जनादेश

जेएनयू में यह सब क्यों हो रहा है. कानून के राज को 'एक झटका' यह फैसला दिक्कत पैदा कर सकता है ! मेरे मित्र टीएन शेषन ! मोदी सरकार के समर्थन का यह कीमत मिली - तवलीन फैसला विसंगतियों से भरा- भाकपा (माले) तथ्यों से धराशाही हुए सियासत के तर्क! आरटीआई की धार भोथरी करती सरकार ! शाहनजफ़ इमामबाड़ा में ईद-ए-ज़हरा ! भाषा को रामनामी से मत ढकिये ! पर रात का खीरा तो पीड़ा ! नीतीश कुमार के दावे हवा-हवाई झारखंड चुनाव में बिखर रही हैं गंठबंधन की गांठें जांच के नामपर लीपापोती तो नहीं ? पीएफ घोटाले में बचाने और फंसाने का खेल ? कश्मीर के बाद नगालैंड की बारी ? गोंडा जंक्शन ! कभी इस डाक बंगला में भी तो रुके ! बिकाऊ है चंडीगढ़ रेलवे स्टेशन,खरीदेंगे ? झटका तो यूपी बिहार में भी लग गया !

वर्षा वन अगुम्बे की एक और कथा!

शंभूनाथ शुक्ल

'अल्लाह हाफ़िज़!' के साथ ही रूबीन तो चली गई. अब उस अनजान स्टेशन उडुपी पर रह गए, हम दो अजनबी! टिप-टिप बारिश हो रही थी. छोटा-सा स्टेशन और अजनबी लोग. हमारी हालत कुछ ऐसी ही थी, जैसी हनुमान जी की तब रही होगी, जब उन्होंने पहली बार लंका में कदम रखा होगा. वहाँ सब कुछ भव्य था, सुवर्णमयी था, पर कोई परिचित चेहरा नहीं था. हम ऊहापोह में थे और सोच रहे थे, कि “कहाँ जाईं का करी!” उडुपी स्टेशन ऊँचाई पर है. शायद किसी पहाड़ी को काट कर बनाया गया होगा. स्टेशन पर कोई सवारी नहीं और कोई मैप-चार्ट नहीं. ऊपर से टिप-टिप बारिश! मैने अगुम्बे में विकास कुमार झा (‘वर्षावन की रूपकथा’ के लेखक और वरिष्ठ पत्रकार। “आपसदारियाँ” के इस कार्यक्रम के संचालक श्री सतीश जायसवाल ने उन्हें ही अगुम्बे सम्मेलन की ज़िम्मेदारी सौंपी थी और वे दो जुलाई को वहाँ पर डेरा डाल चुके थे) को फोन लगाया. पर उनका फोन आउट ऑफ़ रेंज था. अब क्या किया जाए! तब ही एक आटो स्टेशन के निकास द्वार पर आकर रुका. अनिल जी ने उससे टैक्सी के लिए पूछा, तो उसने इशारे से नीचे की तरफ़ जाने को कहा. हम अपने ट्राली बैग्स को घसीटते हुए लगभग एक फ़र्लांग चल कर नीचे आए. वहाँ कई टैक्सियाँ खड़ी थीं. पहली ही टैक्सी का ड्राइवर हमारे पास लपक कर आया और बोला- भैया जी, अगुम्बे जाएगा? हमारे हाँ कहने पर उसने पहले तो भाड़ा 1400 रुपये माँगा. हम राज़ी हो गए तो उसने पूछा कि अगुम्बे में कहाँ पर? हमने कहा- ‘दोड्ड-मने’. वह नहीं समझा तो बताया कि जिस घर में ‘मालगुडी डेज’ की शूटिंग हुई थी. बोला- ठीक है पर वहाँ के 1500 रुपये लगेंगे. यह एक प्रकार की ब्लैकमेलिंग थी, पर हम मान गए. एक इनोवा टैक्सी में हमारा सामान रखा और चल दिए. कुछ दूर जाकर उसने गाड़ी रोक दी. बोला- आपको डिज़ायर टैक्सी से जाना होगा. इनोवा का भाड़ा 2500 रुपये है. हम रात को उस बीहड़ और उतार-चढ़ाव वाले रास्ते पर डिज़ायर से जाने को तैयार नहीं हुए और अपनी तरफ़ से किराया 500 रुपये बढ़ा दिया. तब वह हमें इनोवा से ले चलने को राज़ी हुआ. रास्ते में मनिपाल से अनिल जी ने एक रेन कोट ख़रीदा और एक छाता. मैने क्रोसिन का एक पत्ता लिया. करीब डेढ़ घंटे बाद उस वर्षावन और घाट के रास्ते से गुज़रते हुए हम साढ़े नौ बजे अगुम्बे पहुँचे. ‘दोड्ड मने’ के बाहर ही विकास जी खड़े थे. यह घर 135 साल पुराना है. कभी इस इलाक़े के राजा का था. पर अब कोई राजसी ठाठ-बाट नहीं दिखा, सिवाय मकान की बनावट के. अंधेरे में वह विशाल घर किसी भुतहे बंगले जैसा दिख रहा था।


हम अगुम्बे कोई साढ़े नौ रात को बजे पहुंचे. विकास कुमार झा ‘दोड्ड-मने’ के दरवाज़े पर खड़े थे. हमें अन्दर ले गए. बाहर बरामदे में ही जूते उतारने थे, और वहां रखी हवाई चप्पल पहन लेनी थी. लेकिन बरामदे के अन्दर ये चप्पल भी नहीं पहन सकते थे. यह दिल्ली वालों के लिए सजा थी, क्योंकि इधर घर के भीतर हवाई चप्पल तो पहनी ही जाती है. लेकिन हर जगह का कायदा अलग-अलग होता है. हम बरामदे में सामान रख ही रहे थे, तब ही दरवाज़े पर एक और इनोवा आकर रुकी. इसमें श्री सतीश जायसवाल, डॉ. उषारानी राव, प्रोफ़ेसर सिद्धेश्वर सिंह, प्रोफ़ेसर शीला तिवारी, मृदुला शुक्ला और उनकी बेटी श्रेयसी थे. सब लोग बरामदे में अपना सामान छोड़ कर अन्दर गए. यह एक विशाल और वर्गाकार घर था. जिसके चारो ओर दल्लानें थीं. बीच में एक आँगन था, एक दल्लान में बेंच लगाकर उनके सामने ढाई फीट चौड़ी लम्बी-सी मेजें लगी थीं. यह अतिथियों के लिए डायनिंग टेबल का काम करती थी. दरअसल ‘दोड्ड-मने’ का मतलब होता है- बड़ा घर, जिसके लिए प्रोफ़ेसर सिद्धेश्वर सिंह ने एक नायाब शब्द बताया- बड़ी बखरी!, पूर्वी उत्तर प्रदेश में गाँव के ज़मींदारों के विशाल घरों को बड़ी बखरी बोलते हैं. इस समय इस दोड्ड-मने को कस्तूरी बाई देखती हैं. कभी यह एक बड़े ज़मींदार का घर था. 135 साल पहले जब यह बना था, तब उस ज़मींदार परिवार के पास 10 हज़ार एकड़ ज़मीन थी. लेकिन धीरे-धीरे यह सिकुड़ती गयी. कुछ वन विभाग ने ले ली, बाकी जो बची वह ज़मींदारी-उन्मूलन की भेंट चढ़ गयी. अब इस परिवार के पास बस यही घर बचा है. और उन परिवारों की वारिस कस्तूरी राव. इन्हें लोग प्यार से कस्तूरी अक्का बोलते हैं. अक्का का मतलब है बड़ी बहन.

अगुम्बे को भारत का दूसरा चेरापूंजी कहा जाता है. यहाँ बारहों महीने टिप-टिप बारिश हुआ ही करती है. थोड़ी देर को रुकी फिर झड़ी लग गयी. बाज़ दफे तो यह बारिश बादल फटने (क्लाउड बर्स्ट) जैसा अहसास दिलाती है. किन्तु घाट में बादल नहीं फटते. ऊँचाई ज्यादा है नहीं, मात्र 2700 फीट, इसलिए ठण्ड का भी डर नहीं है, यूँ भी समुद्र यहाँ से मात्र 50 किमी ही है. किन्तु इस विशाल ‘दोड्ड-मने’ का फर्श चिप-चिप करता है, और ऊपर से उसकी खुरदुरी ज़मीन थोड़ी परेशान कर रही थी. घर के सभी लोग हमें भोजन कराने को आतुर थे, क्योंकि रात बढ़ रही थी. कस्तूरी अक्का के दामाद हमें हमारे कमरों में ले गए. ऊपर के एक बड़े हाल में सात-आठ पलंग पड़े थे, यह पुरुषों का शयन-कक्ष था, इसी तरह एक दूसरे बड़े क्स्मरे में चार या पांच पलंग थे, इसे महिलाओं को दिया गया. हमने सामान रखा, और बाथरूम कहाँ है, इसे जानने की उत्सुकता जगी. वे हमें नीचे लाए. उस वर्गाकार आँगन के बाद एक अलग बरामदा (दल्लान) थी, फिर इसके बाद एक लम्बा विशाल कक्ष, जिसके एक तरफ पूजा घर था. जिसके गर्भगृह में सोने की एक मूर्ती दैदीप्यमान थी. फिर इसके बाद उतने ही खुलेदार कक्ष में रसोई थी. इसे पार करने के बाद दूसरा सहन दिखा था. जिसके चारो तरफ परकोटा था, और जो एक समकोण आकार में खुला था, और इतना ही बंद. जिस तरफ बंद था, वहीँ स्नानागार और एक तरफ को कई शौचालय बने थे, और खुले इलाके में हरियाली थी. अगर रात को लघुशंका तक महसूस हुई, तो इतनी दूर चलकर आने की बात सोच कर सिहरन होने लगी. ऊपर से बिजली के बल्ब भी बस टिम-टिम करते. कस्तूरी अक्का के परिवार के लोग बिजली को लेकर काफी सेंसेटिव थे, इसलिए अनावश्यक कोई बल्ब नहीं जलता था. जरूरत पड़ी तो जला लिया अन्यथा घुप अँधेरा.


हम थोडा घबराए और पूछा, कि क्या महिलाओं को भी रात को इतनी दूर चलकर आना होगा? हमें बताया गया, कि नहीं जीने से उतरते भी कोने में एक टॉयलेट है. यह सुन कर जान में जान आई. हमारे साथियों में कई सुगर के मरीज़ भी थे. कुछ देर बाद हम खाने की बेंच पर आकर बैठे. हमें लाल रंग का चावल (भात) परोसा गया और कई तरह की सब्जियां, चटनी तथा पापड. रोटी नहीं थी. लेकिन भात खूब था. भोजन के बाद जब हम ऊपर गए तो उसके बाद घर की सारी रौशनी ऑफ कर दी गयी. इस अँधेरे घर में सिर्फ एक कमरा गुलज़ार था, और वह हमारा. विकास कुमार झा, एक अच्छे लेखक, पत्रकार, कवि व कहानीकार हैं. स्वयं सतीश जायसवाल भी विद्वान और जिजीविषा के धनी अद्भुत यायावर हैं. चूंकि विकास झा इस अगुम्बे पर “वर्षावन की रूपकथा” नाम से उपन्यास लिख चुके हैं. इसलिए मैंने पूछा, कि क्या भारत में वर्षा वन होते हैं? क्योंकि यहाँ तो जंगल का अर्थ ही प्राकृतिक जंगल हैं, यहाँ जंगल लगाए तो जाते नहीं? अलबत्ता बाग़ ही लगाए जाते हैं, इसलिए भारत के जंगलों को वर्षा-वन कहना एक तरह से अंग्रेजी के ‘रेन फारेस्ट’ का शाब्दिक अनुवाद है. सतीश जी ने इसकी बहुत अच्छी व्याख्या की, उन्होंने बताया, कि नहीं, उत्तर पूर्व और पश्चिमी घाट के इन जंगलों को वर्षा वन कहा जाना ही उचित है. क्योंकि मैदान में जो हिमालय की तराई के जंगल हैं, उनके लिए शब्द सदाबहार जंगल हैं. वे बारहों महीने रहते हैं, जबकि यहाँ के जंगल बालिश में ही फलते हैं. इसके बाद इस अगुम्बे और यहाँ के निवासियों पर चर्चा होने लगी. हम बात कर ही रहे थे, कि अचानक पट-पट की आवाज़ होने लगी. खिड़की खोल कर देखा, तो पाया कि ऐसी बारिश हो रही है, मानो पानी की बूँदें ज़मीन को फोड़ने पर आमादा हैं. मुझे तुलसीदास की राम चरित मानस के वर्षा-प्रसंग याद आने लगे- “बूँद अघात सहें गिरि ऐसे, खल के बचन संत सन जैसे!” तुलसी बाबा ने बनारस में बैठ कर कोरोमंडल की अनवरत बारिश की अद्भुत कल्पना की है. “बरसहिं जलद भूमि नियराये, यथा नवहिं बुधि, विद्या पाए!” थोड़ी देर बाद एक बादल का टुकड़ा हमारी खिड़की से घुसा और हमें भिगोता चला गया.रात काफी हो चुकी थी, और हम सोने चले गए.

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