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पचास दिन बाद किस हाल में कश्मीर !

राजेंद्र तिवारी

नई दिल्ली .अनुच्छेद 370 हटने के 50 दिन पूरे हो चुके हैं. अलगाववादी नेता रिहा हो चुके हैं लेकिन मुख्यधारा के सभी राजनीतिक हिरासत में हैं. कश्मीर के वरिष्ठतम राजनीतिक और संयुक्त जम्मू-कश्मीर के चार बार मुख्यमंत्री रह चुके व कश्मीर से मौजूदा सांसद फारुक अब्दुल्ला पर पब्लिक सेफ्टी एक्ट (पीएसए) लगाकर उनको हिरासत में रखा गया है. पूर्व मुख्यमंत्रियों महबूबा मुफ्ती व उमर अब्दुल्ला और सज्जाद लोन व पूर्व आईएएस शाह फैजल समेत मुख्यधारा के लगभग 300 छोटे-बड़े नेता अब तक हिरासत में हैं. इन सबको न तो किसी से बात करने का अधिकार दिया गया है और न ही ये लोग बाहरी दुनिया से संचार माध्यमों से संपर्क कर सकते हैं. इसके अलावा, बड़ी संख्या में वकील, सामाजिक कार्यकर्ता व बुद्धिजीवी भी अब तक हिरासत में हैं और इनमें से कई पर पीएसए लगाया गया है. कश्मीर का दौरा कर लौटी महिला संगठनों की पांच सदस्यीय टीम के मुताबिक कश्मीर में अब तक सुरक्षा बलों द्वारा 18 से 22 साल के 13000 किशोर-युवाओं को हिरासत में लिया जा चुका है. कश्मीर प्रशासन का दावा है कि यह एक रुटीन प्रक्रिया है और जिनको हिरासत में लिया जाता है, उन्हें पूछताछ के बाद कुछ न मिलने पर छोड़ दिया जाता है. सरकार का दावा है कि कश्मीर में सबकुछ सामान्य है. उधर, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बीते बुधवार से कश्मीर के दौरे पर हैं.

आश्चर्य की बात यह है कि सभी प्रमुख अलगाववादी नेताओं को रिहा किया जा चुका है. प्रशासन ने अलगाववादी सैयद अली शाह गिलानी, मीरवाइज उमर फारुक, अब्दुल गनी बट और अशरफ सहराई समेत इन सभी नेताओं ने बांड लिखकर दिया है कि ये किसी राजनीतिक व अलगाववादी क्रियाकलाप न शामिल होंगे और न ही अपनी तरफ से कोई पहल करेंगे. इनके मीडिया से भी बात करने पर भी पाबंदी है. अलबत्ता, शब्बीर शाह, यासीन मलिक व आसिया अंदराबी अब तक हिरासत में ही हैं. 

कश्मीर का जनजीवन प्रशासनिक प्रतिबंध उठाये जाने के बाद भी अब तक सामान्य नहीं हुआ है. स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति नगण्य है. छोटे-छोटे कस्बों तक में लोग अपनी तरफ से अघोषित बंद लागू किये हुए हैं. सार्वजनिक यातायात पूरी तरह प्रभावित है सिवाय सरकारी संचालनों के. व्यवसायिक प्रतिष्ठान बंद हैं, मुख्य बाजारों में दुकानमालिकों ने अपनी ओर से बंदी लागू कर रखी है. उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा और हंदवाड़ा को छोड़कर बाकी जगह मोबाइल कम्युनिकेशन अब तक बहाल नहीं किया गया है. इंटरनेट पूरे कश्मीर में बंद ही चल रहा है. प्रशासन का कहना है कि पूरी घाटी में कही भी कोई प्रतिबंध नहीं है और बीएसएनएल की ब्रॉडबैंड व लीज लाइन सेवा जल्द ही बहाल कर दी जाएगी. अभी स्थिति पर कड़ी नजर रखी जा रही है और प्रशासन को आशंका है कि अलगाववादी व आतंकी तत्व घाटी में उपद्रव व हिंसक गतिविधियों के लिए इसका इस्तेमाल कर सकते हैं.


मुख्य धारा के राजनीतिक दलों के दूसरी सतर के नेताओं से संपर्क कर उन्हें अपने पक्ष में करने की कोशिशें प्रशासन की ओर से किये जाने की खबरें भी हैं. सरकार का मानना है कि इन पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व की गौरमौजूदगी में दूसरी सतर के नेतृत्व को तोड़ना अपेक्षाकृत कम मुश्किल होगा. सरकार का स्पष्ट संदेश है कि अनुच्छेद 370 को हटाने के मसले पर कोई रियायत नहीं की जाएगी और मौजूदा स्थिति में इन नेताओं (दूसरी सतर) को अपना रुख खुद तय करना है कि वे अपने शीर्ष नेतृत्व जैसा हश्र चाहते हैं या फिर सामान्य राजनीतिक जीवन. जो जानकारी मिल रही है, उसके मुताबिक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल इसी मिशन पर हैं. फोटो साभार पीआरआई  

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पीडीपी जैसे प्रयोग की कोशिश ? 

नब्बे के दशक के आखिर में अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने वैकल्पिक राजनीति खड़ी करने के लिए मुफ्ती मोहम्मद सईद व महबूबा मुफ्ती के जरिये एक नयी पार्टी पीपुल्स डेमोक्रैटिक पार्टी (पीडीपी) खड़ी करने की कोशिश की थी. इसका मुख्य उद्देश्य फारुख अब्दुल्ला की नेशनल कांफ्रेंस की कश्मीर पर कथित बपौती तोड़ना था. इसमें उस समय सफलता भी मिली थी और 2002 में पहली बार जम्मू-कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस को विपक्ष में बैठना पड़ा. हालांकि यह प्रयोग भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन नेतृत्व ने आरएसएस व उसके सभी आनुषंगिक संगठनों को विश्वास में लेकर नहीं किया था लिहाजा, उस समय भाजपा के नेता ही मुफ्ती व उनकी पार्टी को पाकपरस्त, आतंकीपरस्त व देशद्रोही करार देने लगे थे. इन नेताओं में मौजूदा प्रधानमंत्री और उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी सबसे आगे थे. बाद में नरेंद्र मोदी ने पीडीपी व भाजपा की संयुक्त सरकार भी जम्मू-कश्मीर में बनवाई. उस समय लग रहा था कि इससे जम्मू-कश्मीर में आपसी सहमति व समझ की राजनीति की शुरुआत होगी. लेकिन शायद भाजपा नेतृत्व इस प्रयोग के जरिये पीडीपी को भोथरा करने की रणनीति पर काम कर रहा था. जब यह प्रयोग अपने उद्देश्य में सफल साबित होता नहीं दिखा तो भाजपा ने रणनीति बदल दी.

अब केंद्र की भाजपानीत सरकार कश्मीर के मुख्यधारा के सभी राजनीतिक दलों के दूसरी व तीसरी सतर के नेताओं को नये नेतृत्व के तौर पर खड़ा करने का प्रयोग करने में लगी है. और इसी रणनीति के तहत मुख्यधारा के सभी बड़े नेताओं को हिरासत में लेकर उनको जनता व मीडिया से दूर रखा जा रहा है और इस तरह वैकुअम पैदा कर इनकी पार्टियों के छोटे नेताओं को खड़ा किया जा रहा है. द प्रिंट में आई एक रिपोर्ट पर भरोसा करें तो केंद्र को अपने इस प्रयोग में सफलता भी मिलती दिखाई दे रही है. इस रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तरी कश्मीर से कई बार एमएलए रहे इंजीनियर राशिद ने एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी से संपर्क किया और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से डील करवाने की मिन्नतें कीं. रिपोर्ट में कहा गया है कि इंजीनियर राशिद डील के लिए अनुच्छेद 370 को हटाने का समर्थन और अपने ऊपर लगे आरोपों को वापस कर लिये जाने की एवज में कश्मीर में भाजपा को सात-आठ विधानसभा सीट दिलवाने का वादा भी कर रहे हैं. इंजीनियर राशिद इस समय तिहाड़ में बंद हैं. 2017 में टेरर फंडिंग के आरोप में उन्हें एनआईए ने गिरफ्तार किया था. माना जाता है कि मेनस्ट्रीम पालिटिक्स में पाकिस्तान के टट्टू रहे हैं. हालांकि उनके संबंध दिल्ली से भी अच्छे ही रहे हैं. वे राजनीतिक रूप से शाह फैसल के साथ भी दिखाई देते रहे हैं.

केंद्र की नजर, कश्मीरी राजनीतिक दलों में जम्मू के प्रभावशाली नेताओं पर भी है. इनमें से कई ऐसे हैं जिनको सिद्धांत आदि से कोई लेना-देना नहीं है, उनको बस सत्ता का लालच है. हालांकि यह बात कश्मीर के नेताओं पर भी लागू होती है. केंद्र की कोशिश है कि नये जम्मू-कश्मीर (लद्दाख रहित) में विधानसभा चुनाव जुलाई 2020 तक करा लिये जाएं और इस चुनाव से पहले विधानसभा क्षेत्रों का नये सिरे परिसीमन हो जाए व कश्मीर में नेशनल कांफ्रेस, पीडीपी, पीपुल्स कांफ्रेंस आदि मेनस्ट्रीम दलों के दूसरी-तीसरी सतर के नेता या तो नये कमिटमेंट के साथ अपने दल के नेतृत्व की कमान संभाल लें या फिर कोई नया राजनीतिक मंच खड़ा कर दें.

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