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अब खतरे से बाहर निकले गहलोत!

विनोद पाठक  

जयपुर. राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अब राजनैतिक खतरे से बाहर हो गए हैं .प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के सभी छह  विधायकों का कांग्रेस में विलय कराकर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत न एक बार फिर साबित कर दिया है कि वो ही प्रदेश की राजनीति के जादूगर हैं. प्रदेश अध्यक्ष और उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट से अंदरुनी राजनीति में उलझे गहलोत को इस विलय ने संजीवनी प्रदान की है. अब कुछ समय के लिए उन अफवाहों पर विराम लगेगा, जिनमें सत्ता परिवर्तन की बातें उड़ाई जा रही थीं.

दरअसल, राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष रहते अशोक गहलोत की कुर्सी पर खतरा मंडरा रहा था. शुरू से राहुल सचिन पायलट के पक्ष में बताए जा रहे थे. सूत्रों का कहना है कि विधानसभा चुनाव सचिन के चेहरे पर लड़ने के बावजूद सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के दबाव में अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली. तब कहा गया था कि गहलोत लोकसभा चुनाव में प्रदेश से पार्टी को 15-20 सीटें दिलाएंगे. जब नतीजे विपरीत रहे तो इन अफवाहों को हवा मिली की राजस्थान में नेतृत्व में बदलाव होगा. गहलोत के पक्ष में यह रहा कि कांग्रेस की लोकसभा चुनाव में करारी हार हुई और राहुल गांधी स्वयं अमेठी से हार गए. जब राहुल गांधी अध्यक्ष पद छोड़ने पर अड़े थे, तब गहलोत को कुछ समय मिल गया. सोनिया के दोबारा अध्यक्ष बनने से गहलोत को बड़ी राहत मिली और अब बसपा विधायकों के विलय से यह पक्का हो गया है कि अगले चार साल भी उनकी कुर्सी को चैलेंज करने वाला कोई नहीं है.

विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद जिस तरह से सचिन पायलट सक्रिय थे और उनके गुट के कई विधायकों को मंत्रिमंडल में अहम पद मिले, वो सक्रियता अब नजर नहीं आ रही है. पार्टी में लगातार एक पद, एक व्यक्ति की मांग उठ रही है. सचिन के पास इस समय संगठन और सत्ता, दोनों जगह महत्वपूर्ण पद हैं. इसी गहलोत की जादूगरी ही कहा जाएगा कि सचिन पायलट का नाम राष्ट्रीय अध्यक्ष की दौड़ में शामिल रहा. बसपा विधायकों के विलय के घटनाक्रम से सचिन पायलट पूरी तरह अलग रहे. अब आगे भी उनके द्वारा गहलोत की सत्ता को चुनौती दी जाएगी, इसके आसार नजर नहीं आ रहे हैं.

बसपा सुप्रीमो मायावती इस विलय से आगबबूला हैं, लेकिन वो लाचार भी हैं. भारतीय जनता पार्टी के विरोध में वो कांग्रेस को बिना शर्त समर्थन देती हैं. 2009 में भी कांग्रेस की 96 सीटें थी और छह बसपा विधायकों की समर्थन से गहलोत मुख्यमंत्री थे. उस वक्त भी कुछ ऐसा ही हुआ था, जैसा अब हुआ है. मायावती ने इतिहास से सबक नहीं लिया. राजस्थान में बसपा का वोटबैंक 4 प्रतिशत है. ब्रज क्षेत्र और शेखावटी में पार्टी को सीटें मिलती हैं. यदि पार्टी सही तरीके से प्रदेश में चुनाव लड़े तो बड़ा फैक्टर साबित हो सकती है, लेकिन ग्राउंड लेवल पर मायावती ने वैसे मेहनत नहीं की है, जैसे उत्तर प्रदेश में नजर आती है.

बसपा विधायकों के विलय के बाद गहलोत मंत्रिमंडल के विस्तार की चर्चाएं तेज हो गई हैं. सभी बसपा विधायकों को झोली भरी जाएगी. तीन विधायकों उदयपुरवाटी से राजेंद्र गुढ़ा, नदबई से जोगिंदर अवाना और तिजारा से संदीप यादव को मंत्री पद मिल सकता है. शेष तीनों विधायकों करौली से लाखन सिंह, किशनगढ़ बास से दीपचंद खेरिया और नगर से वाजिब अली को आयोग का अध्यक्ष बनाया जा सकता है.अब विधानसभा में कांग्रेस की अपनी संख्या 100 से बढ़कर 106 हो गई है. निर्दलीय और अन्य दलों को मिलकर गहलोत को 121 विधायकों का समर्थन हासिल है. अब अशोक गहलोत की कुर्सीव् को कोई खतरा नहीं है.

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