जनादेश

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सरकार की छवि बनाते अख़बार !

संजय कुमार सिंह 

अखबारों में खबर थी, पाकिस्तान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एयरस्पेस देने से मना किया. व्यावसायिक उड़ानों के लिए पाकिस्तानी एयरस्पेस खुला है पर विशेष विमान के लिए अनुमति लेनी होती है. इसीलिए राष्ट्रपति के तीन देशों के दौरे पर जाने के लिए भी अनुमति मांगी गई थी और पाकिस्तान ने मना कर दिया था. इसके बाद लगभग वैसे ही हालात में प्रधानमंत्री के लिए फिर पाकिस्तान से अनुमति मांग कर उसे मना करने का मौका देने का कोई मतलब नहीं था. पर उसने मना कर दिया. लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि ऐसा क्यों किया गया होगा. एक मान्यता है कि मीडिया के जो हालात है उसमें इसका कारण यह हो सकता है अनुमति मिल जाती तो उसे अपने ढंग से पेश कर शाबासी बटोरी जाती नहीं मिली तो खबर नहीं के बराबर छपनी है. 

अंग्रेजी के जो अखबार मैं देखता हूं उनमें दिल्ली के तीन – इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया और हिन्दुस्तान टाइम्स के अलावा कोलकाता का द टेलीग्राफ है. इन सभी अखबारों में पाकिस्तान द्वारा अनुमति नहीं दिए जाने की खबर पहले पन्ने पर छोटी सी है और अंदर के पन्ने पर विस्तार होने की सूचना है. इंडियन एक्सप्रेस में तो सूचना भर है. हिन्दी अखबारों में दैनिक हिन्दुस्तान में यह खबर पहले पन्ने पर दो कॉलम में है. अखबार ने इसपर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता का बयान भी छापा है, दो सप्ताह में दूसरी बार वीवीआईपी विमान को उड़ान की अनुमति देने से इनकार के फैसले पर हमें अफसोस है. ... पाकिस्तान को स्थापित अंतरराष्ट्रीय परिपाटी से हटने के फैसले पर विचार करना चाहिए. नवभारत टाइम्स में पहले पन्ने पर यह खबर नहीं है. 

अमर उजाला ने इस खबर को तीन कॉलम में पर प्रधानमंत्री की फोटो के साथ छोटी सी छापा है. विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया इसमें भी है. दैनिक जागरण ने इस खबर को तीन कॉलम में पर्याप्त विस्तार से छापा है. जागरण ब्यूरो की इस खबर में कहा गया है, भारत अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (आइसीएओ) में पाकिस्तान के खिलाफ शिकायत कर सकता है. आइसीएओ समझौते के मुताबिक सिर्फ युद्ध काल में किसी दूसरे देश के विमान को अपने हवाई क्षेत्र के इस्तेमाल से रोका जा सकता है. जो देश इस नियम का पालन नहीं करते, उनके खिलाफ जुर्माना लगाने का भी प्रावधान है. अखबार ने आगे लिखा है, .... कुछ भारतीय विमानों को पाक के हवाई क्षेत्र के इस्तेमाल की अनुमति दी गई थी. इस पर विपक्ष ने इमरान सरकार पर निशाना साधा था. .....  मोदी ने गत माह फ्रांस जाने के लिए पाक के वायुक्षेत्र का ही प्रयोग किया था.

दैनिक भास्कर में यह खबर पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम में है. पाक बोला - मोदी को एयर स्पेस से नहीं गुजरने देंगे, भारत का अनुराध ठुकराया. इसमें कहा गया है, कश्मीर पर फजीहत झेल रहा पाकिस्तान अब पीएम नरेंद्र मोदी की यात्रा को लेकर बौखला गया है. नवोदय टाइम्स में भी यह खबर पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम में है. इससे पहले 17 जुलाई को लगभग सभी अखबारों में पाकिस्तानी एयरस्पेस खोले जाने की खबर प्रमुखता से थी. ज्यादातर अखबारों ने इसे लीड बनाया था. अंग्रेजी अखबारों में, सिर्फ टेलीग्राफ ने पहले पन्ने पर छोटी सी खबर छाप कर अंदर विवरण होने की सूचना दी थी. इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया और हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर लीड थी. दोनों टाइम्स में यह खबर चार कॉलम में और इंडियन एक्सप्रेस में यह पांच कॉलम में लीड थी. अंग्रेजी अखबारों के शीर्षक सूचनाप्रद और भारत को राहत मिलने जैसी बात करते थे पर हिन्दी अखबारों में, आखिर जमीन पर आया पाकिस्तान, खोला एयर स्पेस (नवभारत टाइम्स) और पाकिस्तान को खोलना पड़ा अपना एयरस्पेस (दैनिक जागरण) जैसे शीर्षक थे. दैनिक भास्कर ने इस खबर को सिंगल कॉलम में छापा था. शीर्षक था, एयरस्ट्राइक के 140 दिन बाद पाक ने भारत के लिए हवाई क्षेत्र खोला. मुझे लगता है कि यह शीर्षक, खबर और उसका प्लेसमेंट तालमेल में था. 

बालाकोट हमले के बाद एयरस्पेस बंद करना पाकिस्तान की ओर से उठाया गया सामान्य पर जरूरी कदम था. करीब पांच महीने बाद जब चुनावी शोर थम गया, सरकार ने काम संभाल लिया और घुसकर मारने जैसी कोई चर्चा नहीं थी तो व्यावहारिक कदम उठाते हुए पाकिस्तान ने वही किया जो समान्य तौर पर किया जाना चाहिए. पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय और आर्थिक दबाव होंगे फिर भी उसने अपनी सुरक्षा में या जवाबी कार्रवाई के रूप में जो किया वह सामान्य था. इसी तरह पाबंदी हटाना भी. पर तब के शीर्षक देखिए. इसके बाद भारत सरकार ने कश्मीर में जो किया और नेताओं के जो बयान आए उसके मद्देनजर स्थिति फिर बदली और राष्ट्रपति के दौरे के लिए अनुमति मांगना भले सामान्य था पर उसे खारिज होना भी वैसा ही था. इसीलिए तब उस पर टीका टिप्पणी नहीं हुई लेकिन इस बार तो अनुमति मांगने की कोई तुक नहीं है. लेकिन मांगी गई और पाकिस्तान ने एक ही बार में आने-जाने दोनों के लिए अनुमति देने से इनकार कर दिया. अब अखबारों के तेवर वैसे नहीं हैं.

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