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अब सिर्फ सूचना देते हैं हिंदी अख़बार !

संजय कुमार सिंह 

हिंदी अखबारों में भ्रष्टाचार की खबरों को अब प्रमुखता नहीं दी जाती है. पुणे में एक हाउसिंग सोसाइटी की दीवार गिरने से 15 लोगों की मौत की खबर और तस्वीर देखने से ही लग रहा था कि इसपर पहले ध्यान दिया गया होता तो शायद दीवार गिरने से मरने वाले लोग बच जाते. पर अंग्रेजी अखबारों में तो खबरें तस्वीर के साथ ठीक छपीं पर हिन्दी अखबारों में फोटो से काम चला लिया गया. सूचना तो दी गई पर उसमें भ्रष्टाचार और लापरवाही को हाइलाइट नहीं किया गया. इसी तरह रत्नागिरी में बांध टूटने की खबर बड़े रूटीन और चलताऊ अंदाज में दी गई जबकि उसमें दरार की शिकायत लोग पहले से कर रहे थे और मरम्मत के नाम पर कुछ काम भी हुआ था फिर बांध का लगभग एक तिहाई हिस्सा बह गया. इससे भारी तबाही हुई. कई लोग मर गए सो अलग. पर खबर में भ्रष्टाचार या लापरवाही की चर्चा नहीं के बराबर थी. अंग्रेजी अखबारों में इतनी बुरी हालत नहीं है. वहां फिर भी खबर को खबर की तरह छापा जाता है पर हिंदी में सिर्फ घटना या सूचना.  

यही नहीं, अंग्रेजी अखबार ऐसी खबरों को पहले पन्ने पर जितनी जगह देते हैं उतनी जगह हिन्दी अखबारों में नहीं होती है. बाकी शार्षक लगाने में लापरवाही भी आम है. उदाहरण के लिए, दरार, रिसाव की पूर्व सूचना और दो ही महीने पहले, कथित मरम्मत के बावजूद सिर्फ 19 साल पुराने बांध का एक तिहाई हिस्सा बह गया. इससे सात गांवों में बाढ़ आ गई 23, लोग बह गए पर नवभारत टाइम्स ने तस्वीर के साथ शीर्षक लगाया, महाराष्ट्र में रेकॉर्डतोड़ बारिश से बांध में दरार, 7 गांव डूबे, 23 लोग लापता. बांध टूटने का कारण सरकारी स्तर पर भले भारी बारिश बताया जाए और यही सूचना दे दी जाए - यहां तक तो ठीक है. पर अखबार का काम है कि असलियत का पता लगाए और अपने पाठकों को बताये. पर अखबार ने यह भी नहीं बताया कि बांध का निर्माण 19 साल पहले ही हुआ था. सिर्फ 19 साल पहले बने बांध का एक तिहाई हिस्सा बह जाना साधारण नहीं है पर अखबार ने उसे 'दरार' लिखा और साधारण बना दिया. 

अगर यह मान भी लिया जाए कि बांध में दरार का कारण भारी बारिश ही है तो अधिकारियों को इसका अनुमान होना चाहिए था. बचाव के उपाय किए जाने चाहिए थे और ग्रामीणों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने का काम भी सरकार का था और यह सब हुआ कि नहीं, कितना हुआ, क्यों और कैसे हुआ यह सब बताना अखबारों का ही काम है. इससे आगे के लिए अधिकारियों को ही नहीं, पाठकों को भी सीख मिलती है और वे जान लेंगे कि सरकार कुछ नहीं करेगी तो अपने बचने का इंतजाम खुद करेंगे. पर अखबार अगर अपने काम नहीं करें तो अखबारों की खबरों के भरोसे रहने वालों का क्या होगा. ऐसा नहीं है कि सभी अखबार ऐसा कर रहे हैं. अंग्रेजी खबारों में अभी भी कुछ शर्म बचा हुआ है. रत्नागिरी में बांद टूटने की खबर हिन्दी अखबारों (जिसने पहले या अंदर के पन्ने पर दी है) के मुकाबले अंग्रेजी अखबारों में ज्यादा विस्तार से है. जरूरी सूचनाओं के साथ है. 

उदाहरण के लिए, इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है कि बांध की मरम्मत दो महीने पहले हुई थी. और अब इसकी लगभग पूरी लंबाई टूटने से कोई 3000 लोग पानी में घिर गए हैं और बाकी दुनिया से कटे हुए हैं. अखबार ने 14 शव बरामद होने की खबर दी है. इस मामले में मुद्दा यह है कि बांध में दरार और पानी के रिसाव की शिकायत दो साल से थी. प्रशासन ने दो महीने पहले मरम्मत कराया, भारी बारिश की जानकारी भी उसे थी और इस कारण बांद का टूटना सामान्य है तो इलाके में लोगों को सूचना देना लोगों को सुरक्षित जगहों पर स्थानांतरित करने का काम स्थानीय प्रशासन का था. यह काम भी ठीक से हुआ नहीं लगता है. अखबारों में ऐसी कोई सूचना नहीं है. आज इंडियन एक्सप्रेस में एक खबर है जिससे पता चलता है कि बांध टूटने के शोर से एक परिवार बच गया. कहने की जरूरत नहीं है कि बांद टूट सकता है यह सूचना पहले दी गई होती तो और लोग बच सकते थे.

हिंदी अखबारों में आजकल राजनीतिक खबरों की भरमार रहती है और उसमें भी पक्षपात साफ दिखता है. उदाहरण के लिए, हाल में इंदौर के भाजपा विधायक और भाजपा महासचिव के पुत्र ने इंदौर नगर निगम के एक अधिकारी की पिटाई की, गिरफ्तार किए गए और फिर दो ही दिन में सांसदों – विधायकों की विशेष अदालत से उन्हें जमानत मिल गई. हिन्दी के अखबारों ने इस खबर को उतनी प्रमुखता नहीं दी जितनी तेलंगाना में एक वन अधिकारी की पिटाई को दी. दिलचस्प यह रहा कि इंदौर से अलग, तेलंगाना में वन अधिकारियों ने पिटाई से अधूरे रह गए काम को अगले ही दिन पूरा कर दिया तो यह खबर भी प्रमुखता से नहीं छपी. उसने भी नहीं छापी जिसने तेलंगाना में पिटाई की खबर पहले पन्ने पर प्रमुखता से छापी थी.


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