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प्याज बिन पकवान

अरूणकुमार ‘पानीबाबा’

अनेकता में एक भारतीय पाककला पर विचार करें तो अपनी भोजन परंपरा में प्याज का महत्व नगण्य ही है.लेकिन इसके विपरीत समग्र सामाजिक दृष्टि से देखें तो प्याज केवल मुहावरा नहीं, वास्तव में मजदूर-किसान मेहनतकश तबकों के लिए समुचित साधन का पर्याय है. सामजिक इतिहास की दृष्टि देखें तो उच्च जातीय मध्यवर्ग में प्याज का चस्का `अधिक से अधिक एक सदी की कहानी है. मुगलई जायका ढाई सौ बरस का किस्सा कहा जा सकता है. लेकिन इस सिलसिले में दिल्ली और लाहौर की परंपरा को जोड़ दें तो ‘मुगलई’ खानपान को 800 साल पुराना कहा जा सकता है. लेकिन ऐसा मानना इतिहास की नज़र  से थोड़ा गलत दिखाई देता है.

पहला तथ्य, यह याद रखना चाहिए कि पंजाबी-पख्तूनी (और इन के अंदर कई रूपांतरण जैसे मुल्लाती/अमृतसरी वगैरह) परंपराओं का अति प्राचीनस्व-अस्तित्व है. निजी कथायात्रा है. इसलिए सल्तनत काल में जो पाक कथा वैविध्य दिल्ली के आसपास पनपी  उसे कभी भी मुगलई नहीं कहा जा सकता- बेशक फैजाबाद (अवध) में जिस पाक कला और जायके का विकास हुआ, वह उन्हीं पाक कला विशेषज्ञों का कौशल है जो दिल्ली की मुगल सल्तनत के पतन के बाद पनाह तलाश रहे थे.

गौरतलब है कि सल्तनत काल में और उसके बादशाह जहांनाबाद के दौर में दिल्ली के खानपान की खूबियों पर कहीं कोई दस्तावेज तो नहीं मिलते. पिछले 60-70 सालों में जो कुछ अपनी आंखों देखा, खुद चखा और जाना. जो कुछ दिल्ली में विकसित होकर फैजाबाद गया वह वहां से कुछ नया-पुराना रूप धरकर गालिब की दिल्ली में वापस लौट आया.

अवधी या मुगलई की एक खूबी बताना ज़रूरी है. मुगलई जायके में प्याज की भागीदारी तो अवश्य है लेकिन लहसुन की महक को दबाकर कभी नहीं. ‘मुगलई’ पाक कला में कौशल इसी बात का है अदरक, लाल मिर्च और गर्म मसालों का प्रयोग कुछ ऐसा हो कि लहसुन की महक के साथ प्याज का उपयोग हो.लेकिन इतनी सीमित मात्रा में ताकि सालन में जो भी मुख्य पदार्थ है- मांस या सब्जी उसकी और लहसुन की संयुक्त महक से प्रमुख बनी रहे. कबाब हो या सालन जीभ को फर्क स्पष्ट रहना चाहिए कि मांस तीतर का है या मुर्गे का, और मुर्गा ठेठ जंगली था या पालतू. यानी लहसुन भी मूल पदार्थ के जायके को दबा न दे.

इस संदर्भ में लाहौर की परंपरा से तो हम अनभिज्ञ हैं- कभी लाहौर देखा ही नहीं. लेकिन अमृतसर से दिल्ली तक की जो पंजाबी पाक कला भोगी है, उसमें प्याज का तड़का और महक ही प्रमुख स्वाद होता है.

अभी हाल फिलहाल तक मुगलई और उत्तर प्रदेश की कायस्थ  रसोई के कद्रदानों के भोजन का पंजाबीकरण कभी जचा नहीं. यह वास्तविकता है  कि पंजाबी ढाबों की परंपरा को अलग कर दें तो जो भी छोले पठूरों का रिवाज आया, उसमें छोलों का नुस्खा आजतक बिना प्याज का ही चला है. छोले पठूरों के साथ महीन कटी प्याज बिल्कुल अलग से अचार की तरह परसी जानी चाहिये.

दिल्ली में परांठे वाली गली से लेकर नयी सड़क, चावड़ी बाजार, सीतराम आदि में जो भी देसी ढाबे हुआ करते थे (जो सत्तर-अस्सी के दशक तक बहुत बड़ी संख्या में थे भी) उनमें कहीं प्याज का चलन नहीं था. लेकिन जैसे-जैसे चूल्हे की आंच सिके फुलकों की जगह तंदूरी रोटी का चलन बढ़ा.वैसे-वैसे दाल में प्याज का तड़का और सलाद-चलन भी शुरू हो गया.

इस विश्लेषण को यहीं रोककर यह याद दिलाना चाहते हैं कि मारवाड़ी, गुजराती, मराठी, तेलगु, कन्नड़, तमिल, मलयाली भोजन के सालन में प्याज का छौंका प्रचलित विधि तो नहीं है. ठेठ दक्षिण में जो छोटी मीठी प्याज होती है उसका सांभर एक विशिष्ट व्यंजन है. यह भी याद करवा दें कि उत्तर प्रदेश और बिहार में ऐसे कायस्थ परिवार जिनमें वैष्ष्णव धर्म अंगीकार हो चुका था. उनमें या तो भोजन की दोहरी व्यवस्था का चलन था या प्याज लहसुन पूरी तरह से निषिद्ध हुआ करते थे.हमारी समझ से स्वादतंतु के परिष्करण और विकास का विषय संस्कृति के समाजशास्त्रीय संवाद का बहुत संवेदनशील बिंदु है.ऐसे विषयों पर अकादमिक चर्चा का अभाव हमारी गुलाम मानसिकता का द्योतक है.अब चंद नुस्स्खे बिना प्याज की दाल सब्जी और कई सालन के पश्चिमी छोर तक जो उड़द या इसके साथ थोड़ी चने की दाल नियमित रूप से रोज रपाई जाती थी. उसमें कहीं भी प्याज का तड़का नहीं लगाया जाता था. इस दाल में सामान्यत: हींग जीरे का छौंक ही काफी माना जाता था. कुछ परिवारों में दो एक साबूत लाल मिर्च का उपयोग भी छौंक में होने लगा था.

काली और लाल मसूर अवश्य ऐसी दाल है जिसमें ‘मुगलई’ नुस्खा  इस्तेमाल होता है. पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में अरहर दाल का  नियमित सेवन होता है. अरहर और उड़द की दाल दो तरह की बनती है.एक घुरवा और दूसरी खड़ी दाल. खड़ी अरहर /उड़द में दाल का दाना साबूत दिखाई देता है.अरहर की खड़ी दाल में लहसुन लाल मिर्च का छौंक भी प्रचलित है. लोक नायक जयप्रकाश नारायण और समाजवादी नेता डॉ राममनोहर लोहिया को लहसुन, लाल मिर्च बघारी अरहर की दाल अत्यंत प्रिय थी.

जहांगीरी भरवां करेले, तोरी, और टिण्डे भी बिल्कुल बिना प्याज के बनाए जाते हैं.शाही करेलों में जो मसाला भरा जाता है उसमें उनका अपना गूदा (बीज सहित), नमक से परिष्कृत छिलके और सौंफ, धनिया, अमचूर या कच्चा आम का गूदा, बारीक कटी हरी  मिर्च (बीच रहित). आमतौर पर भरवां करेले उतने ही दिन खाए जाते थे जितने दिन कच्चा आम उपलब्ध रहता था.

साबूत भरवां परवल, टिंग और तोरी बनाने के लिए इन सब्जियों को चीर कर जो मसाला चिपकाया जाता है. वह सौंफ, धनियां, नमक, मिर्च, और अमचूर का मिश्रण ही होता है. यह तीनों भरवां रौनकदार सालन शादी नुस्खों में शुमार हैं. क्योंकि सब्जियों का स्वाद यथावत बना रहता है.

सूखे मसालेदार आलू हमेशा बिना प्याज के ही बनाये जाते हैं.आलू उबाल कर छील लें मोटा तोड़कर उसमें नमक, मिर्च, हल्दी, सौंफ, धनिया सूखा ही मिला लें. आलू थोड़ा रच जाये तो घी में जीरा, हींग का तड़का लगा कर आलू ठीक से भून लीजिये.

शाम के खाने में सूखे आलू, भरवां करेले के साथ टपके के आम (चूसने वाले आम) छौक लीजिए. आम के इस रसे को टपका ही कहते हैं. घी के छौंक में सिर्फ जीरा डाला जाता है.बाकी नमक, सौंफ और बीज निकाली हरी  मिर्च. शाम के परांठों का स्वाद चौगुना हो जायेगा. 

अगर टपके आम उपलब्ब्ध न हों तो शाम के परांठों के साथ खटटा मीठा कद्दू (सीताफल या कुम्हड़ा) रसेदार बना लीजिए. लाल पका मोटे दल का कद्दू छांटकर खरीदिए. छिलका गूदा अलग कर छोटे टुकड़े काट लें. घी में हींग जीरे और साबूत मेथी का छौंक लगाकर कड़ाही में चढ़ा दें. ऊपर से सौंफ, धनिया, नमक, लाल मिर्च डाल कर ढक दें.पांच-सात मिनट में कद्दू गलने लगे तो एक बार चला दें. अगले पांच मिनट बाद जरूरत के मुताबिक रसे के लिए पानी लगा दीजिए. कद्दू घुलता दिखाई देने लगे तो मनपसंद मीठा गुड़, शक्कर, खांड, बूरा या चीनी और अमचूर पाऊडर डाल कर दो मिनट उबलने दें. आंच से उतारने के बाद हल्का सा गर्म मसाला पाऊडर छिड़क दें. इस विशिष्ट सालन में पकाते समय अदरक की महीन कतरन भी डालनी चाहिए. पूड़ी, कचौड़ी परांठा (जिन्हें पक्का भोजन कहा जाता है) के साथ मीठा कद्दू शाही और अनिवार्य सालन है.देशभर में प्रचलित परंपराएं  मूलत: वैष्ष्णव प्रसाद पर आधारित भोजन की हैं. उस परंपरा में प्याज, लहसुन दोनों वर्जित हैं.कश्मीरी परंपरा में तो गोश्त भी बिना प्याज के पकाया जाता है.

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