सड़क से साहित्य के शिखर तक

क्या मुग़ल काल भारत की गुलामी का दौर था? अधर में लटक गए छात्र पत्रकारों के बीमा का दायरा बढ़ाए सरकार बिहार चुनाव से दूर जाता सुशांत का मुद्दा सड़क पर उतरे ऐक्टू व ट्रेड यूनियन नेता किसानों के प्रतिरोध की आवाज दूर और देर तक सुनाई देगी क्या मोदी के वोटर तक आपकी बात पहुंच रही है .... खेती को तबाह कर देगा कृषि विधेयक- मजदूर किसान मंच दशहरे से दिवाली के बीच लोकतंत्र का पर्व बेनूर हो गई वो रुहानी कश्मीरी रुमानियत सिविल सर्जन तो भाग खड़े हो गए चंचल .. चलो भांग पिया जाए क्यों भड़काने वाले बयान देते हैं फारूक अब्दुल्ला एक समाजवादी धरोहर जेपी अंतरराष्ट्रीय सेंटर को बेचने की तैयारी कोरोना के दौर में राजनीति भी बदल गई बिशप फेलिक्स टोप्पो ने सीएम को लिखा पत्र राफेल पर सीएजी ने तो सवाल उठा ही दिया हरिवंश कथा और संसदीय व्यथा राष्ट्रव्यापी मजदूरों के प्रतिवाद में हुए कार्यक्रम समाज के राजनीतिकरण पर जोर देना होगा

सड़क से साहित्य के शिखर तक

प्रभाकर मणि तिवारी
मनोरंजन ब्यापारी फिर चर्चा में हैं .पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उन्हें दलित साहित्य अकादमी का अध्यक्ष बना दिया है . मनोरंजन ब्यापारी से कुछ समय पहले जब बात हुई तो उन्होंने कहा था कि अभी मेरा सर्वश्रेष्ठ लेखन बाकी है. उसके बाद कलम को आराम दे दूंगा.मनोरंजन ब्यापारी जब यह बात कहते हैं तो उनकी आंखों की चमक अचानक बढ़ जाती है. मनोरंजन का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है. देश विभाजन के बाद तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के बरीशाल जिले में पैदा होने के बाद शरणार्थी के तौर पर भारत आना, उसके बाद कई शरणार्थी शिविरों में रहना, होटलों में जूठे बर्तन धोना, नक्सल आंदोलन की वजह से 26 महीने जेल में रहना औऱ फिर दो जून की रोटी के लिए रिक्शा चलाने से लेकर अब शीर्ष साहित्यकारों की सूची में शुमार मनोरंजन की जिजीविषा इस उम्र में भी कम नहीं हुई है. इस जिजीविषा शब्द की उनके जीवन में बहुत अहमियत है. यह कहना ज्यादा सही होगा कि यही उनके जीवन का टर्निंग प्वायंट साबित हुआ. मनोरंजन का जीवन सड़क से साहित्य के शिखर तक पहुंचने की अनूठी मिसाल है.

उन्होंने दो दशक से ज्यादा समय तक रसोइए का काम किया है. लेकिन अब जब शरीर थकने लगा तो उन्होंने ममता से किसी दूसरे पद पर तबादले की अपील की थी. उनके लेखन को ध्यान में रखते हुए सरकार ने इसी सप्ताह उनको उनकी प्रिय शगल यानी पुस्तकों के बीच रहने का मौका दे दिया है. उनकी अपील पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के निर्देश पर मनोरंजन का तबादला एक मूक-बधिर स्कूल के रसोइए से जिला पुस्तकालय में लाइब्रेरियन के पद पर कर दिया गया है. खुद गृह सचिव आलापन बनर्जी ने उनको फोन पर इसकी जानकारी दी. इससे मनोरंजन होने की अहमियत का पता चलता है.

मनोरंजन की कहानी संघर्ष की मिसाल है. देश के विभाजन के करीब छह साल बाद वर्ष 1953 में मनोरंजन अपने परिवार के साथ तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के बरीशाल (अब बांग्लादेश में) से शरणार्थी के तौर पर पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा स्थित शरणार्थी शिविर में पहुंचे थे. कुछ दिनों बाद ही उनलोगों को दंडकारण्य जाने  निरेदश दिया गया. लेकिन मनोरंजन के पिता ने वहां जाने से मना कर दिया. उसके बाद शुरू हुआ संघर्ष का अंतहीन सिलसिला. मनोरंजन छोटी उम्र में ही चाय की दुकान पर काम करने लगे. उन्होंने अपनी आंखों के सामने भूख से बड़ी बहन को दम तोड़ते देखा. उसके बाद दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी, गुवाहाटी, लखनऊ और बनारस जैसे शहरों में जाकर बेगारी की. लेकिन कहीं मन नहीं रमा तो कोलकाता लौट आए. इसबीच नक्सल आंदोलन से भी जुड़े और 26 महीने जेल में बिताने पड़े. जेल से बाहर आने के बाद वे कोलकाता के जादवपुर रेलवे स्टेशन के सामने रिक्शा चलाने लगे.

यहीं रिक्शा चलाते समय अचानक एक महिला यात्री से मुलाकात हुई औऱ उनके जीवन की दिशा ही बदल गई. वह महिला थी आदिवासियों के हक की लड़ाई लड़ने वाली जानी-मानी लेखिका महाश्वेता देवी. मनोरंजन ने हिम्मत जुटाते हुए उस महिला यात्री से जिजीविषा शब्द का अर्थ पूछा. इससे वह महिला हैरत में रह गई. उसने शब्द का अर्थ तो बताया ही, रिक्शेवाले के अतीत के पन्ने भी पलटे. महाश्वेता ने उस रिक्शा वाले से अपनी पत्रिका बार्तिका में अब तक के जीवन और संघर्ष की कहानी लिखने को कहा और उसे अपना पता भी बताया. वह साल था 1981.

अब देश के शीर्ष साहित्यकारों में शुमार वह रिक्शाचालक मनोरंजन बताते हैं, “महाश्वेता देवी से उस मुलाकात ने मेरी जीवन की दशा-दिशा ही बदल दी. अगर उनसे मुलाकात औऱ बात नहीं हुई होती तो तो मैं शायद अब तक रिक्शा ही चला रहा होता.”

महाश्वेता देवी की पत्रिका में छपने के बाद धीरे-धीरे उनके लेख कई बांग्ला पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगे औऱ पूरा बंगाल उनको पहचानने लगा. नक्सल आंदोलन के दौरान जेल में रहने के दौरान एक कैदी औऱ जेलर ने भी पढ़ने-लिखने की प्रेरणा दी. शब्दों से उनके परिचय का सफर दरअसल कोलकाता के उसी अलीपुर जेल में शुरू हुआ. उस जेल से निकलने के बाद ही उन्होंने रिक्शा चलाना शुरू किया और उसी दौरान महाश्वेता देवी से मुलाकात हुई.

कमाई कम होने की वगह से मनोरंजन दिन में पुरानी किताबें खरीद कर लाते थे और रात को दीए की टिमटिमाती रोशनी में पढ़ने और समझने का प्रयास करते थे. उसी दौरान वे एक बार जिजीविषा शब्द पर अटक गए. संयोग से उसी सप्ताह जब वह महिला महाश्वेता देवी उनके रिक्शे पर चढ़ी तो उन्होंने उस शब्द का मतलब पूछ लिया था. वह बताते हैं, “उस दौरान रिक्शा पर चढ़ने वाले कई लोगों को जब मेरी पढ़ाई की आदत के बारे में पता चला तो कइयों ने पुरानी पुस्तकें भी मुफ्त में दे दी थीं. इनमें गोर्की से लेकर शरतचंद्र और रबींद्रनाथ तक की पुस्तकें शामिल थीं.”

लेकिन आखिर महाश्वेता देवी जिजीविषा का अर्थ पूछने का ख्याल कैसे आया था? इस सवाल पर वह बताते हैं, “मुझे लगा कि वे कोई प्रोफेसर होंगी. इसलिए हिम्मत जुटा कर पूछ लिया.” महाश्वेता ने उनसे पूछा कि कौन-कौन सी किताबें पढ़ी हैं? मनोरंजन तब तक चार सौ से ज्यादा किताबें पढ़ चुके थे. उनमें से कुछ के नाम उन्होंने महाश्वेता देवी को बताए थे. वह बताते हैं, "जब उस महिला ने अपनी पत्रिका में लिखने की बात कहते हुए अपना नाम औऱ पता बताया तो मुझे पता चला कि वे महाश्वेता देवी हैं. मैं उन दिनों उनकी ही पुस्तक पढ़ रहा था. मैंने उनको वह पुस्तक भी दिखाई थी.” आगे चलकर वह मनोरंजन की साहित्यिक संरक्षक बन गईं. महाश्वेता देवी का मनोरंजन की जीवन पर इतना गहर असर पड़ा कि उन्होंने अपनी पुत्री का नाम भी महाश्वेता ही रखा है.

मनोरंजन बचपन की धुंधली यादों के सहारे बताते हैं, “सीमा पार से आने के बाद सरकार ने ऊंची जातियों के लोगों को तो जमीन देकर बसाया. लेकिन हम जैसे दलितों को शरणार्थी शिविरों में जगह दी गई. वहां खाना बेहद खराब था. शिविर में रोजाना किसी न किसी बच्चे या महिला की मौत हो जाती थी. लगता था हम मौत के बीच जी रहे हैं. शिविर के बगल में स्थित तालाब में जहां मृतकों का अंतिम संस्कार किया जाता था वहां चिता की आग कभी ढंठी ही नहीं होती थी.” एक दिन तो संक्रमण की वजह से मनोरंजन को भी मृत मान लिया गया. उनको अगले दिन सुबह दफनाया जाना था. लेकिन किसी तरह उनकी सांसें दोबारा चलने लगीं. उनके जीवन में संघर्ष दरअसल उसी दिन से शुरू हो गया था. यही संघर्ष उनके रचनाकर्म में भी झलकता है.

वर्ष 1981 में लेखक-साहित्यकार के तौर पर शुरू हुआ उनका सफर अब कई ऊंचाइयां हासिल कर चुका है. इस दौरान उनकी आत्मकथा समेत दर्जनों पुस्तकें तो प्रकाशित हुई हीं हैं, दर्जनों पुरस्कार भी मिल चुके हैं. उनकी कई पुस्तकों का अंग्रेजी में अनुवाद भी हो चुका है. मनोरंजन की पुस्तकों में दलित वर्ग के संघर्ष नक्सल आंदोलन का विस्तार से जिक्र मिलता है. आजीविका की तलाश उनको कुछ दिनों तक छत्तीसगढ़ भी ले गई थी जहां 1989 से 1991 में शंकर गुहा नियोगी की हत्या तक मनोरंजन उनके साथ काम करते रहे.

वर्ष 1997 से दक्षिण कोलकाता के एक मूक बधिर स्कूल में छात्रों के लिए खाना पकाने वाले मनोरंजन बताते हैं, “अब शरीर साथ नहीं दे रहा था. घुटनों में दर्द रहने और आपरेशन होने की वजह से खड़े होकर खाना पकाना मुश्किल हो गया था. इसलिए मैंने ममता दीदी को अपने तबादले का अनुरोध करते हुए एक पत्र भेजा था. उन्होंने पत्र मिलते ही मुझे विद्यानगर जिला पुस्तकालय में भेज दिया. अब मैं अपनी पसंदीदा जगह पहुंच गया हूं.”  वह बताते हैं, “यह मेरे सपनों की जगह है. रोजाना हजारों पुस्तकों से घिरे रहना एक सपने के सच होने जैसा है. मैं जितनी चाहे किताबें पढ़ सकता हूं. यहां काम करना मेरे लिए ड्यूटी नहीं बल्कि पूजा है.एक वाक्य में अपने बारे में कैसे बताएँगे? इस सवाल पर मनरंजन कहते हैं, “ए राइटर इन द अंगुइश. मैं अपने क्रोध की वजह से ही लगातार लिखता रहता हूं. कई कहानियां दिमाग से निकल गई हैं. लेकिन अभी मेरी सर्वश्रेष्ठ कहानी आनी बाकी है. जिस दिन उसे लिख लूंगा, अपनी कलम को आराम दे दूंगा. मैं भविष्य के बारे में, भविष्य के लिए और बेहतर भविष्य बनाने में मदद करने के लिए लिखता हूं.

  • |

Comments

Subscribe

Receive updates and latest news direct from our team. Simply enter your email below :