जनादेश

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कश्मीर और महात्मा गांधी !

  कुमार प्रशांत 

आजादी  दरवाजे पर खड़ी थी लेकिन दरवाजा अभी बंद था. जवाहरलाल नेहरू अौर सरदार वल्लभभाई पटेल रियासतों के एकीकरण की योजना बनाने में जुटे थे. रियासतें किस्म-किस्म की चालों अौर शर्तों के साथ भारत में विलय की बातें कर रही थीं. जितनी रियासतें, उतनी चालें ! अौर एक अौर चाल भी थी जो साम्राज्यवादी ताकतें चल रही थीं. लेकिन वहां एक फर्क अा गया था. कभी इसकी बागडोर इंग्लैंड के हाथ होती थी. अब वह इंग्लैंड के हाथ से निकल कर, अमरीका की तरफ जा रही थी. दुनिया धुरी बदल रही थी. 

अौपनिवेशिक साम्राज्यवादी ताकतों का सारा ध्यान इस पर था कि भारत न सही, भागते भूत की लंगोटी ही सही ! तो हिसाब लगाया जा रहा था कि भारत भले छोड़ना पड़े लेकिन वह कौन-सा सिरा अपने हाथ में दबा लें हम िक जिससे एशिया की राजनीति में अपनी दखलंदाजी बनी रह सके; अौर मुद्दा यह भी था कि अाजाद होने जा रहे भारत पर भी जहां से नजर रखने में सहूलियत हो. तो जिन्ना साहब समझ रहे थे कि अंग्रेज उनके लिए पाकिस्तान बना रहे हैं जबकि सच यह था कि वे सब मिल कर अपने लिए पाकिस्तान बना रहे थे.  

साम्राज्यवादी ताकतें खूब समझ रही थीं कि जिन्ना को पाकिस्तान मिलेगा तभी पाकिस्तान उन्हें मिलेगा; अौर पाकिस्तान के भावी भूगोल में कश्मीर का रहना जरूरी था क्योंकि वह भारत के मुकुट को अपनी मुट्ठी में रखने जैसा होगा. 1881 से लगातार साम्राज्यवाद  यह जाल बुन रहा था. अब सार्वजनिक हुए कई दस्तावेज इस षड्यंत्र का खुलासा करते हैं. यह सच्चाई उधर मालूम थी तो इधर भी मालूम थी. सरदार साहब को मुस्लिमबहुल कश्मीर में ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी अौर वे कश्मीर से हैदराबाद का सौदा करने की बात कह भी चुके थे. लेकिन इतिहास में दर्ज है कि एकाध बार से ज्यादा सरदार इस तरह नहीं बोले हैं. यह चुप्पी एक रणनीति के तहत बनी थी. भारतीय नेतृत्व समझ रहा था कि कश्मीर के पाकिस्तान में जाने का मतलब पश्चिमी ताकतों को एकदम अपने सर पर बिठा लेना होगा. अाजाद होने से पहले ही, जवाहरलाल नेहरू की पहल पर एशियाई देशों का जो सम्मेलन भारत के अायोजित किया था, जिसमें महात्मा गांधी ने भी हिस्सा लिया था, उसमें ही यह पूर्वपीठिका बनी अौर स्वीकृत हुई थी कि स्वतंत्र भारत की विदेश-नीति का केंद्रीय मुद्दा साम्राज्यवादी ताकतों को एशियाई राजनीति में दखलंदाजी करने से रोकना होगा. इसलिए कश्मीर को पाकिस्तान में जाने से रोकने की बात बनी. यह भारत सरकार की सामूहिक भूमिका थी. बाकी रियासतों के मामलों से इसलिए कश्मीर का मामला अलग रखा गया था. इसमें जवाहरलाल-सरदार की पूर्ण सहमति थी. लेकिन यह तो हमारी रणनीति थी. दूसरे भी थे जिनकी दूसरी रणनीतियां थीं. जिन्ना साहब ने अपना दांव चला अौर उन्होंने कश्मीर पर हमला कर दिया. उनकी इस मूढ़ता ने कश्मीर को उस तरह अौर उतनी तेजी से भारत की तरफ धकेल दिया जिसकी पहले संभावना नहीं थी. नेहरू-सरदार ने इसे ईश्वर का भेजा अवसर ही समझा अौर फिर अागे वह इतिहास बना जिसके तहत कश्मीर हमारे साथ अा जुड़ा. 

वहां के नौजवान नेता शेख मुहम्मद अब्दुल्ला राजशाही के खिलाफ लड़ रहे थे अौर कांग्रेस के साथ थे. नये ख्यालात वाले ऐसे तमाम नौजवान जिस तरह जवाहरलाल के निकट पहुंचते थे वैसे ही शेख भी जवाहरलाल के हुए. रियासतों के भीतर चल रही अाजादी की जंग से जवाहरलाल खास तौर पर जुड़े रहते थे. स्थानीय अांदोलन की वजह से जब महाराजा हरि सिंह ने शेख मुहम्मद अब्दुल्ला को जेल में डाल दिया था तो नाराज जवाहरलाल उसका प्रतिकार करने कश्मीर पहुंचे थे. राजा ने उन्हें भी उनके ही गेस्टहाउस में नजरबंद कर दिया था. तो महाराजा के लिए जवाहरलाल भड़काऊ लाल झंडा बन गये थे. अब, जब विभाजन भी अौर अाजादी भी अान पड़ी थी तो वहां कौन जाए कि जो मरहम का भी काम करे अौर विवेक भी जगाए ? माउंटबेटन साहब ने प्रस्ताव रखा: क्या हम बापूजी से वहां जाने का अनुरोध कर सकते हैं ?   जारी  

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