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गेहूं पराया तो जौ देशज

अरुण कुमार पानीबाबा 

हम वर्तमान को ‘बेस्वाद’ मात्र इसलिए नहीं कह रहे कि आलू से अदरक तक तमाम खाद्य पदार्थ अपना चरचरापन गंवा चुके हैं. वर्तमान निहायत बोदा समय इसलिए है कि ‘बेस्वादी’ के विषय पर न कोई समझ बची है न ही कोई संवाद शुरू हो सका है. इस संदर्भ में विशेष चिंता का विषय यह है कि इस बात की संभावना भी दिखाई नहीं पड़ती कि लुप्त हो रहे ‘स्वाद’ और स्वाद तंतुओं की निरंतर विकसित हो रही निष्कि्रयता के संदर्भ में कोई विश्लेषण प्रक्रिया या वाद-संवाद आरंभ हो सकेगा.

कहना मुश्किल है कि खानपान के विषय में जो व्यवसायिक प्रशिक्षण बीते सत्तर-अस्सी वर्षों में प्रचलित हुआ उसमें कुछ सैद्धांतिक चर्चा का पक्ष होता है या नहीं. विश्व में सैकड़ों या हजारों किस्म की डबल रोटी यानी वह रोटी जो आटे में खमीर उठा कर तंदूरी भट्टी में पकाई जाती है, बनाने का रिवाज है. हर घर के, हर नानबाई के, हर सराय और होटल के अपने नुस्खे हैं. नुस्खों की किताबें हैं- जिनमें बताया गया है: खमीर कौन सा, कैसे और कितना लगाना है, फिर किस तपामान पर रोटी सेंकनी है. अब कुछ भी पकने और पकाने के संदर्भ में एक शाश्वत सिद्धांत बताया गया है:

हमने निज अनुभव से जाना है कि सिद्धांत जितना अचूक है, उतना ही अटपटा. और यह भी प्रयास से सीखा है कि इस मुहावरे में ‘मीठे’ का अर्थ मात्र गुड़-गन्ने के मिठास के अर्थ में नहीं है. जैसे आंवला चाहे जितना अर्सा पेड़ पर पका हो, वह अपनी तीखी कसैली चरचराहट को यथावत बनाये रखता है. बेल नाम फल भी लंबे अर्से में पक कर तैयार होता है पर जरूरी नहीं कि सब बेल मीठी ही हों.

हम वास्तव में यह शास्त्र प्रतिपादित करना चाह रहे हैं कि पाक कला कोई किताबी शास्त्र नहीं है- यदि पाक कला बचेगी और विकसित होगी तो उसका वही मार्ग है जो संगीत विद्या का है. जैसे संगीत की विद्या के लिए गुरु और श्रोता अनिवार्य है, वैसे ही पाक कला भी तभी बचेगी और चलेगी जब गुरु परंपरा और कद्रदां होंगे.

लेकिन पाक कला का मसला कुछ ज्यादा ही उलझ गया है. खाद्य पदार्थ को पकाने से पहले उगाना होता है. और कृषि विद्या के संदर्भ में साइंस का बड़ा दखल हो गया है. बीते दो ढाई सौ बरस में जिस ‘साइंस’ का विकास हुआ है उसकी नैतिकता और ज्ञान मीमांसा की पद्धति पर गंभीर चर्चा करीब अनुपस्थित है. और स्वाद तंतुओं का परिष्करण तो ऐसा अनोखा विषय हैं कि उसे आसानी से साइंस विद्या की परिधि में समेटा ही नहीं जा सकता. स्वाद की शास्त्रीय व्याख्या भी सहज संभव नहीं.


सन 1960 और 70 के दशकों में अकेले आचार्य श्याम चरण दूबे ऐसे समाजशास्त्री दिखाई पड़तें हैं जिन्होंने संकर गेहूं के उत्पादन के संदर्भ में स्वाद और स्वास्थ्य के संबंध की चर्चा की शुरुआत करने का प्रयास तो अवश्य किया था, लेकिन हमारा राजनीतिक नेतृत्व जवाहरलाल नेहरू से लेकर समाजवादी विचारक डॉ राममनोहर लोहिया और लोकनायक जयप्रकाश नारायण तक इस कदर साइंसनिष्ठ, प्रगतिवान और तरक्की पसंद था कि स्वाद और सेहत के संदर्भ में किसी भी तरह की दकियानूसी चर्चा चल ही नहीं सकती थी. तथाकथित नेहरू विरोधी दक्षिणपंथी राजनीतिक शक्तयों का मूल चरित्र वास्तव में कृत्रिम पंरपरावादी ही था, करीब उसी तरह का साइंसवादी और प्रगतिवादी विकासनिष्ठ जैसा कि नेहरूवादी, लोहियावादी, अन्य समाजवादियों का था और आज भी है. उनसे तो यह अपेक्षा ही नहीं की जा सकती कि वह ‘स्वाद’ जैसी दकियानूसी अवधारणा से परिचित भी होंगे.

‘स्वाद और सेहत’ की परस्परता का मसला अत्यंत सूक्ष्म आधार पर टिका है. बड़ा भरोसा तो देश की भाग्यरेखा पर ही करना होगा. आशा का एक स्रोत मंदिर प्रसाद और आश्रम भोजन की परंपराओं में भी दिखाई पड़ता है. लेकिन उस दिशा में भी सचेत प्रयास तो अनिवार्य जैसा ही है. आश्रम भोजन और ठाकुर प्रसाद के नेम-नियमों का कड़ाई से पालन करना होगा. ऐसी कड़ाई का एक प्रमुख उदाहरण जगन्नाथ जी का मंदिर है. वहां प्रसाद आज भी मिट्टी के बर्तनों में पकाया और परोसा जाता है. संभवत: जगन्नाथ मंदिर में आज भी पूर्णतया विषमुक्त अन्न-जल का ही उपयोग होता होगा. दक्षिण भारत में अनेक मंदिर और आश्रम ऐसे देखाई पड़ते है जहां प्रसाद परंपरा आज भी अक्षुण्ण है.


स्वाद, सेहत और संस्कृति में प्रकृतिवादी परस्परता है. भारत देश में अन्न-जल की व्यवस्था को विषमुक्त बनाना है तो भोजन के स्थान पर प्रसाद’ की व्यवस्था को फिर से स्थापित करना होगा. अत: हमारी समझ से प्रसाद परंपरा पर गंभीर विमर्श की शुरुआत करनी होगी. मात्र नुस्खेबाजी से न स्वाद बचेगा न सेहत बचेगी.


इस संदर्भ में हमारा सुझाव है कि गेहूं की तुलना में जौ भी प्राकृतिक कृषि विधि से उपजाया जा रहा है. आज से करीब 60 बरस पहले लेखक की दादी जौ का आटा घर की चक्की में स्वयं पीसती थीं अपने ठाकुर भोग के लिए, उसने कभी भी गेहूं से बने व्यंजन का प्रसाद अपने ठाकुर को अर्पित नहीं किया. उसकी स्मृति में गेहूं पराया अन्न था और जौ पूर्णत: देशज. जगन्नाथ मंदिर में यह सिद्धांत आज भी लागू है. जौ के सत्तू से बना मोदक गणेश जी को अत्यंत प्रिय हुआ करता था. पूर्ण विधि अगली बार.




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