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समाजवादी हार गए, समाजवाद जिंदाबाद!

अंबरीश कुमार 

लखनऊ .लोकसभा चुनाव के बाद की राजनीतिक टिप्पणियों और विश्लेषणों पर नजर डालें, तो उनमें से ज्यादातर में कहा जा रहा है कि देश में समाजवादी दलों का दौर खत्म हो गया है. खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार को लेकर ऐसे कई विश्लेषण आ चुके हैं. दोनों ही राज्यों में मजबूत माने जाने वाले ये दल बहुत बुरी तरह हारे हैं. ये दल समाजवादी और आंबेडकरवादी धारा के माने जाते हैं. पर क्या इस हार से ये दल खत्म हो जाएंगे, यह सवाल ज्यादातर लोगों के मन में है. दरअसल समाजवादी हों या कांग्रेसी, ये इस चुनाव में मोदी के नेतृत्व में भाजपा के हिंदू राष्ट्रवाद के एजेंडे का मुकाबला नहीं कर सके.

भाजपा के राष्ट्रवाद के केंद्र में सिर्फ हिंदू हैं, जबकि आजादी की लड़ाई और उसके बाद विभाजन के समय भी ऐसी ही स्थिति का मुकाबला गांधी ने राष्ट्रवाद के व्यापक नजरिये से किया था. गांधी के राष्ट्रवाद में वे मुस्लिम भी थे, जो विभाजन के बाद पाकिस्तान नहीं गए और जिन्होंने भारत को अपना देश माना था. सवाल उठता है कि जो काम गांधी कर गए और एक रास्ता भी दिखा गए, वही काम कांग्रेसी और समाजवादी क्यों नहीं कर पाए? लेकिन इस सवाल का जवाब खोजते समय यह नहीं भूलना चाहिए कि उत्तर प्रदेश में मोदी का जो कुछ भी मुकाबला किया, वह समाजवादियों ने ही किया. मोदी की इस आंधी में गठबंधन को पंद्रह सीट ऐसे ही नहीं मिलीं.

आगे बढ़ने से पहले, उत्तर प्रदेश और बिहार के समाजवादी आंदोलन पर एक नजर डालनी चाहिए. साठ के दशक में डॉ. राम मनोहर लोहिया के गैर-कांग्रेसवाद के नारे के बाद उत्तर भारत की राजनीति में समाजवादियों का जो उभार आया, उसे बड़ी जमीनी ताकत मंडल आयोग के बाद ही मिली. उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति पर इसका ज्यादा असर पड़ा. उसके बाद जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चौहत्तर आंदोलन (जिसे कई लोग बिहार आंदोलन या संपूर्ण क्रांति आंदोलन भी कहते हैं) हुआ और इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाया.


आपातकाल के बाद हुए चुनाव में जनता पार्टी का जो प्रयोग हुआ, उसमें समाजवादियों की एक मजबूत धारा भी शामिल थी, जो बाद में जनता पार्टी/दल परिवार के रूप में वहां से बाहर निकली और लड़ते-भिड़ते कई दलों में बंट गई. जनता दल परिवार तो बंटा पर जनता दल और जनता पार्टी नाम से उसका मोह बना रहा. किसी ने इस नाम के आगे कुछ लगा लिया, तो किसी ने कुछ पीछे. जनता दल सेक्युलर, जनता दल यूनाइटेड, राष्ट्रीय जनता दल, बीजू जनता दल, समाजवादी जनता पार्टी आदि इसके उदाहरण हैं.


उत्तर प्रदेश के दिग्गज समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव ने अलग नाम की पार्टी बनाई. समाजवादी पार्टी. मुलायम सिंह यादव भी लोहिया के गैर-कांग्रेसवाद के सिद्धांत के बाद दलितों-पिछड़ों को ज्यादा राजनैतिक हिस्सेदारी वाले अभियान से ही निकले थे. उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह समाजवादी आंदोलन की आवाज बने, तो बिहार में लालू प्रसाद यादव. इन दोनों नेताओं ने मंदिर आंदोलन के दौर में भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति का मुकाबला भी काफी मजबूती से किया. यही वजह है कि पिछड़ों, खासकर यादव के साथ मुस्लिम बिरादरी का जो समर्थन इन्हें मिला, उसने करीब दो दशक तक उत्तर भारत की राजनीति में न सिर्फ इनका दबदबा बनाये रखा, बल्कि इन्हें प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवारों की दौड़ में भी शामिल कर दिया.


मुलायम सिंह साठ के दशक में गैर-कांग्रेसवाद की राजनीति से निकले, तो लालू प्रसाद यादव जयप्रकाश नारायण के चौहत्तर के आंदोलन से निकले. अस्सी, नब्बे के दशक में ये तेजी से उभर कर सामने आए. पर मध्य वर्ग इन्हें कुछ ख़ास जातियों के नेता के रूप में ही देखता रहा. मंडल विरोधी आंदोलन के बाद इनकी यह छवि और मजबूत हुई. कमोबेश यही स्थिति कांशीराम की भी थी, जो बाद में उभरे और उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति को लामबंद कर दिया.

नब्बे के दशक में इन सभी नेताओं पर एक आलोचनात्मक अध्ययनमाला प्रकाशित हुई थी, जिसकी प्रस्तावना में लिखा गया ‘इन नेताओं में वैचारिक दृष्टि से साम्य नहीं है. पिछड़े वर्गों की राजनीति के चैम्पियन होने के बावजूद मुलायम, कांशीराम और लालू यादव क्रमशः लोहियावादी, आंबेडकरवाद और मध्यमार्गी पिछड़ा वर्ग राजनीति के सिरों पर खड़े हुए हैं.निस्संदेह, ये नेता जमीन के जिन टुकड़े से जुड़े हुए हैं, उसमें उनकी जड़ें बहुत गहरी हैं. साथ ही उनके विरोध का आंतरिक आधार भी उसी जमीन से निकलता है. पर बहुत सी खामियों के बाद ये नेता वह भाषा नहीं बोलते हैं, जो कभी हम जवाहरलाल नेहरु सरीखे नेताओं से सुनते थे. न ही इनकी छवि नेहरू युग के नेताओं जैसी चमकदार, ईमानदार और विवादों से ऊपर उठकर राष्ट्र निर्माण की चिंताओं की प्रतीक छवि के सामान है.’

बीते लोकसभा चुनाव की समीक्षा करते समय इस प्रस्तावना की अंतिम लाइन पर गौर करें, तो बहुत कुछ समझ में आ जायेगा. भाजपा के शीर्ष नेता नरेंद्र मोदी ने 2014 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस के भ्रष्टाचार को मुद्दा बना कर लड़ा और कामयाब रहे. कांग्रेस की छवि राष्ट्रीय पार्टी की रही और उसका मुकाबला भाजपा ने राष्ट्रीय विकल्प पेश कर किया. उत्तर प्रदेश और बिहार में मजबूत माने जाने वाले क्षेत्रीय दल नरेंद्र मोदी के इस हमले के सामने नाकाम रह गए. दलित राजनीति करने वाली मायावती को तो एक भी सीट नहीं मिली. अखिलेश के सत्ता में रहने के बावजूद समाजवादी पार्टी बुरी तरह हारी. दरअसल पूरा चुनाव राष्ट्रीय विकल्प का बन चुका था, जिसमें इन क्षेत्रीय दलों की कोई भूमिका बन ही नहीं पाई.

दरअसल, समाजवादी आंदोलन की राष्ट्रीय भूमिका बयालीस में बनी और सैंतालीस तक कायम रही. लोहिया ने 1967 के दौर में भी समाजवादियों की राष्ट्रीय भूमिका को आगे बढ़ाया. जय प्रकाश नारायण ने सत्तर के दशक में समाजवादी आंदोलन को राष्ट्रीय फलक पर उभारा. लेकिन, समाजवादी धारा वाली पार्टियों के कुछ राज्यों में सत्ता में आने जाने के साथ समाजवादी आंदोलन की राष्ट्रीय भूमिका सिमटती चली गयी.

इनके नेताओं ने राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर कोई ठोस पहल नहीं की. बड़े नीतिगत सवालों पर मुलायम सिंह और लालू प्रसाद ने शायद ही कभी हस्तक्षेप किया. इन सवालों को कांग्रेस, बीजेपी या कम्युनिस्टों को लिए छोड़ दिया गया. कोई भी बड़ा राष्ट्रीय किसान, मजदूर या नौजवान आंदोलन समाजवादी नेताओं ने नहीं शुरू किया. दूसरे, समाजवादी विचार को इनके नए नेताओं ने न जीवन में उतारा, न ही इनके व्यवहार में कोई समाजवाद दिखा. समाजवादी धारा के नए नेताओं ने आम लोगों से संवाद बंद किया तो साथ ही वे विचार के महत्व को भी भूल गए.जो कांग्रेसी कभी विचार को लेकर गंभीर नहीं रहे, उनकी पार्टी में तो थिंक-टैंक बन गया. लेकिन किसी समाजवादी दल में न तो नए विचार पर कोई मंथन हुआ न ही ऐसे लोगों से कोई संवाद का प्रयास हुआ, जो समाजवादी चिन्तक माने जाते हों. मुलायम सिंह तक तो ऐसा संवाद छिटपुट चला भी, पर अखिलेश यादव से लेकर तेजस्वी यादव के आते-आते ये परंपरा टूट गई. ऐसे में ये समाजवादी किस तरह मोदी के हिंदू राष्ट्रवाद के विचार का मुकाबला कर सकते हैं. यह एक गंभीर सवाल है. चाहे समाजवादी पार्टी हो या राष्ट्रीय जनता दल या बसपा के नेता, इन लोगों ने जातीय गठजोड़ को ज्यादा मजबूत माना और समाजवादी-बहुजनवादी विचारधारा की खिल्ली उड़ाते रहे. नतीजा सामने है. सिर्फ जातीय समीकरण के आधार पर सत्ता में लौटना आसान नहीं है.


सपा-बसपा-आरजेडी के पास समाज के पिछड़े, अल्पसंख्यक और दलित वर्ग का मजबूत आधार है. यह जल्दी खत्म भी नहीं होने वाला. रणनीति और विचार के स्तर पर अगर नाकामी मिली है, तो उससे इन दलों को सबक भी मिला है. समाजवादियों को खुद का बड़ा राष्ट्रीय एजेंडा सामने रखना होगा. पार्टी के कार्यकर्ताओं को नए सिरे से लामबंद भी करना होगा. समाजवाद का अंत नहीं हुआ है. ये हार विचारधारा की नहीं, राजनीतिक दलों की है.द प्रिंट 

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