जनादेश

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धुंध ,बरसात और देवदार से घिरा डाक बंगला

अंबरीश कुमार 

‘ब्लू हेवन’ मुक्तेश्वर के डाक बंगले के उस सूट का नाम है जिसमें मैं ठहरा हुआ हँू. बंगले के दूसरे सूट ‘पर्पल मूड’ में पत्रकार आशुतोष और ‘पिंक मेमोरीस’ में लेखक-पत्रकार सागर हैं. यह मुक्तेश्वर का अंग्रेजों के ज़माने का डाक बंगला है जिसमें कल अंधेरा  घिरने के बाद हम सब पहुंचे तो ठंड बढ़ चुकी थी और धुन्ध के चलते ज्यादा दूर तक कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था. दिन भर पहाड़ी रास्तों पर फूट पड़े झरनों की फोटो खींचते रहे. झरने भी ऐसे की देखते रह जाएं . पहाड़ के ऊपर जंगलों से लिपटती मानो कोई बरसाती नदी पूरे वेग से नीचे आ रही हो. हर मोड़ के बाद झरने का पानी नज़र आ रहा था. नैनीताल से मुक्तेश्वर की यह पहली यात्रा थी जिसमें जगह-जगह बहते झरनों का दीदार हुआ. इससे पहले शिलांग से चेरापूंजी  जाते समय जो झरने देखे थे उनकी याद ताजा हो गई. पूरा पहाड़ नहाया और भीगा हुआ. मौसम इस तेजी से बदल रहा था कि कभी धूप तो कभी धुन्ध. यह डाक बंगला जहाँ पर है वहाँ से बीस हजार फुट पर नन्दा गुंती से लेकर त्रिशूल, नन्दा देवी और नन्दा कोट जैसी चोटियां दिखाई पड़ती हैं. यह जगह समुद्र तट से साढ़े सात हजार फुट की ऊँचाई पर है यह भूल जाएँ तो डाक बंगले में एक शिला लेख याद दिला देता है.

यहां हवा की आवाज गूंजती है. पहले बांज यानी ओक के घने जंगलों को पारकर आइवीआरआई परिसर में पोस्ट ऑफिस के पास पहँुचे तो आगे देवदार के जंगल थे. दोबारा जब यहां  आया था तो आलोक,नमिता और निंटू साथ थे. देवदार के घने दरख्तों के बीच आइवीआरआई का अतिथिगृह नजर आ रहा था तो दाहिने तरफ ब्रिटिश काल के कुछ पुराने घर. चारो ओर सन्नाटा. यहाँ आकर डाक बंगले के पास सडक़ खत्म हो जाती है क्योंकि आगे जाने का कोई रास्ता नहीं है. साथ चल रहे निंटू को इस सब में कोई दिलचस्पी नहीं थी उसे खिलौने कि एक दूकान कि तलाश थी जहाँ से वह एक नया वेब्लेट ले सके. मौसम सा$फ था और पहले कुमाऊँ मंडल विकास निगम के रेस्तराँ में कुछ देर बैठे और आलोक, नमिता और मैंने लेमन टी से अपने को तरोताजा किया. आकाश और निंटू ने कुछ नहीं लिया. फिर सामने के डाक बंगले में गए जहाँ पहले भी कई बार रुकना हो चुका है. यह डाक बंगला 1872 में बना था और यहाँ पहँुचने के लिए कोई सडक़ भी नहीं थी. सडक़ तो कुछ दशक पहले ही बनी है. डाक बंगले का कुछ हद तक कायाकल्प हो चुका है. ब्लू हेवन वाले सूट पूरी तरह नीले रंग में रंगे थे यहाँ तक कि चादर कम्बल और तकिए भी नीले रंग के थे. बीच का बरामदा भी बदला हुआ था. चौकीदार गोपाल सिंह खानसामा की भी जिम्मेदारी निभाता है. खाने का आर्डर पहले ही देना पड़ता है क्योंकि शाम ढलते ही करीब एक किलोमीटर दूर पर बनी कुछ दूकानें जिन्हें बाजार कह सकते हैं वह बन्द हो जाता है. गोपाल सिंह ने यह भी बताया कि मुर्गा बनवाना हो तो और पहले बताना होगा. फार्म का मुर्गा दो सौ रुपए किलो मिलेगा और देशी पाँच सौ रुपए. बनवाने का सौ रुपए अलग से. बाकी सामान्य खाना अस्सी रुपए हर एक के हिसाब से. यहाँ रुकने के लिए नैनीताल के कलेक्टर ऑफिस से बुकिंग करानी पड़ती है. डाक बंगले के सामने बड़ा बगीचा है जहाँ रात में एक तरफ अल्मोड़ा तो दूसरी तरफ रानीखेत के पहाडिय़ों की रोशनी नजर आती है. बगीचे से लगे देवदार के दर$ख्त पहाड़ के नीचे दूर तक जाते दिखते है. शाम ढलते ही ठंड बढ़ जाती है और सन्नाटा छा जाता है. नैनीताल से जो सैलानी आते हैं वे लौट जाते है और सामने पर्यटन विभाग में ठहरे सैलानी अपने कमरों में कैद हो जाते हैं. डाक बंगले के भीतर की ढकी हुई बालकनी बैठने के लिए बेहतर जगह है जहाँ से बाहर का सारा दृश्य दिखता है और ठंडी हवा से भी बचे रहते हैं. शाम के कार्यक्रम के लिहाज से यह बहुत अच्छी जगह है. दाहिने से एक पगडंडी जंगलों के बीच जाती दिखती है जो आगे चल कर एक पहाड़ी घर पर रुक जाती है. यह घर भी अब चार कमरों के होटल में बदल चुका है. जिस पगडंडी से यहाँ तक आए वह और संकरी होकर जंगल के बीच से चढ़ती हुई पहाड़ पर चली जाती है. सर्दियों में यहाँ काफी बर्फ गिरती है इसलिए तब पूरे इन्तजाम के साथ आना बेहतर होता होता है, मैं एक बार फँस चुका हँू. पर सबसे बेहतर समय मानसून का होता है जब धुन्ध और बादलों के बीच यह डाक बंगला काफी रहस्यमय सा नजर आता है. मानसून के समय सत्बुंगा से मुक्तेश्वर तक सुर्ख सेब से लदे पेड़ों को देख कोई भी सम्मोहित हो सकता है. इसके अलावा जमकर बारिश होती है और आसमान साफ होते ही एक तरफ बर्फ से ढकी हिमालय की चोटियाँ सामने होती है तो दूसरी तरफ नहाए हुए बागान और जंगल. लगता है किसी चित्रकला के बीच खड़े हो. इससे पहले सत्बुंगा से गुजरे तो ड्राइवर ने पाइनियर अखबार के संपादक चंदन मित्र का सडक़ के किनारे बन रहा घर दिखाया जहाँ पाइनियर का बोर्ड भी लगा था. इस इलाके में बहुत से साहित्यकार और पत्रकार भी बस गए हैं. महादेवी वर्मा और रविन्द्रनाथ टैगोर के यहाँ रहने की वजह जो प्राकृतिक खूबसूरती थी वह अभी भी काफी हद तक बची हुई है. 

सुबह कमरे के सामने की खिडक़ी का पर्दा खोला तो धुन्ध से कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था. आशुतोष कमरे में आए तो खिडक़ी भी खोल दी. फिर बाहर से बादल भाप की तरह भीतर आने लगा. कमरे में बिजली की केतली में चाय का पानी खौल रहा था और भाप उड़ रही थी. बाहर और भीतर की भाप में कोई फर्क नहीं था. तभी लैपटॉप में मेल चेक करने बैठा तो इंदु का कमेंट मिला जो मानसून की पोस्ट पर था. अन्त में उन्होंने शाल की जगह साल लिखने की तरफ ध्यान खींचा. मैं गूगल से मंगल में एक उंगली से कम्पोज करता हँू जिससे कई बार गलती छूट जाती है इसे मा$फ कर देना चाहिए. मुक्तेश्वर के इस डाक बंगले के पीछे ही उत्तराखंड सरकार का पर्यटक आवास गृह है जिसमें रात में खाना खाने का मन था पर उनके यहाँ सैलानियों की भीड़ के चलते मैनेजर ने मना कर दिया. फिर डाक बंगले के चौकीदार से पूछा तो उसने कहा सामान लेने दूर जाना पड़ेगा और बरसात के साथ अंधेरा  भी गहरा हो गया था. मुक्तेश्वर में आईवीआरआई परिसर में कोई बाजार नहीं है सिर्फ देवदार और ओक आदि के घने जंगल में ब्रिटिश कालीन पुराने बंगले जरूर नज़र आते हैं. अन्त में ड्राइवर अरविन्द को साथ भेज कर रात के खाने का इन्तजाम किया गया. इससे पहले रामगढ़ के अपने राइटर्स कॉटेज से शाम पाँच बजे चले तो डर लग रहा था कि कही तेज बरसात से रास्ता न बन्द हो जाए. एक दिन पहले ही राइटर्स कॉटेज में देर रात बैठकी चली थी. कमरे के सामने का देवदार का दर$ख्त जब बरसाती हवाओं से लहराने लगा तो मित्र लोग ग्लास के साथ बाहर ही सेब के पेड़ के नीचे बैठ गए.

बरसात ज्यादा तेज नहीं थी. कुछ देर बैठे तो रहा नहीं गया और छाता मंगवा लिया. रात के दस बज चुके थे और खुले में मधुशाला का माहौल ज्यादा देर तक नहीं चल पाया. बूंदें  भारी होने लगी तो भीतर जाना पड़ा. इस बीच खाना बनाने का काम भी शुरू हो गया. आशुतोष अच्छे खानसामा भी हैं यह उनके बनाए अफगानी चिकन टिक्का से पता चला. भवाली से चलते समय देसी मुर्गे दिखे तो सुझाव आया कि यही से ले लिया जाए पर तय हुआ की रामगढ़ से लिया जाएगा. पर रामगढ़ से डाक बंगला रोड के मोड़ पर मुर्गे के दड़बे जब खली नज़र आए तो दूकान वाले से पूछा गया. जवाब मिला आज गाड़ी नहीं आई इसलिए कुछ नहीं मिल पाएगा. फिर भवाली से आ रहे एक सज्जन को कहा गया तो वे चिकन लेकर पहँुचे. जिसे मैरिनेट करने के बाद हम लोग कुछ लोगों से मिलने चले गए और साथ आए एक लेखक अपनी पुस्तक का एक अध्याय लिखने में व्यस्त हो गए. राइटर्स कॉटेज के शान्त माहौल में लिखने-पढऩे का अलग सुख है. जल्द ही लंदन से एक मोहतरमा यहाँ लिखने-पढऩे के लिए आने का कार्यक्रम बना रही हैं. अब सुझाव दिया गया है कि राइटर्स कॉटेज का उपरी हिस्सा कायाकल्प कर उन लेखकों को भी मुहैया कराया जाए जो दौड़-भाग की आपाधापी में दस बीस दिन एकांत में लिखना पढऩा चाहते हों. मकसद व्यावसायिक न होकर अपने व्यापक दायरे के लिखने-पढऩे वालों को प्रोत्साहन देना ज्यादा है. रखरखाव के लिए प्रतीकात्मक सहयोग जरूर लिया जाएगा. इसी वजह से दो तीन मित्र साथ आएँ और तकनीकी विशेषज्ञों से बात कर इसे नया रूप दिया जाए. यह काम बरसात के बाद ही हो पाएगा. बगीचा और पूरे परिसर की लैंडस्केपिंग भी नए ढंग से की जाएगी. साथ आए लोगों को आडू, प्लम, बादाम और खुमानी के पेड़ों पर कोई फल नहीं मिला. इनका सीजन पहले ही $खत्म हो जाता है. सेब की देर वाली प्रजाति के कुछ फल जरूर बचे थे.

रामगढ़ से लेकर मुक्तेश्वर तक के रास्ते में कहीं-कहीं सेब मिले तो बगीचे वालों ने उसकी पूरी कीमत भी वसूली. पेड़ से तोड़ कर सेब खाने की कीमत मात्र सौ रुपए किलो थी सो जाते मौसम के सेब का भी स्वाद लिया गया. एक जोड़ा जो दिन में सिड़ार लाज में खाना खाते मिला था वह भी पहँुच गया. साथ आए पत्रकारों ने उन मोहतरमा को भी काफी आग्रह के साथ सेब खिलाया. उन लोगों ने भी सेब के पेड़ के इधर-उधर खड़े होकर फोटो भी खिंचवाई. पर पिछले महीने जिस तरह सुर्ख सेब दिखे थे वह नज़र नहीं आए. सत्बूंगा की पहाड़ी पर एक शोध संस्थान बनने जा रहा है जिसकी लोकेशन भी देखनी थी. करीब पौन किलोमीटर की चढ़ाई के बाद यहाँ पहँुचे तो नजारा देखने वाला था. जो जगह चुनी गई है उसके दोनों तरफ घाटियाँ हैं. बाँज के पेड़ से घिरी इस पथरीली पहाड़ी के अन्तिम छोर पर झरना है तो सामने हिमालय की तीन सौ फुट लम्बी हिमालय की शृंखला. सामने अगर हिमालय दिखेगा तो पीछे की तरफ जंगल से घिरी घाटी का विहंगम दृश्य. रास्ते में घोड़े दिखे जो सम्भवत: सडक़ तक आने जाने के लिए इस्तेमाल किए जाते होंगे.

अगल बगल खेतों में पत्ता गोभी आकार ले चुकी थी और राजमा की लतर चार फुट तक चढ़ चुकी थी. कहीं-कहीं मक्का भी तैयार होता नज़र आ रहा था. कई साल के संकट के बाद पहाड़ पर मानसून कुछ ज्यादा ही मेहरबान है. हर पहाड़ भीगा हुआ, चट्टानों से रिसता पानी, पेड़ों की पत्तियों से टपकता पानी और दूसरे या तीसरे मोड़ पर झरनों की अलग अलग ढंग की गँूजती आवाज. यह आवाज घने जंगलों में संगीत में भी बदल जाती है. झरने भी अलग-अलग आकार और ऊँचाई के. किसी का एक छोर दिख जाता तो ज्यादातर जंगल से निकलते और सडक़ से होकर आगे चले जाते. झरनों की आवाजें रात में दूर तक गँूजतीं. पानी के जो स्रोत गर्मियों में सूख गए थे वे सभी रिचार्ज हो गए हैं. इससे लगता इस बार गर्मियों में पानी का वैसा संकट नहीं होगा जैसा पिछले कुछ सालों में हुआ था.


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