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हजरतगंज का यूनिवर्सल !

अभयानंद कृष्ण

इन्हें अपना काम व्यवसाय कम इबादत अधिक लगता है. यही वजह है कि तीसरी पीढ़ी भी उसी शिद्दत के साथ किताबों की दुनिया में अपना सर्वोत्तम दे रही है, जिसे लेकर लाहौर के दियरा गाजी खां से गोविंद  राम कभी लखनऊ आये थे. लखनऊ की तमाम पहचान को मुकम्मल नहीं कह सकते अगर बात यूनिवर्सल बुक सेलर्स की न की जाये. मौजूदा दौर में चंदर प्रकाश और उनके पुत्र गौरव प्रकाश ज्ञान के इस अभिनव यात्रा के अगुआ हैं और सहयात्री के रूप में हैं विशुन प्रकाश और मानव प्रकाश.

वजह चाहे जो भी रही हो बंटवारे के करीब बीस साल पहले ही लाहौर के पास के दियरा गाजी खां का यह एक कुनबा सैकड़ों मीलों की दूरी तय करके लखनऊ आ पहुंचा. वक्त ने बाद में  यह साबित किया कि उनका यहां आना दरअसल, इस शहर का ओहदा बढ़ाने के लिये था. गोविन्द राम ने लखनऊ में खुद किताबों का कारोबार शुरू किया और अपने गांव जिसे वहां पिंड बोलते हैं, के लोगों को बुलाकर इसके प्रति तैयार किया. फिर देश के तमाम हिस्सों में वजूद में आया यूनिवर्सल बुक सेलर्स.


जबान में उर्दू लेकर आये गोविन्द राम का इस शहर ने भी बांह फैलाकर इस्तकबाल किया. तहजीब और अदब के लिये मशहूर शहर ने उन्हें अंदाज साहब का नया नाम दिया. फिर ज्ञान की जो सेवा गोविन्द राम ने शुरू की उसका अंदाज शहर को फिदा कर गया. शहर के प्रमुख हजरतगंज  में साहू सिनेमा के बगल में गोविन्द राम की यूनिवर्सल बुक सेलर्स अपने नाम के मुताबिक होती गयी. बाद में काफी हाउस के करीब हुयी यह दुकान वक्त के साथ पढ़ने लिखने वालों के दिल के भी करीब जगह बनाने में कामयाब हुयी. काफी हाउस तब साहित्यकारों, नाटककारों और बुद्धिजीवियों का अड्डा हुआ करता था. बगल में किताबों की आबाद दुनिया उनके लिये खूब मुफीद हुयी. अभी दुकान पर बैठने वाले चंदर प्रकाश ऐसे नहीं कहते कि व्यवसाय के तमाम तरीके हैं, लेकिन यहां एक अलग संसार बसता है. इस कथन को समझने के लिये करीब पचास साल पीछे के एक रोमांचक वाकया से गुजरना होगा. सन उन्नीस सौ सत्तर का कोई एक दिन था जब रोज की तरह चंदर  दुकान पर बैठे थे. तीन चार लोग वहां दाखिल हुये जिसमें एक के कद ने चंदर का ध्यान अपनी ओर खींचा. अपनी जगह से उठकर वह उनके पास गये तो वह लंबे कद वाले सज्जन सत्यजीत राय निकले. चंदर  ने पूछना जरूरी समझा- मे आई हेल्प यू सर? छूटते ही जवाब मिला- ह्वाट हेल्प, इट इज माय शाप. दरअसल, सत्यजीत राय बचपन में अपने एक अंकल के यहां लखनऊ आने पर इस दुकान में भी आते थे और गोविन्द राम उन्हें स्टूल देकर हाथ में एक कोई किताब थमा देते थे. समझा जा सकता है कि यहां रिश्ता सिर्फ खरीददार और विक्रेता का नहीं होता. बाद के दिनों में सत्यजीत राय के बेटे भी यहां पहुंचते रहे. पहुंचते तो तबके लगभग सभी साहित्यकार थे तो पहुंचते अब भी हैं और रिश्ते की गांठ मजबूत होती जाती है.


पीढ़ियों की गढ़ी रवायतें उतनी ही संजीदगी के साथ मु्स्कुरा रही हैं. इसे चंदर प्रकाश के नेतृत्व में संचालित हजरतगंज वाली दुकान में भी देख सकते हैं और गोमती नगर में गौरव प्रकाश जहां बैठते हैं उस दुकान में भी महसूस कर सकते हैं. गौरव ने सन दो हजार आठ में गोमती नगर की इस दुकान की शुरुआत की.  पाठकों की यह सोच कि दुकान में खरीदने जाना होता है, यहां जाकर बदल जाएगी. दुकान के भीतर गौरव ने बैठकर पढ़ने की पूरी व्यवस्था कर रखी है. किताबें खरीदने के अलावा वहां किताबें पढ़ी जाती हैं, किसी खास पन्ने का सिर्फ फोटो ही नहीं खींचा जा सकता बल्कि किसी भी कर्मचारी से कहकर दुकान में लगी फोटो कापी करने वाली मशीन से कापी भी करायी जा सकती है. गौरव बताते हैं कि हमारा दायित्व सिर्फ खरीद-बेच भर नहीं है, हमें ज्ञान के इस स्रोत के साथ संजीदा सलूक भी करना है. अपनी बात को और स्पष्ट करते हुये कहते हैं कि किताब का कोई तलबगार दुकान में पहुंचा, किताब उठायी और कर्मचारी पहुंचकर उससे दरियाफ्त करने लगे तो उसे खलल महसूस होती है. क्योंकि हमें पढ़ने लिखने की रवायत को समृद्ध करना है, हमें और संजीदगी से सोचना होता है.


इस सोच की झलक इन दोनों दुकानों में बार-बार दिखती है. नये लेखकों की किताबों का विमोचन जैसा प्रयास हो या फिर इस दुनिया की बेहतरी की कोई और कोशिश. हजरतगंज की दुकान में पच्चीस सालों से काम कर रहे रमेश वाजपेयी भी तस्दीक करते हैं कि सुबह दुकान खुलने के साथ ही हम पढ़ने वालों की प्रतीक्षा करने लगते हैं. दुकान बंद होने तक पाठकों का आना और बैठकर पढ़ना हम सभी को बहुत भला लगता है. पाठकों की संख्या में कमी के बावत चन्दर के भाई और दुकान में एक बड़ी जिम्मेदारी संभालने वाले विशुन प्रकाश कहते हैं कि पाठक कम नहीं हुये हैं, हां बिखरे जरूर हैं. लेकिन किताब के सफे पलटने की अनोखी अनुभूति होती है. बात को आगे बढ़ाते हैं चंदर और याद करने लगते हैं पुराने दिन जब उनके पिता जी उन्हें पन्द्रह से सोलह साल की उम्र में किताबें पोछने के काम में जुटा देते थे. शायद रिश्ते की गर्माहट के लिये वह जरूरी था. पीढ़ियां ऐसे ही नहीं जुड़ती गयीं. चंदर दूसरा काम देखने लगते हैं जब मानव प्रकाश काउंटर संभालते हैं. इतनी मोहब्बत के बीच गुजरते साल तीन पीढ़ियों के गवाह हैं. माजी ने मुस्तकबिल को राह दिखाना शुरू कर दिया है. गौरव मुस्कराते हुये कहते हैं कि बहुत दिन नहीं जब चौथी पीढ़ी भी आपको इस यात्रा की हम कदम बनती दिख जाये.


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