त अध्यक्षीय भाषण दिया. 
हरीश जी की कथनी-करनी में एकरूपता थी. उन्होंने गांधी-लोहिया के आदर्शों को अपने जीवन में उतारा था. इसीलिए सादगी, मितव्ययिता, कम बोलना-जादा करना, विनम्रता और आशावादिता उनके व्यक्तित्व के आभूषण थे. इसीलिए उनका जाना बहुत बड़ा अभाव पैदा कर गया है. वह बहुत कुछ कर सके थे लेकिन ढेर सारे अधूरे कार्य छोड़ गए हैं. उनकी स्मृति का प्रकाश हमें मार्ग दिखाए यही प्रार्थना है.

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