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भारत का दूध दही भी बंद कर देगा नेपाल ?

यशोदा श्रीवास्तव

काठमांडू .चीन नेपाल के मिल्क प्रोडक्ट बाजार पर कब्जा करने की दिशा में तजी से कदम बढ़ा रहा है. इसका सबसे बड़ा नुकसान भारत को उठाना पड़ेगा क्योंकि अभी तक नेपाल के मिल्क उत्पाद  बाजार पर भारत का कब्जा है. चीन 32 अरब की लागत से नेपाल में गाय भैंस के तीन फार्म खोलने जा रहा है. पोखरा व दो अन्य जगहों पर उसके इन फार्म के लिए जमीनें ले ली गई है और काम तेजी  से चल रहा है. चीन के इस काउ फार्म पर अफसर छोड़कर बाकी सब नेपाली होंगे. अब इस फार्म से विभिन्न प्रकार के मिल्क उत्पाद नेपाल के बाजार में अपना पंाव पसारेंगे ही यहां उतपन्न बछड़ों के लिए स्लाटर हाउस भी होंगे. नेपाल के बाजार पर भारत और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा चल रही है लेकिन चीन भारत से पीछे इस लिए हो रहा था कि उसके पास नेपाल में माल पंहुचाने के लिए सुलभ मार्ग नहीं है. इस लिए चीन अपने ज्यादातर उत्पादन नेपाल में ही  करने की रणनीत पर काम कर रहा है. नेपाल स्वयं को आत्म निर्भर बनाने के लिए भारत की अपेक्षा चीन को अधिक तरजीह दे रहा है. नेपाल में कम्युनिष्ट सरकार होने का भी उसे फायदा मिल रहा है. अब इन चाइनीज फैक्टरियों में काम करने वाले हजारों नेपाली लोगों को प्रो चाइनीज नही ंतो और क्या कहा जा सकता है? वरिष्ठ कम्युनिष्ट नेता तथा नेपाल के पूर्व पीएम माधव कुमार नेपाल कहते हैं कि नेपाल भारत के साथ मजबूत संबंध का पक्षधर सदैव रहा है और है. जहां तक चीन से बढ़ रहे संबंधों की बात है तो उनका देश आत्मसम्मान और संप्रभुता के आधार पर पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते बनाना चाहता है. उन्होंने कहा कि भारत और चीन दोनों ही हमारे पड़ोसी देश हैं ऐसे में यह कैसे संभव है कि एक से हमारे संबंध हों और दूसरे से न हो? उन्होंने साफ कहा कि दोनों देशों के बीच रिश्तों के सुधार के लिए लगातार काम करने की जरूरत है. यानी नेपाल के पूर्व पीएम माधव नेपाल मानते हैं कि दोनों देशों के बीच सब कुछ ठीक नहीं है. साफ कहा कि नेपाल भारत से कारोबार में रियायत चाहता है. कहा कि 2014 में पीएम मोदी नेपाल आए तब उनके नेपाली संसद में संबोधन से स्थितियां काफी अनुकूल बनी थी लेकिन यह ज्यादा दिन तक नहीं कायम रह सकी. मधेसी मुद्दों को लेकर नेपाल बार्डर पर की गई नाकाबंदी से दानों देशों के संबंध प्रभावित हुए. भारत की अपेक्षा चीनी परियोजनाओं को तरजीह दिए जाने पर उन्होंने कहा कि कई भारतीय परियरेजनाएं समय पर पूरी नहीं होती जब चीनी परियोजनाएं समय सीमा के अंदर पूरी हो जाती है.

भारत और नेपाल के बीच रिश्ते में खटास मिठास तो आता रहा है लेकिन उच्च स्तरीय वार्ता के बाद संबंध फिर सामन्य हो जाया करते थे. यदा कदा दोनों देशों की सरकारों के बीच किसी मुद्दे को लेकर तनाव की स्थिति में भी दोनों देशों की जनता के बीच संबंध मधुर ही रहे हैं. यह स्थिति नेपाल के तराई से लेकर पहाड़ तक देखने को मिलता था. और यही वजह है कि दोनों देशों के बीच के रिश्तों को दुनिया रोटी बेटी के रिश्ते के रूप में देखती रही है.ल्ेकिन आज? निसंदेह परिस्थितियां बदली हुई है. अब तो सरकार सरकार के बीच रिश्ते चाहे जैसे हों दोनों देशों के नागरिकों के बीच की वह मधुरता भी गायब हो रही है. और यदि यह नहीं बचा तो महज दोनों देशों के सरकार सरकार के बीच   के रिश्तों से रोटी बेटी जैसा मधुरतम रिश्ते के बचे रह पाने में संदेह है. भारत के प्रति नेपालियों में इस प्रतिकूल बदलाव में तेजी दरअसल 2015 के उस वक्त के बाद आई जब भारत पर कथित नाकेबंदी का आरोप लगा. करीब पांच माह तक भारत - नेपाल सीमा के लगभग सभी नाकों पर हुई बंदी से वाकई नेपाल की दुश्वारियां बढ़ गई थी.   यह नाकेबंदी वास्तव में संविधान संशेाधन को लेकर उस वक्त के नेपाल में कम्युनिष्ट सरकार के खिलाफ थी जिसे नेपाल के ही मधेसी दलों ने कर रखा था लेकिन इसका तोहमत ओली सरकार ने बड़े ही चालाकी से भारत सरकार पर मढ़ दिया. कहना न होगा कि आम चुनाव में ओली के चुनाव प्रचार का प्रमुख बिंदु ही भारत विरोध था. अफसोस कि भारत के पीएम नरेंद्र मोदी चार बार नेपाल की यात्रा पर गए लेकिन इस तनाव को दूर करने में कामयाब नहीं हुए. उल्टे नेपाल ने भारत से दूरी और चीन के करीब खिसकने के संकेत कई बार दिए. गत वर्ष पुणे में बिम्स्टेक के सैन्य अभ्यास में नेपाल का शामिल न होना ह उसके भारत से दूर रहने का संकेत था. इस सैन्य अभ्यास की मेजबानी भारत कर रहा था जबकि चीन द्वारा आयोजित सैन्य अभ्यास में नेपाल शामिल हुआ था.

नेपाल और भारत के बीच संबंधों में दरार की ताक में तो चीन था ही. इसका उसने खूब फायदा भी उठाया. विकास के नाम पर नेपाल में चीन की हर क्षेत्रों में बढ़ रही घुसपैठ से यह कहना समीचीन होगा कि नेपाल प्रो चाइना की ओर बढ़ रहा है. याद होगा करीब चार दशक पहले नेपाल में जब पंचायती व्यवस्था थी तब चीन बार्डर के कंदोरी से काठमांडू तक सड़क का निमार्ण चीन करा रहा था. चीन प्रायोजित इस सड़क के निमार्ण में करीब 20 हजार नेपाली मजदूर काम कर रहे थे. इन मजदूरों को चीन मावोवाद की तस्वीर का लाकेट पहना रहा था. यानी राजशाही के वक्त से ही चीन नेपाल में कम्युनिष्ट को मजबूत करने में लगा था. नेपाल की राजनीति के जानकार और विश्लेषक मंगल प्रसाद गुप्त कहते हैं कि दरअसल नेपाली मजदूरों को चीन एहसास करा रहा था कि तुम इस वक्त मेरा नमक खा रहे हो. उस वक्त के वे मजदूर चीन का गुणगान करने लगे थे. आज तो नेपाल में एक दो नहीं चीन की सैकड़ों परियोजनाएं चल रही है जहां कई हजार नेपाली मजदूर कार्यरत हंै. जाहिर है चीन इस माध्यम से नेपालियों को अपनी ओर आर्कषित कर रहा है जो धीरे धीरे भारत से नफरत की वजह बनता जा रहा है. नेपाल में भारत तथा चीनी परियोजनाओं के प्रति भी नेपालियों में जर्बदस्त भेद देखा जा रहा है. वे जब भी आंदेालन पर होते हैं तो उनके निशाने पर नेपाल में स्थापित भारतीय परियोजनाओं के कार्यालय और भारतीय वाहन ही होते हैं जबकि चीन की परियोजनाओं के प्रति उनमें कोई गुस्सा नहीं हेाता. नेपाल में भारतीय उत्पादन को भी धीरे धीरे कम किया जा रहा है. इसमें भी चाइना का घुसपैठ बढ़ रहा है. उदाहरण के तौर पर भारतीय सीमेंट को ले सकते हैं. नेपाल में भारत सीमा से सटे तक नेपाली कंपनियो की सीमेंट फैक्टरियां धड़ाधड़ खुल रही हैं. इन फैक्टरियों में भारत से आयातित कच्चे माल से ही सिमेंट का उत्पादन होता है. यह सीमेंट भारतीय सीमेंट की अपेक्षा करीब 100 से डेढ़ सौ रूपये प्रति बैग मंहगा है. यही वजह रही है की कम से कम नेपाल के तराई लोग नेपाली सीमेंट की अपेक्षा भारतीय सीमेंट का उपयोग करते थे. अब इस पर वैन लगा दिया गया है. नेपाली लोग भारतीय सीमेंट की खरीद नहीं कर सकते. उन्हें नेपाल में बना सीमेंट ही खरीदना है. नेपाल के ताजा हालातों पर नजर रखने वाले एक मधेसी दल के नेता का कहना है कि धीरे धीरे नेपाल सीमेंट उद्योग पर भी चीन कब्जा करने की रणनीत बना रहा है. भारत सीमा से सटे नवलपरासी में वह सीमेंट की बड़ी फैक्टरी लगाने की सेाच रहा है.

बता दें कि भारत और नेपाल के रिश्तों में जब भी खटास की स्थित उत्पन्न  हुई है तो इसे उच्चस्तरीय वार्ता के जरिए समाप्त कर लिया जाता रहा है. हाल ही भारत के विदेश मंत्री एस जयशकर ने भी नेपाल का दौरा किया है. विदेश मेंत्री जयशंकर को नेपाल के मामलोे में समझ अच्छी है. निसदेह वे इसे बेहतर बनाने की दिशा में कोई प्लान कर रहे होंगे लेकिन अब ऐसा कुछ करने की जरूरत है जिससे दोनों देशों की सरकार के बीच ही नहीं जनता के बीच भी सौहाद्र की अनुभूति हो. मानना होगा कि मौजूदा वक्त में भारत और नेपाल के पहाड़ की जनता के बीच संबंध मधुर नहीं रह गए. इसे देखना हो तो काठमांडू से लगायत पोखरा और अन्य दर्शनीय स्थलों पर जाकर देखा जा सकता है. पहाड़ी लोग भारतीयों को अब घूर कर देखने ही लगे हैं, बात बात पर मारपिटाई पर भी उतर आते हैं. नेपाल जा रहे भारतीयों को प्रशासनिक अधिकारियों की उपेक्षा का शिकार होना पड़ रहा है.


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