जनादेश

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कश्मीर का फैसला तो अवाम करेगी -गांधी

कुमार प्रशांत 

महात्मा गांधी पहले कश्मीर कभी नहीं जा सके थे. जब-जब योजना बनी, किसी-न-किसी कारण अंटक गई. जिन्ना साहब भी एक बार ही कश्मीर गये थे जब टमाटर अौर अंडों से उनका स्वागत हुअा था. गुस्सा यूं था कि यह जमींदारों व रियासत का पिट्ठू है ! प्रस्ताव माउंटबेटन का था, जवाब गांधी से अाना था. अब उम्र 77 साल थी. सफर मुश्किल था लेकिन देश का सवाल था तो गांधी के लिए मुश्किल कैसी !! वे यह भी जानते थे कि अाजाद भारत का भौगोलिक नक्शा मजबूत नहीं बना तो रियासतें अागे नासूर बन जाएंगी. वे जाने को तैयार हो गये. किसी ने कहा: इतनी मुश्किल यात्रा क्या जरूरी है ? अाप महाराजा को पत्र लिख सकते हैं ! कहने वाले की अांखों में देखते हुए वे बोले: “ हां, फिर तो मुझे नोअाखली जाने की भी क्या जरूरत थी ! वहां भी पत्र भेज सकता था. लेकिन भाई उससे काम नहीं बनता है.”  

 अाजादी से मात्र 14 दिन पहले, रावलपिंडी के दुर्गम रास्ते से महात्मा गांधी पहली अौर अाखिरी बार कश्मीर पहुंचे. जाने से पहले, 29 जुलाई 1947 की प्रार्थना-सभा में उन्होंने खुद ही बताया कि वे कश्मीर जा रहे हैं : “ मैं यह समझाने नहीं जा रहा हूं कि कश्मीर को भारत में रहना चाहिए. वह फैसला तो मैं या महाराजा नहीं, कश्मीर के लोग करेंगे. कश्मीर में महाराजा भी हैं, रैयत भी है. लेकिन राजा कल मर जाएगा तो भी प्रजा तो रहेगी. वह अपने कश्मीर का फैसला करेगी.” 

1 अगस्त1947 को महात्मा गांधी कश्मीर पहुंचे. तब के वर्षों में घाटी में लोगों का वैसा जमावड़ा देखा नहीं गया था जैसा उस रोज जमा हुअा था. झेलम नदी के पुल पर तिल धरने की जगह नहीं थी. गांधी की गाड़ी पुल से हो कर श्रीनगर में प्रवेश कर ही नहीं सकी. उन्हें गाड़ी से निकाल कर नाव में बिठाया गया अौर नदी के रास्ते शहर में लाया गया. दूर-दूर से अाए कश्मीरी लोग यहां-वहां से उनकी झलक देख कर तृप्त हो रहे थे: “ बस, पीर के दर्शन हो गये !

शेख अब्दुल्ला तब जेल में थे. बापू का एक स्वागत महाराजा ने अपने महल में अायोजित किया था तो नागरिक स्वागत का दूसरा अायोजन बेगम अकबरजहां अब्दुल्ला ने किया था. महाराजा हरि सिंह, महारानी तारा देवी तथा राजकुमार कर्ण सिंह ने महल से बाहर अा कर उनकी अगवानी की थी. उनकी खानगी बातचीत का कोई खास पता तो नहीं है लेकिन बापू ने बेगम अकबरजहां के स्वागत समारोह में खुल कर बात कही : इस रियासत की असली राजा तो यहां की प्रजा है… वह पाकिस्तान जाने का फैसला करे तो दुनिया की कोई ताकत उसे रोक नहीं सकती है. लेकिन जनता की राय भी कैसे लेंगे अाप ? उसकी राय लेने के लिए वातावरण तो बनाना होगा न ! वह अाराम से व अाजादी से अपनी राय दे सके, ऐसा कश्मीर बनाना होगा. उस पर हमला कर, उसके गांव-घर जला कर अाप उसकी राय तो ले नहीं सकते हैं… प्रजा कहे कि भले हम मुसलमान हैं लेकिन रहना चाहते हैं भारत में तो भी कोई ताकत उसे रोक नहीं सकती है. अगर पाकिस्तानी यहां घुसते हैं तो पाक की हुकूमत को उनको रोकना चाहिए. नहीं रोकती है तो उस पर इल्जाम तो अाएगा ही ! 


बापू ने फिर भारत की स्थिति साफ की : कांग्रेस हमेशा ही राजतंत्र के खिलाफ रही है - वह इंग्लैंड का हो कि यहां का. शेख अब्दुल्ला लोकशाही की बात करते हैं, उसकी लड़ाई लड़ते हैं. हम उनके साथ हैं. उन्हें जेल से छोड़ना चाहिए अौर उनसे बात कर अागे का रास्ता निकालना चाहिए… कश्मीर के बारे में फैसला तो यहां के लोग ही करेंगे. फिर गांधीजी यह भी साफ करते हैं कि ‘यहां के लोग’ से उनका मतलब क्या है - यहां के लोगों से मेरा मतलब है यहां के मुसलमान, यहां के हिंदू, कश्मीरी पंडित, डोगरा लोग तथा यहां के सिख ! 

यह कश्मीर के बारे में भारत की पहली घोषित अाधिकारिक भूमिका थी. गांधीजी सरकार के प्रवक्ता नहीं थे, क्योंकि स्वतंत्र भारत की सरकार अभी तो अौपचारिक रूप से बनी भी नहीं थी. लेकिन वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के मूल्यों के जनक व स्वतंत्र भारत की भूमिका के सबसे अाधिकारिक प्रवक्ता थे, इससे कोई इंकार कर ही कैसे सकता था. गांधीजी के इस दौरे ने कश्मीर को विश्वास की ऐसी डोर से बांध दिया कि जिसका नतीजा शेख अब्दुल्ला की रिहाई में, भारत के साथ रहने की उनकी घोषणा में, कश्मीरी मुसलमानों में घूम-घूम कर उन्हें पाकिस्तान से विलग करने के अभियान में दिखाई दिया. जवाहरलाल-सरदार पटेल-शेख अब्दुल्ला की त्रिमूर्ति को गांधीजी का अाधार मिला अौर अागे कि वह कहानी लिखी गई जिसे रगड़-पोंछ कर मिटाने में अाज सरकार लगी है. जिन्होंने बनाने में कुछ नहीं किया, वे मिटाने के उत्तराधिकार की घोषणा कर रहे हैं. अौर हमें यह भी याद रखना चाहिए कि जब फौजी ताकत के बल पर पाकिस्तान ने कश्मीर हड़पना चाहा था अौर भारत सरकार ने उसका फौजी सामना किया था तब महात्मा गांधी ने उस फौजी अभियान का समर्थन किया था. 

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