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बंगाल में दुर्गापूजा से तेज हुआ राजनैतिक टकराव !

रीता तिवारी

कोलकाता .पश्चिम बंगाल के सबसे बड़े त्योहार दुर्गापूजा का राजनीति से पुराना और गहरा रिश्ता रहा है. इस पर सियासी रंग चढ़ने की शुरुआत तो राज्य की लेफ्टफ्रंट सरकार के आखिरी दौर में ही हो गई थी. लेकिन ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने इस पंरपरा को और मजबूत किया. पूजा को सियासी फायदे के लिए भुनाने की तृणमूल की रणनीति काफी कामयाब रही है. अब यही सोच कर भाजपा ने भी पूजा समितियों पर कब्जे का अभियान शुरू कर दिया है. अपनी इसी रणनीति के तहत इस सप्ताह भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भी कोलकाता में एक पूजा पंडाल का उद्घाटन किया.

भाजपा अबकी तृणमूल कांग्रेस का बर्चस्व तोड़ने का प्रयास कर रही है. खासकर बीते लोकसभा चुनावों में 42 में 18 सीटें जीतने के बाद भगवा पार्टी के हौसले बुलंद हैं और वह वर्ष 2021 के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए अपनी जमीन मजबूत करने के लिए अब दीदी को उनके ही हथियार से मात देने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है. लेकिन फिलहाल उसकी राह आसान नहीं है.

कोलकाता समेत राज्य की ज्यादातर समितियां दीदी यानी ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के रंग में रंग चुकी हैं. करोड़ों के बजट वाली ज्यादातर आयोजन समितियों में तृणमूल के नेता और मंत्री ही अध्यक्ष या संरक्षक के तौर पर काबिज हैं. बंगाल में दुर्गापूजा की अहमियत इसी से समझी जा सकती है कि तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी हर साल सैकड़ों पूजा पंडालों का उद्घाटन करती हैं. यह सिलसिला नवरात्र के पहले दिन से ही शुरू हो जाता है. बंगाल में लगभग 28 हजार पंडालों में दुर्गापूजा का आयोजन किया जाता है. इनमें से छोटे-बड़े चार हजार आयोजन अकेले कोलकाता व आसपास के इलाकों में होते हैं. महानगर में दो सौ पूजा समितियां ऐसी हैं जिनका बजट करोड़ों में होता है. इस साल जनवरी में आय कर विभाग ने इन प्रमुख समितियों को नोटिस भेजा था. तब ममता ने इसका कड़ा विरोध किया था.


बीते कुछ वर्षों के दौरान हुए विभिन्न चुनावों और उपचुनावों में अपने वोटों में इजाफे के बाद भाजपा अब खुद को बंगाल की परंपरा व संस्कृति से और ज्यादा जोड़ने का प्रयास कर रही है. भाजपा की इस रणनीति में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठन भी उसका साथ दे रहे हैं. संघ के प्रवक्ता जिष्णु बसु कहते हैं कि दुर्गापूजा बंगाल का सबसे बड़ा त्योहार है. ऐसे में पार्टी खुद को इससे दूर कैसे रख सकती है. तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पंचायत मंत्री सुब्रत मुखर्जी, जो खुद कोलकाता की प्रमुख आयोजन समिति एकडालिया एवरग्रीन के अध्यक्ष हैं, आरोप लगाते हैं कि भाजपा दुर्गापूजा का सियासी इस्तेमाल करना चाहती है. लेकिन त्योहारों को राजनीति से परे रखना चाहिए.


भाजपा ने महीनों पहले से कई प्रमुख आयोजन समितियों के साथ संपर्क शुरू कर दिया था. इस पर विवाद भी हुआ. मिसाल के तौर पर महानगर की एक समिति ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को पूजा पंडाल के उद्घाटन का न्योता दिया था. लेकिन विवाद बढ़ने पर वह न्योता वापस ले लिया गया. प्रदेश भाजपा के एक वरिष्ठ नेता मानते हैं कि आम लोगों के बीच पैठ बढ़ाने के लिए पूजा से बेहतर कोई दूसरा मौका नहीं हो सकता. उनका कहना है कि बंगाल में लोकसभा चुनावों में सियासी कामयाबी के बाद पार्टी अब अपनी सांस्कृतिक जमीन मजबूत करना चाहती है. दरअसल, अब आम लोगों से जुड़ने के लिए पूजा समितियों पर कब्जे के जरिए भाजपा अब खुद को बंगालियों की पार्टी के तौर पर छवि बनाना चाहती है. अभ तक यहां उसकी छवि गैर-बंगाली हिंदीभाषियों की पार्टी की है. प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, हम अबकी दुर्गापूजा में अपनी भागीदारी बढ़ाना चाहते हैं. मैं खुद कई पूजा पंडालों का उद्घाटन करूंगा.

भाजपा नेताओं का कहना है कि खासकर ग्रामीण इलाकों में अपनी पैठ बनाने के लिए पार्टी कोलकाता व दूसरे शहरों की बजाय उन इलाकों में दुर्गापूजा के आयोजन पर ध्यान देते हुए अपनी भागीदारी बढ़ाने में जुटी है. भाजपा के एक नेता का दावा है कि जो पूजा समितियां पार्टी के नेताओं को उद्घाटन के लिए या बतौर मुख्य अतिथि आमंत्रित कर रही हैं, राज्य सरकार उनको तरह-तरह से परेशान करने का प्रयास कर रही है.

दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस पूजा समितियों पर कब्जे के लिए भाजपा की ओर से मिलने वाली टक्कर से परेशान नहीं है. तृणमूल कांग्रेस सांसद सौगत राय कहते हैं कि भाजपा पूजा समितियों पर कब्जे का भरसक प्रयास कर रही है. लेकिन राज्य के लोग उसे नकार देंगे. मंत्री सुब्रत मुखर्जी कहते हैं, तृणमूल कांग्रेस दुर्गापूजा के नाम पर राजनीति नहीं करती. लेकिन भाजपा ने अब धर्म औऱ दुर्गापूजा के नाम पर सियासत शुरू कर दी है.राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि दोनों राजनीतिक दलों के बीच दुर्गापूजा समितियों पर कब्जे की लड़ाई तेज हो रही है. एक विश्लेषक सोमेन दासगुप्ता कहते हैं कि तमाम प्रमुख पूजा समितियों पर सत्तारुढ़ पार्टी का नियंत्रण है. ऐसे में भाजपा की राह आसान नहीं होगी. वह कहते हैं कि वर्ष 2021 के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए यह जंग और तेज होने का अंदेशा है.


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