कपिला वात्स्यायन नही रहीं

कांकेर ने जो घंटी बजाई है ,क्या भूपेश बघेल ने सुना उसे ? क्या मुग़ल काल भारत की गुलामी का दौर था? अधर में लटक गए छात्र पत्रकारों के बीमा का दायरा बढ़ाए सरकार बिहार चुनाव से दूर जाता सुशांत का मुद्दा सड़क पर उतरे ऐक्टू व ट्रेड यूनियन नेता किसानों के प्रतिरोध की आवाज दूर और देर तक सुनाई देगी क्या मोदी के वोटर तक आपकी बात पहुंच रही है .... खेती को तबाह कर देगा कृषि विधेयक- मजदूर किसान मंच दशहरे से दिवाली के बीच लोकतंत्र का पर्व बेनूर हो गई वो रुहानी कश्मीरी रुमानियत सिविल सर्जन तो भाग खड़े हो गए चंचल .. चलो भांग पिया जाए क्यों भड़काने वाले बयान देते हैं फारूक अब्दुल्ला एक समाजवादी धरोहर जेपी अंतरराष्ट्रीय सेंटर को बेचने की तैयारी कोरोना के दौर में राजनीति भी बदल गई बिशप फेलिक्स टोप्पो ने सीएम को लिखा पत्र राफेल पर सीएजी ने तो सवाल उठा ही दिया हरिवंश कथा और संसदीय व्यथा राष्ट्रव्यापी मजदूरों के प्रतिवाद में हुए कार्यक्रम

कपिला वात्स्यायन नही रहीं

प्रेमकुमार मणि
यह अजीब संयोग है कि कपिला वात्स्यायन जी के निधन की सूचना मुझे तब मिली ,जब मैं उन्ही द्वारा लिखित एक किताब में डूबा हुआ था . यह किताब है - 'इंडियन क्लासिकल डांस ' . किताब से फुर्सत पा कर जैसे ही फेसबुक खोला , कवि अशोक वाजपेयी और विमल कुमार के पोस्ट ने यह मनहूस खबर दी .  वह उम्र के 92 वे में थीं और चूंकि  हर किसी को एक दिन जाना है, इसलिए कहा जाएगा कि वह भरपूर जीवन जी कर गईं , लेकिन उनका नहीं रहना हमें खाली तो कर ही गया है .
कपिला जी अपने आप में एक संस्थान थीं . हमारी सांस्कृतिक पहचान . उनके होते जैसे यह अनुभव होता था कि वह हमारी सांस्कृतिक अभिभावक हैं . प्राचीन और नवीन का अद्भुत सम्मिलन उनके व्यक्तित्व की खासियत थी . इंदिरा गाँधी नेशनल सेंटर फॉर द आर्ट्स से वह लम्बे समय से जुडी रहीं और उसके डायरेक्टर से लेकर चेयरपर्सन तक के रूप में उसे संवारती रहीं . 2006 में राज्यसभा में सदस्य मनोनीत की गईं .  भारतीय नृत्य -कला की वह विशेषज्ञ थीं और उनकी किताबें सम्मान के साथ पढ़ी जाती रही हैं . एक ब्यूरोक्रेट के रूप में भी उन्होंने देश की महती सेवा की थी  . मेरी जानकारी के अनुसार वह  केंद्रीय शिक्षा विभाग में सचिव के रूप में भी रहीं .
25 दिसम्बर 1928 को रामलाल मलिक और सत्यवती मलिक की पुत्री रूप में जन्म लेकर कपिला जी ने अपना एक स्वतंत्र व्यक्तित्व निर्मित किया .  दिल्ली विश्वविद्यालय से  अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर और फिर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से पीएचडी किया . 1956 में ख्यात हिंदी लेखक सच्चिदानंद वात्स्यायन अज्ञेय से उन्होंने विवाह किया . 1969 में यह सम्बन्ध बिखर गया . इसकी थोड़ी -सी कथा कवि नागार्जुन ने बहुत आहत स्वर में तब सुनाई थी ,जब 1987 में अज्ञेय जी का निधन हुआ था . आज वह नहीं हैं ,यह स्वीकारना दुःखद है . वह हमारी सांस्कृतिक धड़कन थीं और ऐसा लगता है ,हम ने कुछ अंशों में अपनी सांस्कृतिक ऊंचाइयां खो दी हैं .
मेरी श्रद्धांजलि .


  • |

Comments

Subscribe

Receive updates and latest news direct from our team. Simply enter your email below :