जनादेश

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गोवा विश्वविद्यालय में कहानी पाठ

पणजी .गोवा विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग ने बुधवार को  कहानी पाठ का आयोजन किया गया. नवें दशक के महत्वपूर्ण कहानीकार स्वयं प्रकाश ने सन् 2000 में ‘कथन’ पत्रिका में प्रकाशित ‘गौरी का गुस्सा’ कहानी का पाठ किया. यह एक मिथकीय कहानी है. इस कहानी में शिव और पार्वती (जिन्हें गौरी/गौरा भी कहा जाता है) के माध्यम से वर्तमान समाज में बढ़ रही भोगवादी प्रवृत्तियों की सच्चाई बयान की गई है. एक दिन शिव और पार्वती आकाश मार्ग से पृथ्वी का विचरण कर रहे थे. गौरी को पृथ्वी पर एक हताश निराश आदमी दिखाई पड़ता है. यह आदमी है रतन लाल ‘अशांत’. यह हताशा उसके भीतर कई तरह से घर किए है. अशांत की इस हालत को सही करने के लिए गौरी शिव से निवेदन करती हैं. शिव मुस्कराकर गौरी की बात का मान रखने के लिए ‘तथास्तु’ कह देते हैं. इस वरदान से अशांत का जीवन सुख सुविधाओं से पूर्ण हो गया. लेकिन मन की अशांति अभी भी कम नहीं हुई. वह लगातार भोग-विलास में डूबा रहने के बावजूद और सुख की कामना में निरंतर ‘गौरी’ को याद करता है. दिन-प्रति-दिन उसकी बढ़ती जा रही इच्छाओं से ऊबकर गौरी शिव से कहकर उसकों पहले की स्थिति में पहुंचा देती हैं. कहानी में इन स्थितियों को बेहतर ढंग से अभिव्यक्त किया गया है. कहानीकार ने मध्य वर्ग की इन भोगवादी प्रवृत्तियों के साथ-साथ सत्ता के अलग-अलग चरित्र प्रस्तुत किये हैं. 

कहानी पाठ में इसे पाठकों ने भी महसूस किया. कहानी पाठ के माध्यम से मध्य वर्ग की उन महत्वाकांक्षाओं की पूरी छवि सामने उपस्थिति हो गई. कहानी पाठ में रतन लाल अशांत के जीवन की विभिन्न मनःस्थितियों को कहानीकार ने पूरी नाटकीयता के साथ प्रस्तुत किया. कहानी में गौरी और रतनलाल के बीच जो संवाद हैं,खासतौर उसकी कामनाओं को लेकर वे आज के मध्य वर्ग की असलियत बयान करते हैं. कहानीकार ने बातचीत में कहा कि यह कहानी आज के समय से बहुत गहरे स्तर पर जुड़ी हुई है. आज जिस तरह से मध्य वर्ग की भोगवादी प्रवृत्तियां बढ़ रही हैं वह हमारे समाज के लिए बहुत हानिकारक है. कहानी पाठ के बाद विद्यार्थियों ने कहानीकार से कहानी की रचना प्रक्रिया, गौरी शिव का मिथक और दूसरी कहानियों के कथानक के बारे में बातचीत की. कहानीकार ने पिछले कुछ दशकों से भारतीय समाज में आए परिवर्तनों और साहित्य में उसके पड़ रहे प्रभाव के बारे में बताया. उन्होंने कहा कि नब्बे के दशक में तीन बड़ी घटनाएं-सोवियत रूस का पतन, संचार क्रान्ति, वैश्वीकरण का उभार-हुआ हैं. इनके कारण समाज, राजनीति और यहां तक कि साहित्य भी प्रभावित हुआ है. 

बाजार इतना प्रभावी हो गया है कि शिक्षा, आपसी सम्बन्ध तथा दाम्पत्य जीवन में भी उसकी झलक दिखाई देती है. बाजार ने नागरिक को उपभोक्ता बना दिया है जिसमें नैतिक और मानवीय मूल्यों के स्थान पर सुख-सुविधाओं का महत्व अधिक हो गया है. एक सवाल के जवाब में कहानीकार ने कहा कि साहित्य समाज को सीधेतौर से बदलता भले ही न हो लेकिन बदलाव के लिए प्रेरित अवश्य करता है. कार्यक्रम में कहानीकार का स्वागत हिन्दी विभाग की अध्यक्ष प्रो. वृषाली मान्द्रेकर ने किया. वहीं कहानीकार का परिचय एम.ए. द्वितीय वर्ष की छात्रा कृतिका नाईक और धन्यवाद ज्ञापन एम.ए. प्रथम वर्ष की छात्रा सोनिया वेलिप ने किया. कार्यक्रम में गोवा विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के विद्यार्थी, झेवियर महाविद्यालय म्हापसा गोवा के प्राध्यापक सलीम गडेद, पीएच.डी. शोध छात्र उपस्थित रहे. कार्यक्रम का संयोजन हिन्दी विभाग गोवा विश्वविद्यालय द्वारा किया गया. कहानी पाठ के कार्यक्रम में विशिष्ट उपस्थिति स्वयं प्रकाश जी की पत्नी रश्मि जी की रही. कार्यक्रम में कहानीकार स्वयं प्रकाश के हाथों से पौधरोपण भी कराया गया.

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