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पूरे देश का बेटा है अभिजीत -निर्मला बनर्जी

रीता तिवारी

कोलकाता .प्रोफेसर अमर्त्य सेन के बाद अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार जीतने वाले दूसरे भारतीय अभिजीत विनायक बनर्जी पहले फिजिक्स यानी भौतिक विज्ञान की पढ़ाई करना चाहते थे. लेकिन प्रयोगशाला में छोटे-छोटे प्रयोग पसंद नहीं आए तो उसने सांख्यिकी पढ़ने का फैसला किया. इसके लिए उसने बाकायदा एक कालेज में दाखिला भी ले लिया. लेकिन घर से कालेज की दूरी ज्यादा होने की वजह से बाद में उस छात्र अभिजीत ने प्रेसीडेंसी कालेज में अर्थशास्त्र की पढ़ाई करने का फैसला किया. उसके बाद उसने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. अभिजीत की मां बताती हैं, “सांख्यिकी कालेज घर से दूर होने की वजह अभिजीत को दूसरी गतिविधियों के लिए समय ही नहीं मिल पाता था. लिहाजा उसने प्रेसीडेंसी कालेज में दाखिला लेने का फैसला किया.” निर्मला कहती हैं, “अभिजीत सिर्फ मेरा ही नहीं, पूरे देश का बेटा है. उस पर पूरे देश को गर्व है.” 

घर का माहौल तो अर्थशास्त्रमय था ही. पिता दीपक बनर्जी प्रेसीडेंसी कालेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर थे, जो बाद में विभागाध्यक्ष बने. मां निर्मला बनर्जी भी एक कालेज में अर्थशास्त्र पढ़ाती थीं. तो क्या माता-पिता के कहने या दबाव पर ही अभिजीत ने अर्थशास्त्र की राह चुनी. इस सवाल पर निर्मला बताती हैं, हमने अभिजीत पर कभी अपनी इच्छा नहीं थोपी. उसे अपने पसंदीदा विषय की पढ़ाई का अधिकार था. उसने वही किया जो उसे उचित लगा.

उनकी मां बताती हैं कि अर्थशास्त्र के गूढ़ सिद्धांतों को भी सरल भाषा में समझाना और बताना ही उसकी खासियत है. उन्होंने बताया कि अभिजीत ने काफी बेमन से वर्ष 2017 में अमेरिका की नागरिकता ली थी. लेकिन दिल से वह पूरी तरह भारतीय है. अभिजीत विनायक बनर्जी को बचपन से ही गरीबी परेशान करती थी. कोलकाता के मशहूर साउथ प्वायंट स्कूल में पढ़ाई के दौरान वे अपने घर के पास बने बस्ती के बच्चों के साथ ही खेलते थे. गरीबी के चलते बस्ती के बच्चे स्कूल नहीं जाते थे. उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति बचपन से ही अबिजीत के मन में कई सवालों को जन्म देती थी और वे अपने अर्थशास्त्री पिता डा. दीपक बनर्जी और अर्थशास्त्री मां डा. निर्मला बनर्जी से इस बारे में लगातार सवाल पूछते रहते थे.


प्रेसीडेंसी कालेज में अभिजीत के शिक्षक रहे शैवाल कर बताते हैं कि अभिजीत अपनी कक्षा में काफी दिलचस्पी लेते थे. अर्शाशास्त्र की उनकी समझ बाकी छात्रों से बेहतर थी. कोई सवाल समझ में नहीं आने पर वह बार-बार पूछते थे.

जाने-माने अर्थशास्त्री अजिताभ राय चौधरी अभिजीत के पिता दीपक बनर्जी के मित्र थे. वह बताते हैं, “अभिजीत मेरे सामने ही बड़ा हुआ. वह शुरू से ही गरीबी और समाज में कायम असामनता को लेकर सोचता रहता था. उसकी इस सोच ने ही आज उसे इस मुकाम तक पहुंचाया है.” अजिताभ कहते हैं कि अभिजीत ने गरीबी दूर करने की दिशा में अपने शोध औऱ सर्वेक्षणों के जरिए आम लोगों, समाज और अर्थशास्त्रियों पर एक गहरी छाप छोड़ी है. वर्ष 1981 में प्रेसीडेंसी कालेज से ग्रेजुएशन के बाद 1983 उन्होंने दिल्ली के जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से एमए किया और 1983 में डाक्टरेट के लिए अमेरिका चले गए.फोटो-शकील अब्दीन

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