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पूर्वांचल में जमीन तलाशने लगी कांग्रेस

यशोदा श्रीवास्तव

गोरखपुर. कांग्रेस ने पूर्वांचल में अपनी जमीन तैयार करने की रणनीति पर काम शुरू कर दी है. यहां की करीब 57 विधानसभा सीटों पर बूथ स्तर तक अपनी पैठ बनाने की रणनीति तय कर ली गई है. राजनीतिक रूप से लगातार ठोकर दर ठोकर खाने के बाद कांग्रेस अब सिर्फ विश्वसनीय लोगो को खोजने में जुट गई है.

महराजगंज की सुप्रिया श्रीनेत को पार्टी ने राष्टीय प्रवक्ता जैसे महत्वपूर्ण पद की जिम्मेदारी सौंपकर कुछ ऐसा ही संकेत दिया है. लोकसभा चुनाव में वे महराजगंज संसदीय क्षेत्र से पार्टी उम्मीदवार रहीं हैं. करीब 75 हजार वोट पाकर चुनाव हार गई थीं. लेकिन हौंसला नही हारीं. बिलकुल अपने पिता स्व हर्षवर्धन की तरह. पूर्वांचल की राजनीति में स्व हर्षवर्धन अजर अमर हैं. छात्र राजनीति के जरिए उन्होंने महराजगंज जिले के फरेंदा विधानसभा क्षेत्र को अपना नया राजीतिक कर्मभूमि चुना. 1977 में जब पूरे देश में जनतापार्टी की लहर रही तब वे इस चुनाव क्षेत्र से हार गए थे. उसके बाद हार तो जैसे उनके पीछे पड़ गई. लगातार कई हार के बाद वे कभी हताश नहीं हुए और जीत हासिल करने की मानो जिद ही कर ली. अंततः 1985 के विधानसभा चुनाव में उन्हें पहली बार जनतापार्टी के टिकट पर  जीत हासिल हुई. फिर 1989 के लोकसभा चुनाव में वे जनतादल के टिकट पर लोकसभा पंहुचे. लोकसभा का उनका कार्यकाल महज 15 महीने ही था. फिर हार उनके पीछे पड़ गई. इस बीच वे कई दलों से भाग्य आजमाए लेकिन कामयाबी नहीं मिली. 1096 में बसपा से भी लड़े लेकिन नहीं जीते. इधर मायावती जब जिलों का गठन और नाम परिवर्तन का अभियान शुरू कीं तो इसी क्रम में महरागंज जिले का नाम भी परिवर्तन होना था. वे इस जिले का नाम साहूजी महराज नगर करना चाहती थीं. हर्षवधन बसपा में रहते हुए इसके विरोध में उतर आए. उनका कहना था यदि जिले का नाम परिवर्तन किया जाना जरूरी ही है इसे स्व शिब्बन लाल सक्सेनस के नाम से किया जाय. महराजगंज स्व शिब्बन लाल सक्सेना की भी कर्मभूमि रही है. वे यहां से कई बार संसद के लिए चुने गए और संविधानसभा के सदस्य रहे. मायावती हर्षवर्धन से खफा हो गईं और पार्टी से निकाल दीं. वे इस परिणाम से अवगत ही थे. उनकी खुद्दारी का आलम यह था कि जब जार्जफर्णंडीस एनडीए घटक का हिस्सा बने तो उन्होंने फर्णांनडीस से संबंध त्याग दिए. फर्णांनडीस हर्षवर्धन के राजनीतिक गुरू थे. कहना न होगा के उन्होंने पद की लालसा में कभी संाप्रदायिक शक्तियों से समझौता नहीं किया. 

स्ुप्रिया ऐसे समय राजनीति में प्रवेश कीं जब उनपर विपदाओं का पहाड़ टूटा था. पिता हर्षवधन के पहले उनके इकलौते भाई राज्यवर्धन का भरी जवानी में निधन,इसके पहले असमय ही मां को खो देना और चुनाव के ठीक बाद इकलौते चचेरे भाई का असमय निधन!  दुखों के पहाड़ को चीरती हुई सुप्रिया का राजनीति में आना अपने आप में ऐसा निर्णय है जिसके पीछे है जनसेवा और पार्टी को मजबूती देना. सुप्रिया का राजनीतिक पृष्ठिभूमि शानदार रहा है लेकिन वे राजनीति से दूर रही हैं. चुनाव के कुछ दिन पूर्व ही पार्टी ने उन्हें टिकट देने का फैासला लिया तो वे प्रख्यात टीवी पत्रकार की अपनी शानदार कैरियर छोड़कर चुनाव मैदान में कूद पड़ीं. परिणाम चाहे जो रहा लेकिन वे महराजगंज की जनता के दिलों में उतर गईं. वे सोनिया राहुल और प्रियंका के काफी निकट हैं. पार्टी के केंद्रिय प्रवक्ता पद पर उनकी नियुक्ति प्रियंका और राहुल के निर्देश पर हुआ. लेकिन पार्टी उनका इस्तेमाल केवल प्रवक्ता के रूप में ही नहीं करना चाहेगी. बड़ी जिम्मेदारी पूर्वांचल में कांगे्रस को मजबूती प्रदान करना है. बिखरे हुए कांगे्रस नेताओं को पुनः सक्रिय करना अनुशासनहीन नेताओं को किनारे लगाना और युवाओं के साथ महिलाओं को भी पार्टी से जोड़ना है. पार्टी का कें्िरदय प्रवक्ता नियुक्ति होने के बाद पहली मरतवा जिले में आई सुप्रिया ने कहा कि पार्टी ने उन्हें बड़ी जिम्मेदारी है. अब उनकी कोशिश पार्टी नेतृत्व की मंशा पर खरा उतरना है. कहा कि अभी विधानसभा का चुनाव दूर है लेकिन पार्टी चुनाव की तैयारी में जुट गई है. अब पार्टी में उन्हीं के लिए जगह है जो पार्टी के लिए मर मिट रहे हैं. बूथ स्तर तक कमेटियों का गठन कर आने वाले दो चार माह में पूर्वांचल में बूथ कमेटियों का बड़ा सम्मेलन कराना लक्ष्य है. इधर कांगे्रस के तमाम वरिष्ठ नेताओं का साफ कहना है कि सुप्रिया की प्रवक्ता पद नियुक्ति से निश्चय ही पूर्वांचल में कांगे्रस न केवल मजबूत होगी,कांगे्रसियों में उर्जा का भी संचार होगा.


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