जनादेश

बाबा रामदेव का ट्विटर पर क्यों हुआ विरोध ? जेएनयू के छात्र यूं नहीं सड़क पर हैं गुदड़ी के लाल थे वशिष्ठ नारायण सिंह नहीं रहे अब्दुल जब्बार भाई नहीं रहे अब्दुल जब्बार भाई ध्यान से देखिये ,ये फोटो देश के महान गणितज्ञ की है ! नेपाल में शुरू हुआ चीन का विरोध जेएनयू में यह सब क्यों हो रहा है. कानून के राज को 'एक झटका' यह फैसला दिक्कत पैदा कर सकता है ! मेरे मित्र टीएन शेषन ! मोदी सरकार के समर्थन का यह कीमत मिली - तवलीन फैसला विसंगतियों से भरा- भाकपा (माले) तथ्यों से धराशाही हुए सियासत के तर्क! आरटीआई की धार भोथरी करती सरकार ! शाहनजफ़ इमामबाड़ा में ईद-ए-ज़हरा ! भाषा को रामनामी से मत ढकिये ! पर रात का खीरा तो पीड़ा ! नीतीश कुमार के दावे हवा-हवाई झारखंड चुनाव में बिखर रही हैं गंठबंधन की गांठें

नमस्कार ,मैं रवीश कुमार ..................

शंभूनाथ शुक्ल

नई दिल्ली .नमस्कार ,मैं रवीश कुमार.... एक बड़ी आबादी को रोज रात इन शब्दों का इंतजार रहता है .बहुत कम लोग उनके बारे में ,उनके संघर्ष के बारे में जानते हैं .कैसे वे बिहार के मोतिहारी जिले के जीतवारपुर गांव से निकल कर पटना पहुंचे .पटना से वे दिल्ली पहुंचे .दिल्ली में उस दौर के सबसे चर्चित अख़बार जनसत्ता से उन्होंने शुरुआत की .फिर एनडीटीवी गए और आज इस चैनल की पहचान रवीश कुमार से होती है .

मैंने रवीश कुमार के साथ कई बार लंबी बैठकें कीं और उनसे कोई ‘क्रांतिकारी’ चर्चा करने की बजाय इस व्यक्ति को करीब से देखने और समझने का प्रयास किया. गाजियाबाद के वैशाली इलाक़े में स्थित एक अपार्टमेंट के ग्यारहवें माले के जिस फ़्लैट में वे रहते हैं, वह असाधारण सिर्फ इस मामले में है कि चारों तरफ पुस्तकें ही पुस्तकें दिखती हैं. अलमारी में भी और टेबल पर भी. टीवी पर सूट-टाई में दिखने वाले रवीश घर में सिर्फ टी-शर्ट और लोअर में ही मिले. चाहे सुबह हो या शाम. और इतना सहज अंदाज़ कि उनके घर में हर एक का स्वागत है, चाहे कोई बिल्डिंग में काम करने वाला मजदूर, उनके घर आकर एक गिलास पानी की डिमांड करे या कोई लंबी कार से आया आदमी उनके साथ सेल्फी खिंचवाने को आतुर दिखे. हर एक को वे अपने ड्राइंग रूम में पड़े सोफे पर प्यार से बिठाते हैं, भले वह वह अपने गंदे जूतों से बिछी कालीन को धूल-धूसरित करता रहे. चूंकि उनकी पत्नी बंगाली हैं और बंगाली घरों में प्रवेश करने के पूर्व जूते देहरी पर ही उतारने का चलन है, इसलिए मैं तो जब भी उनके घर जाता हूँ, जूते उतार कर ही घुसाता हूँ. यह एक बंग गृहणी की संस्कृति का सम्मान है.

जब भी मैं गया रवीश अपनी छोटी बिटिया से खेलते मिले. और उसकी तर्कबुद्धि से परास्त होते भी. उनकी सारी गम्भीरता और वाक-पटुता इस पांच या छह साल की बच्ची के आगे गायब हो जाती है. पर बच्ची है बड़ी खिलंदड़ी और कुशाग्र. उनके ड्राइंग रूम का बड़ा-सा एलईडी टीवी दिखावटी है. रवीश का कहना है कि वे कभी टीवी नहीं खोलते. बस पढ़ते हैं या अपनी बिटिया की शंकाओं का समाधान करते हैं. इसी ड्राइंग रूम में एक म्यूजिक सिस्टम है, जिसमें से मद्धम आवाज़ में सुर-लहरियां निकला करती हैं. वे बैठे बात कर रहे थे कि अचानक इंटरकाम पर बेल बजी. रवीश ने खुद जाकर फोन उठाया. नीचे आया बंदा रवीश को अपनी भतीजी की शादी में बुलाना चाहता था, और इसी वास्ते वह उन्हें न्योता देने आया था. रवीश ने उसे ऊपर बुला लिया. उसने कार्ड दिया और कहा भाई को बता देता हूँ, लेकिन फोन मिला नहीं तो रवीश के साथ सेल्फी लेकर उसे व्हाट्सएप पर भाई को भेज दी. रवीश से मिलकर वह अभिभूत था. रवीश ने उसको बचन दिया कि आएँगे. उसके जाने के बाद मैंने पूछा कि कौन था, तो रवीश ने बताया कि एसी की सफाई करता है. रवीश की यही सहजता मन को छूती है. इतना ख्यातनाम पत्रकार कि हारवर्ड यूनिवर्सिटी के छात्र जिसे सुनने के लिए बुलाते हैं, जिसे विश्व विश्व का प्रख्यात रेमन मैग्सेसे पुरस्कार मिला है. वह व्यक्ति एसी साफ़ करने वाले की भतीजी की शादी में जाने को तैयार है.


‘एक डरा हुआ पत्रकार एक डरा हुआ नागरिक पैदा करता है’ का स्लोगन देने वाले  रवीश उन सारे डरे हुए लोगों के साथ हैं, जो अपना डर बाहर निकालना चाहते हैं.  वे चाहते हैं कि लोग उन्हें अपना डर बताएं, वे उन्हें प्लेटफ़ॉर्म देंगे. मालूम हो कि उनका अपना ब्लॉग ही इतना लोकप्रिय है कि वह देश में सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला ब्लॉग है. और उनका प्राइम टाइम सबसे ज्यादा देखा जाने वाला शो.


एक पत्रकार का आकलन उसकी लेखन-शैली या प्रस्तुतीकरण के कौशल से नहीं होता. उसका आकलन उसके द्वारा उठाये गए सवालों और मुद्दों से होता है. पत्रकार का अपने समय के सरोकारों और उन पर तत्कालीन सरकार के रवैये की समीक्षा करना, ज्यादा बड़ा कर्म है. वह कैसा लिखता है, या किस तरह चीजों को पेश करता है, यह उसकी व्यावसायिक कुशलता है. लेकिन प्राथमिकता नहीं. रवीश कुमार में यही खूबी, उन्हें आज के तमाम पत्रकारों से अलग करती है. रवीश कुमार के प्रोफेशनलिज्म में सिर्फ कौशल ही नहीं एकेडेमिक्स का भी योगदान है. रवीश की नजर तीक्ष्ण है और उनका टारगेट रहा है कि आजादी के बाद शहरीकरण ने किस तरह कुछ लोगों को सदा-सदा के लिए पीछे छोड़ दिया है, उनकी व्यथा को दिखाना. रवीश कुमार की यह प्रतिबद्घता उन्हें कहीं न कहीं आज के चालू पत्रकारिता के मानकों से अलग करती है. जब पत्रकारिता के मायने सिर्फ चटख-मटक दुनिया को दिखाना और उसके लिए चिंता व्यक्त करना हो गया हो तब रवीश उस दुनिया के स्याह रंग की फिक्र करते हैं. आज स्थिति यह है, कि जब भी मैं किसी पत्रकारिता संस्थान में जाता हूँ, और वहाँ के छात्रों से पूछता हूँ, कि कोर्स पूरा क्या बनना चाहते हो, तो उनका जवाब होता है, टीवी एंकर या टीवी रिपोर्टर. कोई भी अखबार में नहीं जाना चाहता. क्योंकि टीवी में चकाचौंध है, जगमगाहट है और नाम है. लेकिन इसके विपरीत अखबार में निल बटा सन्नाटा! हर उभरते पत्रकार की मंजिल होती है, रवीश कुमार बन जाना. लेकिन कोई भी रवीश की तरह पढ़ना नहीं चाहता. रवीश की तरह अपने को रोज़मर्रा की घटनाओं से जोड़ना नहीं चाहता, रवीश की तरह वह विश्लेषण नहीं करना चाहता. मगर वह बनना रवीश चाहता है.


बिहार के मोतिहारी ज़िले के गांव जीतवारपुर के रवीश की शुरुआती शिक्षा पटना के लोयला स्कूल में हुई. फिर वहीं के बीएन कालेज से इंटर साइंस से किया. दिल्ली आए और देशबंधु कालेज से बीए किया. हिस्ट्री में एमए करने के लिए किरोड़ीमल कालेज में दाखिला लिया. एमफिल, को बीच में ही छोड़ कर भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) से पत्रकारिता की पढ़ाई की. कुछ दिनों तक उन्होंने जनसत्ता के लिए फ्री-लांसिंग की. तब मंगलेश डबराल जनसत्ता के रविवारीय संस्करण के संपादक थे. मंगलेश जी इसी ‘रविवारी जनसत्ता’ के लिए उन्हें स्टोरी असाइन करते, और वे उसे लिख लाते. इसके बाद जब वो एनडीटीवी में गए, तो जाते ही एंकरिंग करने को नहीं मिली. बल्कि उनका काम था सुबह के शो “गुड मॉर्निंग इंडिया” के लिए चिट्ठियाँ छांटना. इस काम के बदले उन्हें पहले सौ रुपए रोज़ मिलते थे, जो बाद में बढ़ा कर डेढ़ सौ कर दिये गए. इस शो के दर्शक देश भर से चिट्ठियाँ भेजते थे. वे चिट्ठियाँ बोरों में भर कर आतीं, जिन्हें रवीश छांटते. इसके बाद वहीं पर अनुवादक हुए. फिर रिसर्च में लगाया गया. इसके बाद रिपोर्टर और तब एंकर. आज वे एनडीटीवी में संपादक हैं. और उनका शो “प्राइम टाइम” अकेला ऐसा शो है, जिसे देखने और समझने के लिए लोगों ने हिन्दी सीखी.


जन-सरोकारों के उनके सवालों से कुढ़े कुछ लोग उनको मोदी विरोध या मोदी समर्थन के खाँचे में रख कर यह घोषणा कर देते हैं, कि वे मोदी विरोधी हैं, और इसीलिए उन्हें यह मैग्सेसे सम्मान मिला है. मुझे लगता है, कि ऐसे लोग धूर्त हैं. रवीश तब भी ऐसी ही रिपोर्टिंग करते थे, जब देश के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह थे. रवीश ने हर सरकार के कामकाज की समीक्षा की है. मेरा स्पष्ट मानना है, कि मोदी से न उनकी विरक्ति है न आसक्ति. जितना मैं उन्हें जानता हूँ, निजी बातचीत में कभी भी उन्होंने मोदी के प्रति घृणा या अनुराग का प्रदर्शन नहीं किया न कभी कांग्रेस का गुणगान किया. वे एक सच्चे और ईमानदार तथा जन सरोकारों से जुड़े पत्रकार हैं. कुछ उन्हें जबरिया एक जाति-विशेष के खाने में फ़िट कर देते हैं. उनका नाम रवीश कुमार पांडे बता कर उनके भाई पर लगे आरोपों का ताना मारने लगते हैं. पर जितना मुझे पता है, मैं अच्छिन तरह जनता हूँ, कि उनके भाई ब्रजेश पांडेय अपनी ईमानदारी और कर्मठता के बूते ही बिहार कांग्रेस के उपाध्यक्ष बने थे. 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में टिकटों के वितरण के वक़्त कुछ लोग उनसे फ़ेवर चाहते थे, लेकिन उन्होंने कोई सिफ़ारिश नहीं सुनी, पैसा नहीं लिया. इसलिए उनके विरुद्ध कांग्रेस और राजद वालों ने ही षड्यंत्र किया था. बाद में भाजपा के लोगों ने तिल का ताड़ बना दिया. ब्रजेश जी की बेटी की शादी रुक गई. उन्हें बिहार में कोई वकील नहीं मिला. सच तो यह है, कि रवीश गणेश शंकर विद्यार्थी की परंपरा के पत्रकार हैं.

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