जनादेश

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आसमान तक जाते पहाड़ पर !

श्रवण 

लेह लद्दाख की यात्रा करने वालों के मन में सबसे बड़ा सवाल रहता है कि किस रुट से जाए .दिल्ली जम्मू श्रीनगर लेह के रास्ते जाए या दिल्ली मनाली लेह के रास्ते जाए ? मैनें राउंड ट्रिप किया था . दिल्ली जम्मू श्रीनगर लेह के रुट से गया और लौटा मनाली होते हुए . दोनों रास्तों की अलग खासियत और नफा नुकसान है .मुझे दिल्ली-जम्मू-श्रीनगर -लेह वाला रास्ता पसंद आया . जम्मू तक तो ट्रैफिक था , लेकिन उसके आगे ट्रैफिक का रश नहीं था . इसलिए बाइक चलाने मेें ज्यादा मजा आया . श्रीनगर से लेह के रास्ते में नदी के साथ साथ चलती चौड़ी सड़कें थी . ट्रैफिक न होने के बराबर . कभी कभी सेना का कॉनवॉय जाता था . सड़के घुमावदार थी लेकिन तीखे मोड़ वाली नहीं . विजन ब्लॉक नहीं होता था . श्रीनगर से आगे हरियाली कम होती जाती है , लेकिन इतने तरह  के पहाड़ दिखते हैं कि हरियाली की कमी खलेगी नहीं .

मैं तो कहूंगा  कि हरियाली तो दूसरे हिस्सों मसलन कोंकण या हिमाचल में भी मिल जाएगी , मगर आसमान में सुराख करते नंगे बुच्चे पहाड़ इधर ही मिलेंगे .पर्पल पहाड़, मिट्टी के ढूह जैसे पहाड़ , गिट्टी के ढेर जैसे पहाड़ , रेगमाल से घिसे हुए से चिकने पहाड़ ,भाँति भाँति के पहाड़ .यहां बाइक भगा भी सकते हैं , लोकिन मैं बहुत आराम से रुकते और देखते गया .रास्ते में जोजिला दर्रा का पैच ही खराब था , बाकि कहीं कोई दिक्कत नहीं थी .

लौटते में मनाली के रास्ते आया . इस रास्ते में दर्रे ज्यादा थे . खराब सड़के भी ज्यादा थी . मोड़ और चढाई भी तीखे थे . सड़क संकरी थी . मनाली तक आते आते तो ट्रक की आवाजाही बहुत हो जाती थी और वे चलाते भी खतरनाक ढँग से थे . लेकिन सिनिक ब्यूटी भी ज्यादा थी . चोटियों पर पिघलती हुई बर्फ , ग्लेशियर के बीच से गुजरती सड़क , झीलें , नीचे उतरते हुए बढ़ती हुई हरियाली मन मोह लेती है .मैं तो कहता हूँ जब भी जाइए थोड़ा समय लेकर जाइए और राउंड सर्किट पूरा कीजिए .


हुन्डेर पहुंचते हुए शाम हो गई थी .थकान उतारने के बजाय तुरंत सैंड ड्यून वाली जगह दोहरे कूबड़ वाले ऊंट की सवारी के लिए पहुंचा .दूर दूर तक फैली रेत , चारों तरफ पहाड़ , उसपर ढलते हुए सूरज की धूप ,साफ नीले आकाश में तिरते बादल देखकर मैं अभिभूत और निशब्द हो गया .वहां बगल में कुछ युवा थे जो दृश्य देखकर चीखे -अरे बैंचो !! मैंने घूर कर उन्हें देखा -अजब है .इनके पास खूबसूरती के लिए भी सिर्फ गाली है .इन्हें भाषा आती ही नहीं जो इस खूबसूरत दृश्य को बयान करने के लिए चाहिए .लेकिन लौटते हुए खतरनाक चढ़ाई , नाले , नुकीले पत्थरों से भरे रास्ते , शूटिंग स्टोन (छिटकते पत्थर )वाले इलाके से गुजरते हुए जब हिम्मत थोड़ी टूट जाती थी , गला सुख जाता था ,गाड़ी रोककर खतरे को तौल रहा होता तो मेरे मुंह से भी गाली ही निकलती थी -इसकी मां की ..फिर एक्सिलेटर देकर गाड़ी चढ़ा देता था .खूबसूरती के लिए मेरे पास अच्छी भाषा है ,लेकिन अपने डर ,गुस्से आदि को व्यक्त करने के लिए भी मेरे पास सिर्फ गाली ही है .

खैर .


रॉयल एनफील्ड हिमालयन का नामकरण ही हिमालय पर हुआ है और इसे टफ टेरेन खासतौर से पहाड़ों के लिए बनाया गया है .इसकी टैग लाइन -बाइक फॉर एनी रोड, बाइक फॉर नो रोड !यह दावा थोड़ा अतिरंजित है लेकिन बाकी बाइकों के मुकाबले हर तरह की सड़कों के लिए सबसे बेहतर है .मुझे इसमें बैटरी की शिकायत रहती थी जिसके लिए सर्विस सेंटर वालों से काफी झड़प हुई .शिकायत भी की ऊपर तक .दूसरा डर था कि इस बाइक में ट्यूब लेस टायर नहीं है .ऑफ़रोडिंग के लिए बाइक के टायर ट्यूबलेस ही होने चाहिए .

मगर खुशी की बात है कि लगभग तीन हजार किलोमीटर की दिल्ली श्रीनगर लेह मनाली दिल्ली यात्रा में मामूली दिक्कतों को छोड़कर कोई दिक्कत नहीं हुई .लगभग साढ़े सत्रह हजार फीट की ऊंचाई और बर्फ वाली सड़क पर भी चली .झरनों, पथरीले सड़कों , सड़क विहीन रास्तों पर बाइक चलाने के बाद भी गाड़ी कहीं पंक्चर नहीं हुई .न कहीं बंद पड़ी .तीन चार बार गाड़ी पलटी भी .इंडिकेटर गया ,लेग गार्ड मुड़ गया ,मगर बाइक ने यात्रा पूरी की .मैं भी यह लिखने के लिए सलामत रहा .


दूसरी बार बाइक पलटी हुन्डेर से तुरतुक -भारत पाक सीमा का गांव  जाने के रास्ते पर . हुन्डेर से बस निकला ही था . चूँकि वह इलाका घाटी में था तो चारो ओर पहाड़ और बीच में सीधी सड़क . पहाड़ों पर ऐसी सीधी सड़क कम ही मिलती है तो थोड़ा स्पीड ज्यादा थी . धूप खिली हुई थी . मौसम खुशगवार था . मेरे दिमाग में कुछ तो चल रहा था ‍.थोड़ा तनाव में था . कुछ बुरी स्मृतियाँ बार बार बर्रे की तरह मँडरा रही थी . मैं जिसे हटाकर राइड एन्जॉय पर फोकस करता था , लेकिन फिर भी कुछ हॉन्ट कर रहा था .ऐसे में साफ सूथरी सड़र पर आ गयी बजरी  का ढेर मैं जैसे नींद से जागा . जब तक सँभलता , धड़ाम से गिर चुका था . बाइक के नीचे निकला . लेग गार्ड शहीद हो गया पर मेरे पैर को बचा लिया . चूँकि सेफ्टी गियर पहने हुए था तो ज्यादा चोट नहीं आई . पर बायाँ टखना बुरी तरह दुख रहा था .

सड़क सुनसान ! दूर दूर तक कोई नजर नहीं आ रहा था . फिर वहीं बजरी किनारे बैठ गया और किसी राइडर ग्रुप के आने का इंतजार करने लगा . कुछ पता नहीं था कि कब आएँगे . क्योंकि ज्यादातर लोग हुन्डेर से प्योंगयोंग लेक चले जाते हैं . तुरतुक तक जाने वाले काफी कम होते हैं अपेक्षतया .

लेकिन ज्यादा देर इंतजार नहीं करना पड़ा . एक जीप पर स्थानीय युवा था और उसके साथ दो लड़कियाँ थी . तो उसके रुकने पर मुझे ज्यादा हैरानी हुई !महिला मित्रों के साथ पिकनिक पर जा रहा आदमी किसी राहगीर की मदद के लिए रुके , इसकी संभावना कम ही होती है . पर उन्होंने न केवल मेरी गाड़ी उठाने में मदद की बल्कि गाड़ी स्टार्ट होने तक रुके रहे . बाइक स्टार्ट नहीं हो रही थी . चोक वगैरह देकर देखा .बोले टँकी फुल थी तो गाड़ी पलटने पर ऊपर से ही तेल लीक हो रहा था जो इंजन में चला गया था .इसलिए दिक्कत दे रही थी . थोड़ी कोशिशों के बाद गाड़ी स्टार्ट हो गई !

बाइक पलटने के बाद फायदा ये हुआ कि मेरा ध्यान फिर बाइक राइडिंग पर आ गया और मुझे हाँट करने वाली याद हवा हो गई .

बजरी पर गाड़ी चलाने में दिक्कत तो होती है . लेकिन पुरे बजरी भरे रास्ते से ज्यादा खतरनाक लगता है एकदम बढ़या सड़क पर स्पीड से जा रहे हों और अचानक से बीच रास्ते में बजरी का ढेर मिले . गाड़ी तुरंत धीमी करनी पड़ती है लेकिन ब्रेक मारकर बाइक नहीं रोक सकते . बजरी पर हार्ड ब्रेक लेकर रोका तो गाड़ी पक्का गिरेगी .

वह सड़क अच्छी थी .बीच बीच में बजरी और सड़क पर बहते पानी के सोते बीच बीच में आते रहे . लेकिन आगे तुरतुक तक का सफर सावधानी से और सुरक्षित गुजरा . बावजूद इसके कि तुरतुक गाँव से बार्डर पर जाने वाली सड़क के लगभग दो ढाई किमी तक निहायत खराब सड़क थी . कहना चाहिए कि कोई सड़क ही नहीं थी . बड़े बड़े रोड़े और ऊपर से चढ़ाई ! वह पैच मैं पैदल पार करता तो ज्यादा तेज पार कर लेता बाइक के मुकाबले और सुरक्षित भी . मगर सीमा पर सेना की आखिरी पोस्ट देखकर और वहां  तैनात जवान द्वारा ब्रीफिंग सुनकर लगा कि यहाँ तक पहुंचने  के लिए जो खतरे उठाए , उसका इनाम मिल गया .


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