दर्शक बदल रहा है-मनोज बाजपेयी

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दर्शक बदल रहा है-मनोज बाजपेयी

हरि मृदुल

श्रेष्ठ अभिनय के लिए दो बार राष्ट्रीय पुरस्कार पा चुके मनोज बाजपेयी अब निर्माता बन गये है.  मनोज बाजपेयी की खासियत यही है कि वे व्यावसायिक और ऑफबीट फिल्मों के बीच संतुलन साधे हुए हैं. प्रस्तुत है उनसे बातचीत-

आप बड़ी व्यावसायिक फिल्मों का भी हिस्सा होते हैं और छोटे बजट की ऑफबीट फिल्में भी करते हैं. छोटे बजट की अच्छे कंटेंट वाली फिल्मों को अब भी काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. आपके अनुभव कैसे रहे?


यह सही है कि छोटी फिल्मों को अपनी जगह बनाने में अब भी मुश्किलें आती हैं. लेकिन अच्छी बात यह है कि हमारे दर्शक बदल रहे हैं. दर्शकों के एक वर्ग ने ऐसी फिल्में स्वीकार करनी शुरू कर दी हैं. आप मेरी हालिया रिलीज फिल्म 'सात उचक्के' को ही लीजिए, इस तरह की फिल्में पहले बनती नहीं थीं. जिस तरह की कहानी, किरदार और लिखावट इसमें मौजूद है, वे हमारे सिनेमा को आगे बढ़ाते हैं.

'सात उचक्के' की ही बात करें, तो इसमें आपके साथ विजय राज, केके मेनन, अनुपम खेर और अन्नू कपूर जैसे धाकड़ परफॉरमर मौजूद हैं. मंजे हुए कलाकारों का साथ किसी एक्टर के अभिनय में कितना असर डालता है?


बहुत ज्यादा असर डालता है. अच्छे कलाकारों के साथ काम करने का अलग ही आनंद होता है. ये सभी फिल्म के अलावा थिएटर के भी खुर्राट अदाकार हैं. ऐसे एक्टरों के साथ काम करते हुए जितना अच्छा लगता है, उतना ही अलर्ट भी रहना पड़ता है. अलर्ट नहीं रहेंगे, तो पोल खुलते देर नहीं लगेगी.


फिल्म इंडस्ट्री में शुरू से ही स्टार सिस्टम का बोलबाला रहा है. आप जैसे अभिनेताओं पर इसका कितना असर पड़ता है?


मैंने कभी इसका विश्लेषण नहीं किया है. मेरा कहना है कि सब कुछ दर्शक ही तय करते हैं. हम स्टार या स्टार सिस्टम को दोष नहीं दे सकते. आखिर दर्शक ही तो स्टार बनाते हैं. दर्शक कब बदलेगा, पता नहीं. दर्शक जिस तरह की फिल्मों के लिए जाता है, वे ही चलती हैं. हां, इस सबके बीच हमारी जद्दोजहद भी चलती रहती है. हम अपनी उपस्थिति लगातार दर्ज करवाने की कोशिश करते रहते हैं. इस काम में हम कभी सफल होते हैं और कभी असफल. लेकिन हम कोशिश करना बंद नहीं करेंगे. हम थकनेवाले लोग नहीं हैं.


आप एक किसान परिवार से आते हैं. आपके मन में कभी आया कि काश, बॉलीवुड में मेरा कोई गॉडफादर होता, तो मुकाम कुछ और होता?

मैं इस तरह नहीं सोचता हूं. मैं आत्मसम्मान वाला आदमी हूं. मैं लड़ाई कर सफल होने में यकीन रखता हूं. अभी तक जो कुछ भी मैंने पाया है, वह कठोर मेहनत से पाया है. मैं किसी किस्म के शॉर्टकट में यकीन नहीं करता हूं.

एक अभिनेता के तौर पर आपकी सफलता नये लोगों के लिए प्रेरक तत्व का काम करती है. लेकिन अब आपकी काम को लेकर क्या जद्दोजहद है?


मैं ज्यादा से ज्यादा अच्छे रोल करने के लिए लालायित हूं. जब मैंने अभिनय के क्षेत्र में एंट्री ली थी, तब लोग कहते थे कि पांच मेमोरेबल रोल हो जाएं, तो धन्य हो जाएं. हम लीजेंड मान लिए जाएंगे. लेकिन मेरी जिद तो तीस मेमोरेबल रोल की है.


अभी तक अभिनीत की हुई वे कौन सी फिल्में या किरदार हैं, जिन्हें आप मेमोरेबल मानते हैं?


मैं 'बैंडिट क्वीन', 'सत्या', 'शूल', 'कौन', 'जुबैदा', 'पिंजर', '1971', 'राजनीति', 'स्पेशल 26', 'अलीगढ', 'गैंग्स ऑफ वासेपुर', 'बुधिया' और 'सात उचक्के' जैसी फिल्मों में अपने किरदारों को महत्वपूर्ण मानता हूं. इन फिल्मों में मेरा अभिनय भी रुटीन नहीं है.

आप बड़े बैनर और स्मॉल बैनर की फिल्मों में किस तरह का अंतर देखते हैं?

बड़े बैनर की ज्यादातर फिल्में बिकाऊ स्टार के साथ बनती हैं. ऐसी फिल्मों में तामझाम बड़ा होता है. जब ऐसी फिल्मों की शूटिंग हो रही होती है, तो डेढ़ सौ लोग सेट पर होते हैं. कलाकारों के लिए कम से कम दस वैनिटी वैन खड़ी होती हैं. तीन जेनरेटर रहते हैं. दस स्पॉटबॉय होते हैं. छोटी फिल्मों की शूटिंग में तीन से ज्यादा स्पॉटबॉय नहीं होते हैं. एक वैनिटी वैन होती है, जो सभी कलाकारों की साझी होती है. कई बार तो कोई वैन नहीं होती है. एक कमरा किराये पर ले लेते हैं और उसे कपड़े बदलने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन गौर करनेवाली बात यह है कि कैमरा दोनों जगह एक जैसा होता है.


अरसा हो गया है आपको बॉलीवुड में काम करते हुए. आप क्या बदलाव पाते हैं?


बॉलीवुड का सोच बदल रहा है. तकनीकी तौर पर भी हम समृद्ध हुए हैं. जब मैं इंडस्ट्री से जुड़ा था, तो निराश हो गया था. मैं सोचता था कि कुछ फिल्मों में छोटे-मोटे रोल करके निकल जाऊंगा. मेरे जैसे कलाकारों के लिए ज्यादा स्कोप नहीं है. लेकिन 'सत्या' जैसी फिल्म ने बहुत बड़ा उलटफेर कर दिया. इस फिल्म के बाद दसियों अच्छे निर्देशक सामने आये. अब तो लोग ऐसी कहानियां कह रहे हैं, जो दर्शकों ने पहले देखी नहीं हैं. यह जरूर है कि दर्शकों का एक बड़ा वर्ग अभी तक नहीं बदला है. वह तीन सौ रुपये का टिकट खरीदकर उन्हीं फिल्मों को देखने जाता है, जो बेहूदी होती हैं. बाद में फिर गाली देता है. हम कहते हैं कि तीन सौ रुपये खर्च करने की जरूरत नहीं. सौ रुपये में हम पहले से गारंटी दे रहे हैं कि अमुक फिल्म देख लो. उसे हम पर विश्वास नहीं होता है. लेकिन दर्शकों का एक छोटा समूह बदला है. तभी हम चल रहे हैं. तभी ये नयी कहानियों वाली फिल्में बन पा रही हैं.

इधर आपने कई शॉर्ट फिल्में की हैं. इंटरनेट पर रिलीज होनेवाली 10-15 मिनट की इन छोटी फिल्मों के भविष्य के बारे में क्या सोचते हैं?

डिजिटल का ही भविष्य है. मुझे लगता है कि कुछ समय के बाद सारे थिएटर हॉल में संकट आनेवाला है. हॉल में लोग सिर्फ थ्री डी फिल्में ही देखने जायेंगे. पश्चिमी देशों में इस किस्म की शुरूआत हो चुकी है. एंटरटेनमेंट का बाजार तेजी से बदलने जा रहा है. मोबाइल पर ही लोग तमाम सिरीज, फिल्में और शॉर्ट फिल्में देखेंगे.

आप दिल्ली के अपने फाकामस्ती के दिनों को कितना याद करते हैं?मैं दिल्ली के थिएटर के दिन बहुत मिस करता हूं. दिल्ली के कल्चरल एक्सचेंज के प्रोग्राम काफी महत्वपूर्ण होते थे. फोक और क्लासिकल म्यूजिक के कार्यक्रम आज भी होते हैं. अभी दिल्ली में काफी कुछ बचा है. मंडी हाउस एरिया में अब भी गहमागहमी रहती है. हर शहर बदला है, तो दिल्ली भी बदला है.फोटो साभार 

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