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आखिर किसके निशाने पर हैं ये जज !

संजय कुमार सिंह 

नई दिल्ली .अंग्रेजी अखबार द टेलीग्राफ में 22 सितंबर को पहले पन्ने पर एक खबर थी. इसका शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होता, “सुप्रीम कोर्ट ने जज से संबंधित निर्णय संशोधित किए”. इस खबर के मुताबिक केंद्र सरकार के एतराज (रिजर्वेशन) के बाद सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने न्यायमूर्ति अकिल कुरैशी को तरक्की देकर त्रिपुरा हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाया है. उन्हें मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश 10 मई को की गई थी. नई सिफारिश इसे संशोधित कर की गई है. उसी दिन अखबारों में खबर थी कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द ने मद्रास हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश विजया के ताहिलरमानी का इस्तीफा मंजूर कर लिया है. उन्होंने इस्तीफे की प्रति मुख्य न्यायाधीश को भी भेजी थी. इससे पहले साल 2017 में कर्नाटक हाईकोर्ट के जज जयंत पटेल ने कोलिजयम द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट ट्रांसफर करने के फैसले के बाद इस्तीफा दे दिया था. वैसे तो, जज जयंत पटेल ने अपने इस्तीफे की कोई वजह नहीं बतायी थी. पर जयंत पटेल ने ही गुजरात हाईकोर्ट के जज रहते हुए इशरत जहां मामले में सीबीआई जांच के निर्देश दिए थे. 

द टेलीग्राफ की ही खबर के अनुसार, 10 मई की सिफारिशों पर अमल में देरी पर टिप्पणी करते हुए गुजरात हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन के प्रेसिडेंट यतिन ओज़ा ने बताया था कि न्यायमूर्ति कुरैशी ने 2010 में मौजूदा गृहमंत्री अमित शाह को शोहराबुद्दीन फर्जी एनकाउंटर केस में पुलिस हिरासत में भेजा था. इसी खबर के मुताबिक, गुजरात हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन ने एक याचिका दायर कर कहा था कि 10 मई की सिफारिशों पर केंद्र द्वारा कार्रवाई नहीं किया जाना न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला है. इसमें बताया गया था कि सरकार ने सात जून को न्यायमूर्ति रविशंकर प्रसाद को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर दिया था. इसमें तर्क दिया गया था कि केंद्र का कदम नियमों का उल्लंघन है.

इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक खबर के अनुसार न्यायमूर्ति ताहिलरमानी ने जो प्रमुख मामले देखे हैं उनमें बिलकिस बानो का मामला भी है. उल्लेखनीय है कि बॉम्बे हाई कोर्ट ने चार मई 2017 को 12 लोगों की दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा था जबकि भारतीय दंड संहिता की धारा 218 (ड्यूटी ना करने) और धारा 201 (सबूतों से छेड़छाड़) के तहत पांच पुलिस वालों और दो डॉक्टर्स को दोषी ठहराया था. इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, यह तबादला तीन कारणों से हुआ था. एक्सप्रेस ने इन कारणों पर न्यायमूर्ति ताहिलरमानी का पक्ष जानने की कोशिश की पर उन्होंने कुछ भी बोलने से मना कर दिया. इस बीच अखबारों में खबर छपी है कि सुप्रीम कोर्ट ने 2002 गुजरात दंगों के दौरान गैंगरेप का शिकार हुई बिलकिस बानो की अवमानना या‍चिका पर सुनवाई करते हुए गुजरात सरकार को आदेश दिया है कि पीड़ि‍ता को दो हफ्ते के भीतर 50 लाख रुपये मुआवजा दिया जाए. साथ ही आदेश दिया कि बिलकिस बानो को सरकारी नौकरी और रहने के लिए आवास भी दिया जाए. सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने न्यामूर्ति ताहिलरमानी का तबादला मेघालय कर दिया था. 

एक तरफ तो गुजरात मामले में सरकार के खिलाफ फैसला देने वाले जजों की यह हालत है दूसरी ओर, दो दिन पहले अखबारों में पहले पन्ने पर प्रमुखता से खबर छपी थी, "बयान बहादुर भगवान राम के लिए देश की न्याय प्रणाली पर श्रद्धा रखें - मोदी". पर मामला सिर्फ श्रद्धा रखने का नहीं है. न्यायमूर्ति ताहिरमानी का इस्तीफा मंजूर होने की खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में चेन्नई डेटलाइन से छपी थी. इसमें एमसी राजन ने लिखा था, “इससे लगता है कि उनके इस्तीफे से शुरू हुआ विवाद शांत हो जाएगा”. पर बाद में खबर आई कि सुप्रीम कोर्ट ने न्यायमूर्ति ताहिलरमानी के खिलाफ सीबीआई जांच की मंजूरी दे दी है. सवाल उठता है कि जज के खिलाफ सीबीआई जांच की मंजूरी इस्तीफे के बाद क्यों? वैसे भी, सीबीआई को मंजूरी की क्या जरूरत? द टेलीग्राफ की एक खबर के अनुसार, मेघालय तबादले के समय उनकी या मध्यप्रदेश हाई कोर्ट के मुख्यन्यायाधीश बनाए गए अकिल कुरैशी की किसी गलती का कोई जिक्र नहीं किया गया था. 

न्यामूर्ति ताहिलरमानी ने इस्तीफे पर पुनर्विचार की अपील भी की थी. इसपर कोलेजियम ने कहा था, कॉलेजियम ने प्रतिनिधित्व के मामले को बहुत ध्यान से देखा और सभी प्रासंगिक कारकों को ध्यान में रखा. उनके अनुरोध को स्वीकार करना संभव नहीं है. इसलिए, कॉलेजियम 28 अगस्त, 2019 को मेघालय हाईकोर्ट में जस्टिस वीके ताहिलरामनी के स्थानांतरण की अपनी सिफारिश को दोहराता है. इस बारे में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) नेता बृंदा करात ने कहा है, ‘75 न्यायाधीशों वाली अदालत से केवल दो न्यायाधीशों वाले मेघालय में (मुख्य न्यायाधीश के रूप में) स्थानांतरण करना सामान्य नहीं माना सकता है. यह एक तरह से पद को छोटा किया जाना है. उन्होंने आगे कहा, इस घटना से एक बार फिर असंतोषजनक और गैर पारदर्शी न्यायिक नियुक्ति और स्थानातंरण व्यवस्था रेखांकित हुई है. 

हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाए जाने और तबादले के ये दोनों मामले पहले से विवाद में हैं फिर इस्तीफा मंजूर होने के बाद खबर आई थी कि मुख्य न्यायाधीश, रंजन गोगोई ने मद्रास हाईकोर्ट की पूर्व मुख्य न्यायाधीश विजया के ताहिलरमानी के खिलाफ सीबीआई को कानून सम्मत कार्रवाई करने की इजाजत दे दी है. हिन्दी अखबारों में ऐसी खबरें छपती ही नहीं हैं पर द टेलीग्राफ ने इस मामले को लीड बनाया था. शीर्षक था, जजों के तबादले पर सवाल. सात कॉलम में छपी इस खबर का फ्लैग शीर्षक था, अगर वाकई आरोप हैं तो महाभियोग की प्रक्रिया क्यों नहीं? उत्तर पूर्व में तबादला क्यों?  जस्टिस ताहिलरमानी ने अगस्त 2018 को मद्रास हाईकोर्ट में बतौर चीफ जस्टिस अपना कार्यभार संभाला था. वह अक्तूबर, 2020 में अपने पद से रिटायर होने वालीं थी. द टेलीग्राफ के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) के पूर्व प्रेसिडेंट और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने न्यायमू्र्ति ताहिलरमानी के खिलाफ सीबीआई जांच की मंजूरी दिए जाने पर कहा है, एक हफ्ते पहले ही तो कॉलेजियम ने उनका तबादला मेघालय हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में किया था. अब अगर वे मेघालय हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाने के लिए उपयुक्त थीं और उन्होंने तबादला स्वीकार कर लिया होता तो क्या सीबीआई जांच की मंजूरी दी जाती? 


गुजरात मामले में सरकार के खिलाफ फैसला देने वाले जजों से संबंधित इन खबरों के बीच यह भी खबर है कि इशरत जहां की मां ने कहा है कि वे लंबी लड़ाई से निराश हैं और अब कोर्ट नहीं जाएंगी. गुजरात पुलिस के कथित फर्जी एनकाउंटर में मारी गई इशरत जहां की मां शमीमा कौसर ने कहा है कि बेहद लंबी खिंच रही इंसाफ की लड़ाई में वह निराश और असहाय महसूस कर रही हैं. सीबीआई के विशेष जज आर के चूड़ावाला चार आरोपी पुलिसकर्मियों द्वारा दायर डिस्चार्ज आवेदन पर सुनवाई कर रहे हैं. इनमें आईजी जीएल सिंघल, पूर्व डीएसपी तरुण बारोट, पूर्व डीएसपी जे जी परमार और एएसआई अंजू चौधरी शामिल हैं. जज चूड़ावाला के समक्ष दायर पत्र में कौसर ने कहा, "सजा न मिलने की संस्कृति से मेरा दिल टूट चुका है और साहस बिखर गया है.' अदालती कार्यवाही से दूर रहने का जिक्र करते हुए उन्होंने सीबीआई से सुनिश्चित करने को कहा है कि आरोपियों पर दोष साबित हो. उन्होंने लिखा, "15 से ज्यादा साल गुजर चुके हैं. पुलिस अधिकारियों सहित सभी आरोपी जमानत पर हैं. कई लोगों को तो गुजरात सरकार बहाल भी कर चुकी है, जबकि उन पर मेरी बेटी की हत्या का मुकदमा चल रहा था.  


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