जनादेश

बाबा रामदेव का ट्विटर पर क्यों हुआ विरोध ? जेएनयू के छात्र यूं नहीं सड़क पर हैं गुदड़ी के लाल थे वशिष्ठ नारायण सिंह नहीं रहे अब्दुल जब्बार भाई नहीं रहे अब्दुल जब्बार भाई ध्यान से देखिये ,ये फोटो देश के महान गणितज्ञ की है ! नेपाल में शुरू हुआ चीन का विरोध जेएनयू में यह सब क्यों हो रहा है. कानून के राज को 'एक झटका' यह फैसला दिक्कत पैदा कर सकता है ! मेरे मित्र टीएन शेषन ! मोदी सरकार के समर्थन का यह कीमत मिली - तवलीन फैसला विसंगतियों से भरा- भाकपा (माले) तथ्यों से धराशाही हुए सियासत के तर्क! आरटीआई की धार भोथरी करती सरकार ! शाहनजफ़ इमामबाड़ा में ईद-ए-ज़हरा ! भाषा को रामनामी से मत ढकिये ! पर रात का खीरा तो पीड़ा ! नीतीश कुमार के दावे हवा-हवाई झारखंड चुनाव में बिखर रही हैं गंठबंधन की गांठें

पहाड़ का वह डाकबंगला

सिद्धेश्वर सिंह

कल उस 'लोक' से लौट आया ; सुरक्षित ,सम्पन्न.साथ में (कार्य) मुक्ति के बाद (अनुभव) होने वाली थकान भी घर तक चलकर आई.रात कई दिनों बाद अच्छी और खूब गहरी नींद आई. भोर में एक छोटा - सा सपना आया और सपने में जिम कार्बेट आए.उनके हाथ में बंदूक नहीं ,किताब थी -'ट्री टॉप्स'. मेरे सिरहाने ढेर सारी किताबें देखकर वे खुश हुए.वे बड़े प्यार से किताबों को देखते रहे और बोले - 'इनमें से बहुत -सी नई किताबें हैं ,मेरे बाद की.मैंने कहा -' हाँ आपकी किताबों के बाद की.'इस जवाब से वे काफी खुश हुए.उनकी मुस्कान की उजास को मैंने पूरे घर में एकसार फैलते हुए देखा.

'तो तुम फॉरेस्ट के उस डाक बंगले में में दो रात रहे.' उन्होंने ऐसे पूछा जैसे कि वहाँ मेरे होने की तस्दीक कर रहे हों जहां कभी किसी समय उनके होने के.किस्से आम हैं. वे कहने लगे - 'जिस इलाके से तुम अभी लौटकर आए हो वह मुझे बहुत पसंद है. वह डाक बंगला भी जिसमे तुम दो रात रहे और ठीक से सो नहीं पाए. क्यों नहीं ठीक से सोए तुम '?'

मैं क्या कहता कि ऐसी ड्यूटी पर था जिसमें मोबाइल फोन को स्विचऑफ करने की मनाही थी. मैने गौर किया वे 'था' की जगह 'है' शब्द का प्रयोग कर रहे हैं.मैंने लगभग डरते हुए - से पूछ लिया - 'आप अब भी वहाँ आते हैं'? जबकि पूछना यह चाहता था कि क्या वे अब भी वहीं रहते हैं. वे शायद मेरी बात का निहितार्थ समझ गए और बोले -'नहीं, मैं वहाँ नही रहता. वहाँ मेरी स्मृति रहती है'. फिर थोड़ा पास सरक कर धीमे स्वर में ऐसे बोले जैसे कि कोई रहस्य की बात बता रहे हों - 'सुनो , अब तुम्हारी स्मृति भी वहाँ रहा करेगी .हो सकता है कि किसी दिन ,किसी समय कोई आए और उसे ठीक वैसे ही पहचान ले जैसे कि तुमने मेरी स्मृति को पहचान लिया'.अब उनके मुख पर दूसरी तरह की मुस्कान थी - आधी दुनियावी आधी मायावी . मैंने चीन्हा ;यह एक लेखक की मुस्कान थी जो समय के साथ किसी नश्वर काया की कैद से निकलकर किसी किताब की शक्ल में रूपायित हो जाती है - स्थायी,अक्षुण्ण और अमर .


एक झटके में नींद खुल गई है.रोजाना की तरह भोर के साढ़े पांच बजे का अलार्म बज रहा है और एक नया दिन उदित होने की तैयारी में हैं. कामकाज और दसेक दिन से जारी यात्रा की थकान उतर गई लग रही है. देह और मन दोनो हल्के महसूस हो रहे हैं -भारहीन.देखता हूँ कि सिरहाने जिम कार्बेट की वही पतली - सी किताब 'ट्री टॉप्स' रखी है जिसे बेटे अंचल ने कभी कार्बेट म्यूजियम से खरीदा था.पत्नी शैल दुर्गापूजा की छुट्टियों बेटे के पास गई हुई हैं.बेटी भी अपने कॉलेज से सीधे वहीं पहुची है.वे तीनों कई महीने बाद इकठ्ठे हुए हैं और मैं ड्यूटी से लौटकर इस तमाम तरह की सुख सुविधाओं से लैस इस घर में उस बीहड़ प्रांतर की स्मृतियों के साथ विद्यमान हूँ जो सुदूर है तथा अपने सौंदर्य में सचमुच अप्रतिम है.जरूरी बात यह कि मेरे प्रिय लेखक जिम कार्बेट को यह इलाका बहुत पसंद था , सॉरी जिम कार्बेट को बहुत पसंद है . 'था' नही कहने का, क्या .

आज की रात यहीं रुकना है.हालांकि इस तरह की कोई अनिवार्यता नहीं थी.चाहता तो शाम घिरते - घिरते बड़े आराम से जिला मुख्यालय लौटकर आराम कर सकता था लेकिन इस मन का क्या करूँ जो कि यहाँ की शाम को रात में बदलते देखने के लिए उत्सुक हो चुका था.रात अपने आप में एक रहस्य है ; तमस के परदे में एक पारलौकिक खेला रचता हुआ और रही बात रहस्य की तो मुझे अक्सर लगता है कि यह एक ऐसी चीज है जिससे रु -ब-रु आखिर कौन नहीं होना चाहता .

सुबह जब यहाँ आया था तो एक भीगा - भीगा दिन सचमुच शुरू हो चुका था और रोजमर्रा के कार्यव्यापार बदस्तूर जारी थे.यह पावस के पश्चात का पर्वत प्रदेश है अपनी हरियाली पर इतराता - इठलाता हुआ.अधिक ऊँचाई पर है तो यहाँ ठंड भी है और एकाएक धमक कर आ जाने वाली धुन्ध और बारिश भी जैसे कि वह हर पल मुस्तैद खड़ी है.सोचता हूँ कि बारिश को कौन आदेश देता होगा कि जाओ वहाँ बरसो और धुन्ध को कौन 'ब्रीफ' करता होगा कि कैसे ,कहाँ और किस रणनीति के तहत पूरी घाटी में फैल कर एक दूसरी दुनिया का निर्माण कर देना है.स्वयं से किए इस प्रश्न का उत्तर स्वयं खोजता हूँ और अपने 'आत्म' को संबोधित करता हूँ - बारिश और धुन्ध स्वतंत्र है मित्र. वे तुम्हारी तरह किसी की मुलाजमत नहीं करते . तुम्हारी फाइल में एक 'आदेश' है जिसके तहत तुम यहाँ इस दूरस्थ - दुर्गम क्षेत्र में कुछ दिन के लिए आए हो लेकिन बारिश और धुंध  वे तो अपने घर में हैं उनका कोई 'शिड्यूल' नहीं उनके पास कोई 'चेकलिस्ट' नहीं जिसे तुम्हारी तरह पूरित कर समयबद्ध तरीके से मीटिंग में प्रस्तुत करना है.


आम तौर पर यहाँ पर दो ही दिशाएं हैं- या तो ऊपर या फिर नीचे.इन दोनों के बीच में एक सड़क है जो कि सर्पिल है - मोड़ दर मोड़.मेरे ज्यादातर 'स्थल' सड़क पर ही हैं - रोड साइड. वैसे इनके सड़क पर होने का मतलब है कि सौ ,दो सौ या फिर पाँच सौ मीटर पैदल उतरने और चढ़ने का हिसाब वास्तव में नगण्य है.अपना काम निपटाता हूँ.कागजात भरता हूँ और कहीं रुककर दो -तीन बार चाय पीता हूँ.दुकानदार और ड्राईवर दोनो मेरी कम मीठी या फिर फीकी चाय की डिमांड से मुस्कुराते हैं.


रात डाकबंगले में रुकनी है.वहाँ की चाभी नहीं मिल रही है. चौकीदार कहीं चला गया है ;शायद नीचे अपने गाँव.मैंने विभाग को अपनी आमद की खबर भी तो नहीं की थी.आते समय रास्ते में एक बार को मन हुआ था कि 'चौकी' पर रुककर खबर करवा दूँ लेकिन पहले देवदार, फिर चीड़ और उसके बाद बुराँश के वृक्षों की अविरल पाँत के आकर्षण ने कहीं रुकने ही नहीं दिया.बीच में एक - दो बार कोई हिरण सड़क पार करता मिला तो रास्ता और सुन्दर हो गया.मैने ड्राईवर से पूछा - क्या इधर बाघ भी हैं? उसने कहा - हाँ.हो सकता है मिल भी जाय.


थाने में अपनी आमद दर्ज करा चुका हूँ और डाकबंगले के अहाते में घूम -टहल रहा हूँ.यह दो घाटियों के संधिस्थल पर अवस्थित है.दोनो तरफ बादल हैं;दोनो तरफ हल्की बारिश.घास गीली है ,जमीन नम.एक स्थानीय व्यक्ति आगाह करता है - थोड़ा बचकर रहना साहब ,यहाँ जोंक बहुत हैं.मैं उसे धन्यवाद कहता हूँ और मुस्कुराता हूँ.वह मुझे किंचित आश्चर्य से देखता है.हो सकता है उसने किसी 'साहब' को पहली बार मुस्कुराते हुए देखा हो .


अंधेरा उतरने लगा है.पहाड़ों की रंगत धीरे - धीरे बदलने लगी है.वे और गहरे और गाढ़े और सुंदर होते जा रहे है.बादल विरल हो गए हैं.धुन्ध छँट गई है.ठंड बढ़ -सी गई है और हवा की गति थोड़ी तीव्र हुई है.दूर पहाड़ों पर बत्तियाँ चमकने लगी हैं.पश्चिम में अस्ताचल की लालिमा है.पूरब में दूर तक उजाले की आभा का विस्तार क्रमशः प्रकट हो रहा है जैसे कि इस विरल आबादी वाले इलाके के बनिस्बत उधर कोई बड़ी बस्ती हो ,शायद कोई कस्बा या फिर छोटा - मोटा शहर .पूछता हूँ तो पता चलता है कि वह नदी के उस पार का इलाका है ; दूसरा देश ,पर - राष्ट्र ,विदेश .

अभी तक सुना भर था.अभी साक्षात देख रहा हूँ.पुलिस अगर चाहे तो क्या नहीं कर सकती . उसने डाकबंगले की चाभी खोज निकाली है. बताया जाता है कि यहाँ जिम कार्बेट भी अक्सर आते थे.उस घिरती हुई शाम मुझे क्या पता था कि किसी रात ,किसी भोर जिम कार्बेट मेरे सपने में चले आएंगे और उनके हाथ में बंदूक की जगह एक किताब होगी जिसका नाम होगा 'ट्री टॉप्स' .* यह जो बादलों को देखती हुई गोल - सी क्यारी दिख रही है न उसमें लगी हुई वनस्पति का नाम धनिया है . समझदार लोग इसे स्वाद कहेंगे; मुझ मूढ़मति को तो यह सौंदर्य लगा .

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