जनादेश

जेएनयू में यह सब क्यों हो रहा है. कानून के राज को 'एक झटका' यह फैसला दिक्कत पैदा कर सकता है ! मेरे मित्र टीएन शेषन ! मोदी सरकार के समर्थन का यह कीमत मिली - तवलीन फैसला विसंगतियों से भरा- भाकपा (माले) तथ्यों से धराशाही हुए सियासत के तर्क! आरटीआई की धार भोथरी करती सरकार ! शाहनजफ़ इमामबाड़ा में ईद-ए-ज़हरा ! भाषा को रामनामी से मत ढकिये ! पर रात का खीरा तो पीड़ा ! नीतीश कुमार के दावे हवा-हवाई झारखंड चुनाव में बिखर रही हैं गंठबंधन की गांठें जांच के नामपर लीपापोती तो नहीं ? पीएफ घोटाले में बचाने और फंसाने का खेल ? कश्मीर के बाद नगालैंड की बारी ? गोंडा जंक्शन ! कभी इस डाक बंगला में भी तो रुके ! बिकाऊ है चंडीगढ़ रेलवे स्टेशन,खरीदेंगे ? झटका तो यूपी बिहार में भी लग गया !

नए भारत में मुसलमानों पर बढ़ता हमला !

हिसाम सिद्दीकी

वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी की यकीन दहानी के बावजूद कई प्रदेशों खुसूसन बीजेपी सरकारों वाले प्रदेशों में होने वाली मुस्लिम मुखालिफ सरगर्मियां जारी हैं. कट्टरपंथियों की जहरीली बयानबाजी और दाढी टोपी वालों के साथ छेड़छाड़ के वाक्यात मुसलसल जारी हैं. जो लोग यह हरकतें कर रहे हैं उन्हें यह भी ख्याल रखना चाहिए कि किसी कमजोर से कमजोर शख्स को अगर धकेल कर दीवार से लगा दिया जाएगा तो मरने से पहले वह भी एक बार पलट वार करने की कोशिश जरूर करेगा. बिल्ली को सबसे कमजोर समझा जाता है. उसके लिए भी बुजुर्गों ने बताया है कि अगर कमरे के अंदर बिल्ली को मारो तो दरवाजा खुला रखो वर्ना चारों तरफ से घिरी बिल्ली पलटकर हमला कर देती है. यहां तो इंसानों का मामला है. 18 जून को झारखण्ड में हिन्दू भाइयों की मदद और हिमायत से मुसलमानों ने नाराजगी व गुस्से में जो जारेहाना (आक्रामक) मजाहिरे किए, दरअस्ल वह मजाहिरे यही बताने के लिए थे कि कट्टरपंथियों और फिरकापरस्तों आप हमें दीवार तक मत धकेलिए.

2014 से 2019 तक वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी के पहले दौर की हुकूमत के दौरान मुल्क के तमाम दूसरे लोगों की तरह मुसलमानों का भी यह ख्याल था कि शायद पांच साल बाद 2004 की वाजपेयी हुकूमत की तरह नरेन्द्र मोदी हुकूमत भी रूखसत हो जाएगी, इसलिए लिंचिंग और जगह-जगह परेशान किए जाने के बावजूद मुसलमानों की जानिब से ऐसी नाराजगी, गुस्सा और जारहियत (आक्रमकता) कभी नहीं दिखाई दी थी जैसी तबरेज के वाक्ए के बाद दिखाई दी. इस बार गुस्सा जाहिर करने की एक बड़ी वजह यह भी थी कि अब मुसलमानों का यह यकीन दोबारा पुख्ता हो गया कि ऐसे मौकों पर अगर वह मुजाहिरा या जुलूस के लिए निकलेंगे तो उनकी तादाद से कई गुना ज्यादा तादाद में मुल्क के हिन्दू भी उनके साथ हर जगह खड़़े दिखाई देंगे. तबरेज के बाद दिल्ली, मुंबई, रांची, कोलकाता, सूरत, अहमदाबाद, बंगलौर, हैदराबाद और चेन्नई तक में होने वाले मुसलमानों के मजाहिरे में मुल्क के बड़ी तादाद में हिन्दू भी उनके साथ खडे़ दिखाई दिए. यही इस मुल्क की खूबी भी है और रिवाज (परम्परा) भी है.

इन मजाहिरों को देखने के बाद वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी, होम मिनिस्टर अमित शाह, सत्ता में बैठे दूसरे जिम्मेदारों और आरएसएस के जिम्मेदारों को चाहिए कि वह सब मजहब और हिन्दुत्व के नाम पर हंगामे करने वाले गुण्डे किस्म के लोगों तक मोअस्सर (प्रभावशाली) तरीके से वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी के ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’ के नारे के मकसद को पहुंचाए. यह कोई धमकी नहीं है लेकिन जो लोग सड़कों पर हंगामें करते फिर रहे हैं किसी भी दाढी, टोपी वाले को पकड़कर जय श्रीराम बुलवाने की कोशिश करने लगते हैं उन्हें दो-तीन बातें जरूर जेहन में रखनी चाहिए, एक तो यह कि अपनी हुकूमत के दूसरे दौर में वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी किस किस्म का नया भारत बनाना चाहते हैं. दूसरे यह कि सड़कों पर किसी को पकड़कर या पीट कर जय श्रीराम बुलवाने से न उनका कोई भला होने वाला है न उनके धर्म का और न देश का. तीसरे अगर मुसलमानों को तंग करने की इंतेहा (चरम) हो गई और तंग आकर दो-चार फीसद मुसलमान भी उन्हीं के ढर्रे पर उतर आए तो हालात बहुत खराब हो सकते हैं.

जो मुसलमान मुल्क में अब अपने वजूद, एहतराम (सम्मान) और जान बचाने के लिए मुजाहिरों पर निकले, जुलूस के दौरान मेरठ, सूरत और दिल्ली जैसी हरकतों में मुलव्विस हो गए उन्हें भी इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि अगर उन्होने कानून अपने हाथ में लेने की कोशिश की तो पुलिस और कानून अपना जो काम है वह तो करेगा ही मुसलमान उन करोड़ों हिन्दू भाइयों की हिमायत (समर्थन) भी खो देंगे जिन हिन्दुओं ने तबरेज के मारे जाने के बाद उसे इंसाफ दिलाने और आइंदा कभी ऐसा वाक्या न हो, मआशरे (समाज) को यह पैगाम देने के लिए मुसलमानों के साथ सड़कों पर निकले हैं अगर कोई मुसलमान सड़कों पर गुण्डई करने वाले कुछ हिन्दुआें के जैसा बनने की कोशिश करेंगे तो वह अपना ही नुक्सान करेंगे. दिल्ली के चावड़ी बाजार इलाके में महज पार्किग के मामूली झगडे़ के बाद अगर मुसलमानों के साथ हुई किसी ज्यादती के खिलाफ उन्होंने मजाहिरा किया था तो इस मजाहिरे के दौरान मंदिर में घुसने और तोड़-फोड़ करने का क्या जवाज (औचित्य) था. इस किस्म की हरकत को मुस्लिम मआशरा (समाज) और सरकार दोनों को ही बर्दाश्त नहीं करना चाहिए. अगर पार्किग के सिलसिले में उनके साथ मारपीट या ज्यादती हुई थी तो ज्यादती करने वालों के खिलाफ कार्रवाई के मतलाबे के साथ पुलिस स्टेशन के सामने मजाहिरा करना चाहिए था और धरना देना चाहिए था. मंदिर जाने का क्या मतलब था? 

सूरत, मेरठ और ऐसे ही कई मकामात पर मुसलमानों के एहतेजाजी जुलूस के दौरान पुलिस के साथ टकराव की नौबत क्यों आई, इसकी जवाबदेही किस पर है. सोशल मीडिया का जमाना है, हर किसी की जेब में स्मार्टफोन है अगर पुलिस ने ज्यादती की तो उसकी वीडियो बनाकर वायरल करनी चाहिए थी खुद ही पुलिस और सरकार से निपटने की जेहनियत किसी भी कीमत पर मुसलमानों और मुल्क के मफाद में नहीं है. तबरेज के लिए हुए मजाहिरों और निकले जुलूसों के बाद सरकार और सड़कों पर गुण्डई करने वालों दोनों को संजीदगी से गौर करना चाहिए कि शायद मुसलमानों के बर्दाश्त की कुवत जवाब दे चुकी है यह अच्छी अलामत नहीं है.लेखक जदीद मरकज के संपादक हैं .


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