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कश्मीर यानी खौलते पानी का बंद भगौना!

राजेंद्र तिवारी

नई दिल्ली .अनुच्छेद ३७० व ३५ए हटाए जाने के बाद जैसे-जैसे अघोषित कर्फ्यू को हटाया जा रहा है, विरोध के स्वर सामने आने लगे हैं. ५ अगस्त के बाद पहली बार घाटी में अलगाव आवाजें उठनी शुरू हो गईं हैं. अलगाववादियों की ओर से कई जगह पोस्टर साटे गये हैं. कुल मिलाकर जो स्थिति दिखाई दे रही है, उससे लगता है कि कश्मीर इस समय खौलते पानी का बंद भगौना है.

हालांकि केंद्र सरकार का दावा, कश्मीर में स्थितियां नियंत्रण में होने का है लेकिन वास्तविकता यह नहीं है. पिछले दिनों श्रीनगर के सोरा समेत कुछ इलाकों में रातोंरात पोस्टर साट दिये गये जिसमें शुक्रवार की नमाज के बाद कश्मीर की स्वायत्तता छीने जाने के विरोध में श्रीनगर स्थित यूएन कार्यालय के लिए मार्च करने का आह्वान किया गया है.इससे पहले भी कई प्रदर्शन हुए लेकिन भारत सरकार इनसे इनकार करती रही है. प्रदर्शन के जो वीडियो सामने आए, उनको फेक (पुराने) करार देने की केंद्र सरकार की ऱणनीति से निपटने के लिए लोगों ने अब नया रास्ता निकाला है. अब प्रदर्शनों में जो प्लेकार्ड इस्तेमाल किये जा रहे हैं, उनपर सबके ऊपर तारीख लिखी होती है, जिससे प्रदर्शनों को पुराना न बताया जा सके.

यूएनएमओजीआईपी तक मार्च के जरिये इस मसले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने की कोशिश हो रही है. अब तक पाकिस्तान ने इस मसले को यूएन में ले जाने व इस पर अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने की जो कोशिशें कीं, वे नाकामयाब रही हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति का इस संदर्भ में पिछला ट्वीट और अब फ्रांस के राष्ट्रपति द्वारा इस मुद्दे को द्विपक्षीय बताने व इस मसले पर किसी भी तरह की अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता को सिरे से नकारने से पाकिस्तान की रणनीति पूरी तरह जमींदोज हो गई हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ्रांस के बाद अब सऊदी अरब की यात्रा पर पहुंचेंगे और उसके बाद दोबारा फ्रांस जाएंगे, जहां व जी-७ की बैठक में पार्टनर देश के तौर पर भाग लेंगे. स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री मोदी वहां अमेरिकी राष्ट्रपति, रूसी राष्ट्रपति, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री, चीनी राष्ट्रपति व जर्मन चांसलर से मिलेंगे. चीनी राष्ट्रपति अक्टूबर में भारत आने वाले हैं और वह वाराणसी में प्रधानमंत्री मोदी से मिलेंगे. कुल मिलाकर, पाकिस्तान इस मुद्दे के अंतरराष्ट्रीयकरण में कूटनीतिक रूप से भारत के सामने कहीं नहीं टिक पा रहा है.

लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के मजबूत रहने का मतलब यह नहीं निकाला जा सकता कि वह अंदरूनी रूप से भी उतना ही सफल है. हकीकत यह है कि कश्मीर में भारत सरकार के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा है. बस देखना यह है कश्मीरियों का गुस्सा किस तरह से सामने आएगा. कश्मीर से जो खबरें आ रही हैं, उनसे कोई अच्छे संकेत नहीं मिल रहे हैं. कश्मीर में जिस पहले प्रदर्शन की खबर सामने आयी थी, वह शांतिपूर्ण था लेकिन उसमें अलगाव के स्वर बहुत मजबूती से सामने आये. उसके बाद वाले प्रदर्शनों में ये स्वर और मजबूत होते दिखाई दे रहे हैं. इन सबका असर किस तरह से होता, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि लोगों का गुस्सा शांतिपूर्ण ढंग से सामने आता है या फिर किसी और तरीके से.

यूएनएमओजीआईपी (संयुक्त राष्ट्र मिलिटरी आब्जर्वर्स ग्रुफ फॉर इंडिया एंड पाकिस्तान) के ऑफिस मार्च करने के आह्वान का उद्देश्य कश्मीर मामले में संयुक्त राष्ट्र को केंद्र में लाना ही है. कश्मीर में १९४९ से यूएनएमओजीआईपी तैनात है.जनवरी १९४८ में सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव ३९ पारित किया जिसके तहत कश्मीर विवाद की जांच व मध्यस्थता के लिए भारत व पाकिस्तान के लिए संयुक्त राष्ट्र कमीशन फॉर इंडिया एंड पाकिस्तान (यूएनसीआईपी) का गठन किया गया.

अप्रैल १९४८ में सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव ४७ पारित किया. इसके तहत कमीशन का आकार बड़ा करने और फाइटिंग रोकने के लिए प्रेक्षकों का इस्तेमाल करने समेत विभिन्न तरीकों की सिफारिश करने का फैसला किया. यूएनसीआईपी की सिफारिश पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने कमीशन के लिए मिलिटरी एडवाइजर व इस एडवाइजर की मदद करने के लिए मिलिटरी आब्जर्वर्स के ग्रुप की नियुक्ति की जो बाद में यूएनजीओएमओआईपी के नाम से जाना गया. ग्रुप की पहली टीम जनवरी १९४९ को अविभाजित जम्मू-कश्मीर में आई. इसका काम यूएनसीआईपी के मिलिटरी एडवाइजर को इनपुट प्रदान कर उसे असिस्ट करने का था. आब्जर्वर्स को इनवेस्टीगेशन में लोकल अथॉरिटी के साथ रहना और संपूर्णता में तथ्यपरक व निष्पक्ष रिपोर्ट करने का था. इनको दोनों देशों के बीच हस्तक्षेप या दोनों देशों की सेनाओं के आॉर्डर्स में कोई भी हस्तक्षेप करने की मनाही की गई. यह व्यवस्था २७ जुलाई १९४९ को हुए कराची एग्रीमेंट तक चली. कराची एग्रीमेंट के तहत सीजफायर लाइन तय की गई जो यूएन मिलिटरी आॉब्जर्वर द्वारा सुपरवाइज की जानी थी. इस एग्रीमेंट में स्पष्ट किया गया कि यूएनसीआईपी जम्मू-कश्मीर में जहां भी जरूरी समझेगा, यूएन अॉब्जर्वर्स स्टेशन करेगा और उसकी की मदद से दोनों देशों के लोकल मिलिटरी कमांडर मौके पर जाकर सीजफायर लाइन को वेरीफाई करेंगे. यदि इसमें कोई असहमति उभरती है तो उसे यूएनसीआईपी मिलिटरी एडवाइजर को रेफर किया जाएगा और उसका फैसला अंतिम होगा.

३० मार्च १९५१ को सुरक्षा परिषद ने अपने प्रस्ताव ९१ के तहत यूएनसीआईपी को खत्म करने के साथ यूएनएमओजीआईपी द्वारा सीजफायर लाइन के सुपरवाइज करते रहने का फैसला किया. इसका काम स्थितियों पर नजर रखने, उनको रिपोर्ट करने और सीजफायर लाइन के उल्लंघन की शिकायतों की जांच करके उनकी रिपोर्ट दोनों देशों व संयुक्त राष्ठ्र के महासचिव को देने का था.

१९७१ में दोनों देशों के बीच लड़ाई छिड़ गई. १७ दिसंबर को सीजफायर हुआ और सीजफायर लाइन १९४९ वाली नहीं रह गई. १२ व २१ दिसंबर को सुरक्षा परिषद की बैठक में प्रस्ताव नंबर ३०७ पारित हुआ.इसमें  दोनों देशों को १९४९ की सीजफायर लाइन बहाल करने और मिलिटरी को १९४९ वाले ठिकाने पर वापस भेजने को कहा गया.जुलाई १९७२ में शिमला समझौते के तहत कश्मीर में लाइन अॉफ कंट्रोल डिफाइन की गई जो लगभग १९४९ जैसी ही थी. भारत ने कहा कि यूएनएमओजीआईपी का मैंडेट खत्म हो गया क्योंकि यह १९४९ वाली सीजफायर लाइन को लेकर था. लेकिन पाकिस्तान यूएनएमओजीआईपी  पर अड़ा रहा. इस पर संरा महासचिव ने कहा कि ग्रुप सुरक्षा परिषद के फैसले से ही खत्म भंग किया जा सकता है. यूएनएमओजीआईपी पर सुरक्षा परिषद को महासचिव की आखिरी रिपोर्ट १९७२ में पब्लिश हुई थी. 

भारत ने इस ग्रुप का संज्ञान लेना बंद कर दिया जबकि  पाकिस्तान लगातार सीजफायर उल्लंघन की रिपोर्ट ग्रुप को करता रहा है. इससे यूएनएमओजीआईपी ने अपनी एक्टिविटी एलओसी के इस तरफ यानी इधर के जम्मी-कश्मीर में सीमित कर लीं. अलबत्ता भारत यूएनएमओजीआईपी को सुरक्षा, परिवहन और दूसरी सुविधाएं मुहैया करा रहा है.

यूएनएमओजीआईपी की तैनाती स्कार्डू, गिलगिट, दोमेल, रावल कोट, कोटली व भिंबर में है. एक फील्ड स्टेशन सियालकोट में भी है. अपनी तरफ फील्ड स्टेशन जम्मू, पुंछ व राजोरी में हैं, दिल्ली में लाइजन आॉफिस है. इसका मुख्य हेडक्वार्टर मई से अक्टूबर तक श्रीनगर में और बाकी समय इसलामाबाद रहता है.

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