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पहलू, पुलिस, डॉक्टर और जज

अजित साही

पहलू ख़ान और उसके साथ सफ़र कर रहे अन्य मुसलमानों पर अप्रैल 1, 2017 को राजस्थान के अलवर ज़िले में हमला हुआ था. एफ़आईआर के अनुसार हमला शाम सात बजे हुआ. एफ़आईआर के ही मुताबिक घटनास्थल पुलिस थाने से सिर्फ़ दो किलोमीटिर दूर है. लेकिन एफ़आईआर सुबह 4 बज कर 24 मिनट पर दर्ज किया गया, यानी घटना के साढ़े नौ घंटे बाद. एफ़आईआर ये भी कहता है कि घटना की जानकारी पुलिस को सुबह 3 बज कर 54 मिनट पर मिली थी, यानी एफ़आईआर लिखने के महज़ आधे घंटे पहले. लेकिन हैरत की बाद ये है कि इसी एफ़आईआर में पहलू का बयान भी दर्ज है जो पुलिस ने रात बारह बजे अस्पताल में ले लिया था. अगर पुलिस को घटना की जानकारी ही सुबह चार बजे मिली तो जानकारी के चार घंटे पहले ही पहलू का बयान कैसे ले लिया था?


अगर पुलिस ने रात बारह बजे पहलू का बयान ले लिया था तो एफ़आईआर लिखने में साढ़े चार घंटे क्यों लग गए? क्यों पुलिस ने एफ़आईआर में झूठ लिखा कि उसे घटना की जानकारी सुबह चार बजे मिली? पहलू के बयान में ये तक लिखा है कि पहलू और उसके साथियों को घटनास्थल से अस्पताल पुलिस ने ही पहुँचाया. अदालत में भी पुलिस ने इस तथ्य से इंकार नहीं किया. क्यों नहीं एफ़आईआर में लिखा कि पुलिसकर्मियों ने पहलू को अस्पताल पहुँचाया? क्यों नहीं उन पुलिसवालों के नाम दर्ज किए जो घटनास्थल पर पहुँचे थे? क्यों नहीं एफ़आईआर में बताया कि घटनास्थल पर पुलिस ने सबूत इकट्ठा करने के लिए और हमलावरों को गिरफ़्तार करने के लिए क्या कार्रवाई की? पुलिस को दिए अपने बयान में पहलू ने छह हमलावरों के नाम लिए थे. फिर भी एफ़आईआर में हमलावरों के नाम वाले कॉलम के नीचे “अज्ञात” लिखा गया. क्यों नहीं उस कॉलम में उन छह लोगों के नाम लिखे जो पहलू ने दिए?


घटना के दो दिनों बाद पहलू की मौत हो गई. पुलिस ने एफ़आईआर में धारा 302 जोड़ दी. लेकिन शुरू से ही धारा 307 नहीं जोड़ी जो कि हत्या की कोशिश वाली धारा होती है. क्यों? जबकि ये साफ़ था कि गौरक्षकों ने पहले से पहलू और उसके साथियों की गाड़ियों का पीछा किया था और उनको घात लगा कर रोक कर पीटा था, पुलिस ने साज़िश की धारा 120B लगाने से भी इंकार कर दिया. पहलू और उसके साथी हाट से जानवर ख़रीद कर ला रहे थे और उनके पास ख़रीद की बाक़ायदा रसीद थी. जब हमलावरों को वो रसीद दिखाई तो हमलावरों ने उसे फाड़ दिया. लेकिन पुलिस ने सबूत मिटाने वाली धारा 204 भी नहीं लगाई. बाद में पहलू के लड़कों ने दोबारा हाट जाकर डुप्लीकेट रसीद हासिल की थी. हमलावरों ने पहलू और उसके साथियों के मवेशी लूट लिए थे, लेकिन पुलिस ने लूट और डकैती की धाराएँ 396, 397, 399 और 402 भी नहीं लगाईं.


पहलू ने जिन छह हमलावरों के नाम लिए थे पुलिस कहती रही वो नहीं मिल रहे हैं. जबकि सभी छह खुले आम घूमते रहे. पुलिस ने उनके बारे में जानकारी देने वाले के लिए पाँच हज़ार रुपए का इनाम भी घोषित किया. लेकिन पुलिस ने इन छह लोगों के या उनके रिश्तेदारों के घर पर दबिश तक न दी. क़ानून में प्रावधान है कि भगोड़े मुजरिम को समर्पण के लिए मजबूर करने के लिए उसकी संपत्ति की कुर्की की जा सकती है. पुलिस ने इसके लिये भी अदालत में अर्जी नहीं दी. और कुछ हफ़्तों बाद पुलिस ने रिपोर्ट लगा दी कि तहक़ीक़ात से मालूम हुआ है कि ये छह हमले के वक़्त मौक़ा-ए-वारदात पर नहीं थे.


क्या तहक़ीक़ात? तो पुलिस ने कहा कि मौक़ा-ए-वारदात पर जो पुलिस वाले थे उन्होंने बयान दिया कि ये छह लोग हमले के वक़्त वहाँ मौजूद नहीं थे. यानी पुलिस ने इन छह लोगों को छोड़ने के लिए तो ये मान लिया कि मौक़े पर पुलिसवाले मौजूद थे, लेकिन घटनास्थल पर पुलिसवालों की मौजूदगी का एफ़आईआर से ज़िक्र ग़ायब कर दिया. पहलू द्वारा नामज़द जो छह लोग है उनमें चार जानेमाने भाजपाई हैं. इनका मुखिया, जगमल यादव, एक गौशाला चलाता है, वही गौशाला जहाँ पहलू पर हमले के बाद उसके लूटे हुए मवेशी ले जाए गए थे. पुलिस ने इसी गौशाला के कर्मचारियों का बयान भी इस रिपोर्ट में लगा दिया.


आइए अब डॉक्टरों की बात करते हैं. पहलू का पोस्टमॉर्टम तीन सरकारी डॉक्टरों ने किया. अपनी रिपोर्ट में उन्होंने साफ़ लिखा कि पहलू की मौत चोट लगने से हुई है. ये पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट चार्जशीट का हिस्सा है और अदालत में दर्ज है. हैरत की बात है कि पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट झुठलाने के लिए पुलिस ने पहलू के मरने के बाद जिस निजी अस्पताल में पहलू का इलाज हो रहा था वहाँ जाकर वहाँ के डॉक्टरों के बयान लिए. इस अस्पताल का नाम है कैलाश हॉस्पिटल और इसके मालिक हैं भाजपा सांसद महेश शर्मा जो उस दौरान मोदी सरकार में मंत्री भी थे. ये वही महेश शर्मा हैं जो दादरी में अख़लाक़ की हत्या करने वाले गौरक्षकों के समर्थन में सार्वनिक रूप से सामने आए थे.


पुलिस को दिए अपने बयान में कैलाश हॉस्पिटल के सर्जन डॉ. वी. डी. शर्मा ने कहा कि पहलू की चोट मौत लगने से नहीं हुई. उन्होंने कहा कि पहलू मौत से पहले “सामान्य” थे. अचरज की बात है कि इसी बयान में डॉ. शर्मा ने कहा कि जब पहलू अस्पताल में भरती हुए थे तो उनकी नाक से ख़ून बह रहा था और एक्स-रे से पता चला था कि उनकी छाती में कई हड्डियाँ टूट गई थीं. हास्यास्पद है कि डॉ. शर्मा ने एक तरफ़ कहा कि पहलू की साँस “सामान्य” थी और दूसरी तरफ़ ये भी कहा कि पहलू को ऑक्सीजन मशीन पर लगाया गया था क्योंकि उनको साँस लेने में तकलीफ़ थी. कैलाश हॉस्पिटल के रेडियॉलोजिस्ट डॉ. आर. सी. यादव ने बयान दिया कि ultra-sonography और एक्स-रे से पता चला था कि पहलू की छाती में बाईं और दाईं दोनों ओर चार-चार हड्डियाँ टूटी थीं. लेकिन फिर भी डॉ. यादव ने बयान दिया कि पहलू की छाती एकदम ठीक थी और उनकी मौत छाती की हड्डी टूटने से नहीं हो सकती थी.


जैसा कि हम जानते हैं जज साहब ने पहलू की हत्या के आरोपी सभी मुजरिमों को आज बरी कर दिया है. आख़िर कौन हैं ये आरोपी जबकि पुलिस ने पहलू द्वारा गिनाए गए छह लोगों को अभियुक्त बनाया ही नहीं था? ये वो आरोपी हैं जिनके ख़िलाफ़ पुलिस ने पहले से कमज़ोर केस बनाया हुआ था और जिनको पहले ही राजस्थान हाईकोर्ट से बेहद आसानी से ज़मानत मिल चुकी थी. निचली अदालत के आज के फ़ैसले को पूरा पढ़ कर ये देखना होगा कि क्या माननीय जज साहब ने एफ़आईआर के तमाम विरोधाभास पर कोई भी सवाल किया? क्या जज साहब ने पुलिस से पूछा कि किस आधार पर उन छह लोगों को छोड़ा गया जिनका पहलू ने नाम लिया था? जज साहब ने पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट को किस आधार पर रिजेक्ट कर दिया?

अभी पूरा जजमेंट आना बाक़ी है.

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