जनादेश

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राष्ट्रवाद की ऐसी रतौंधी में खबर कैसे लिखें !

संजय कुमार सिंह 

देश में राष्ट्रवाद का झंडा इतना बुलंद चल रहा है कि एक-दो नहीं 49 हस्तियों पर राजद्रोह का मामला दर्ज हो गया. इस तथ्य के बावजूद कि राजद्रोह के मामले में राज्य सरकार की अनुमति चाहिए होती है और इस अनुमति के बगैर जेएनयू और कन्हैया मामले में तीन साल बाद चार्जशीट दायर हुई तो भी कार्रवाई नहीं हो पाई. कानून की ये बारीकियां मैं नहीं जानता था जो अखबार पढ़ते हुए जाना. लेकिन जो अखबारों में नहीं छपता है और जो लोग अखबार नहीं पढ़ते हैं उनकी हालत अलग है. मुझे समझ नहीं आ रहा है कि जब कन्हैया के मामले में कुछ नहीं हो पा रहा है तो 49 हस्तियों के खिलाफ मामला कैसे दर्ज हो गया. 

क्या इससे संबंधित लोग कानून नहीं जानते थे? सही-सही कानून मैं भी नहीं जानता इसलिए हो सकता है, मामला दर्ज होने के बाद राज्य सरकार की अनुमति चाहिए होती होगी और अभी मामला इस स्थिति में नहीं पहुंचा होगा. लेकिन पत्रकारों, संपादकों, रिपोर्टर्स और खबर देने वालों को तो यह पता होना चाहिए कि राज्य सरकार की अनुमति के बगैर राजद्रोह के मामले में कुछ नहीं होगा. इसका मतलब यह भी हुआ कि इस मामले में जो हुआ था वह लगभग व्यर्थ था और खबर इतनी गंभीर नहीं थी. 

इस मामले में बिहार सरकार की अनुमति (अगर आवश्यक थी) बिहार पुलिस की जांच के बाद ही आनी थी और जांच हुई नहीं थी. इसलिए खबर के साथ यह बताया जाना चाहिए था  बिहार पुलिस और बिहार सरकार इस मामले में क्या कह रही है. चूंकि इसके बिना मामला टिकना ही नहीं था तो खबर थी ही नहीं. पर छपी तो किसी कारण से होगी. मान लेता हूं कि केंद्र और बिहार की भाजपा तथा भाजपा समर्थित सरकार को बदनाम करने के लिए मामला दर्ज कराया गया होगा. भले ही सरकारों पर इसका कोई असर नहीं पड़ा लेकिन पत्रकारों का काम था कि वे केंद्र और बिहार की सरकार से इसपर बात करते, पाठकों को बताते कि इस पर दोनों सरकारों का नजरिया क्या है? 

इससे यह भी पता चल जाता कि मामला दर्ज कराना साजिश है या किसी की प्रचार पाने की कोशिश. वैसे तो इस संबंध में इक्का-दुक्का आरोप छपे हैं पर किसी अखबार या रिपोर्टर ने इस मामले पर कोई रिसर्च किया हो ऐसा कुछ नहीं दिखा. कायदे से प्रधानमंत्री को घेरकर पूछा जाना चाहिए था कि, उन्हें पत्र लिखने वालों के खिलाफ ऐसा गंभीर मामला दर्ज हुआ है आपको क्या कहना है. आजकल प्रधानमंत्री पत्रकारों की पहुंच में लगते नहीं हैं. हो सकता है उन्हें घेरना संभव नहीं हो तो उनके कार्यालय से फोन करके या उनका ट्वीटर हैंडल चेक करके पाठकों को यह बताया जा सकता था कि प्रधानमंत्री ने इसपर कुछ कहा या किया अथवा नहीं. 

मुख्यमंत्री नीतिश कुमार भले आजकल पत्रकारों से नाराज चल रहे हों पर उन तक पहुंचना मुश्किल नहीं है. उनसे भी पूछा जाना चाहिए था कि यह मामला कैसे दर्ज हो गया और इस पर उनकी प्रतिक्रिया क्या है और आगे क्या-क्या हो सकता है. पर ऐसा भी कुछ छपा हो तो मुझे नहीं दिखा. मैं सिर्फ अपनी जानकारी बढ़ाने के लिए जानना चाहता था कि इस तरह मुकदमे दर्ज करवाकर लोगों को परेशान करने या डराने के मामले में सरकारी स्टैंड, खासकर डबल इंजन वाले राज्यों में क्या है?  लोकतंत्र में लोगों को सरकार का विरोध करने की अनुमति है, राजद्रोह का मुकदमा दर्ज कराने के लिए राज्य सरकार की अनुमति चाहिए तो बिना अनुमति मामला दर्ज ही क्यों हो? क्या इस स्थिति को ठीक किए जाने की जरूरत नहीं है? क्या ऐसी मांग करना मीडिया का काम नहीं है? 

फिलहाल, मुजफ्फरपुर डेटलाइन से पीटीआई की खबर है (नवभारत टाइम्स में) कि भीड़ की हिंसा (मॉब लिंचिंग) के खिलाफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखने पर जिन 49 हस्तियों के खिलाफ राजद्रोह का केस दर्ज हुआ था, उसे बिहार की मुजफ्फरपुर पुलिस ने वापस ले लिया है. एसएसपी मनोज कुमार सिन्हा ने ये केस बंद करने का आदेश दिया है. उन्होंने बताया कि जांच में इन हस्तियों के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला. आरोप छवि को नुकसान पहुंचाने वाले थे. एक वकील की याचिका पर कोर्ट के आदेश के बाद पुलिस ने फिल्मकार मणिरत्नम, अनुराग कश्यप, श्याम बेनेगल, इतिहासकार रामचंद्र गुहा जैसे 49 लोगों पर एफआईआर दर्ज की थी. 

इस खबर में आगे कहा गया है, इसने राजनीतिक विवाद का रूप भी ले लिया था. कई अन्य शख्सियतों ने इन हस्तियों का समर्थन किया तो बड़ी संख्या में विरोध में भी लोग आए थे. सरकार की ओर से सफाई दी गई थी कि यह केस कोर्ट के आदेश पर दर्ज हुआ है. क्या सरकार की यह सफाई गंभीर और विश्वास करने लायक है. क्या 49 हस्तियों को इस तरह परेशान करने की किसी व्यक्ति की कोशिश को अदालती सहमति मिलना जायज है? जब पूरी न्यायपालिका लोयालुहान हुई पड़ी है तो इस सहमति की समीक्षा की जरूरत नहीं है? अखबारों ने या तो इसे समझा ही नहीं या इसमें अपनी कोई भूमिका नहीं पाई. बिहार पुलिस ने 47 लोगों के खिलाफ जांच कर ली कन्हैया के खिलाफ जांच कब पूरी होगी?  

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