जनादेश

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गोंडा जंक्शन !

स्टेशनों के बारे में कोई नहीं लिखता .आम लोगों का कितना समय रेलवे स्टेशन पर गुजरता है याद करके देखें .बहुत से लोगों को तो ये स्टेशन ही शरण देते हैं जब कहीं जगह न मिले .हर लंबे सफ़र की शुरुआत रेलवे स्टेशन से ही होती रही है .खासकर दो तीन दशक पहले तक जब सड़क या जहाज का इस्तेमाल बहुत कम लोग करते थे .इन स्टेशनों के व्यंजन भी मशहूर होते थे जैसे संडीला का लड्डू या बाराबंकी का समोसा .दूर पढने वाले छात्र हों या नौकरी करने वाले रेल से भी रोज सफ़र करते  रहे हैं .ऐसा ही एक रेलवे स्टेशन है गोंडा जंक्शन .चार पांच दशक में कितना बदल गया है .एक दौर था जब मीटर गेज की पटरी वाले इस स्टेशन पर गुवाहाटी से लखनऊ तक जाने वाली अवध तिरहुत मेल जब प्लेटफार्म पर आती तो भाप के इंजन की भाप से प्लेटफार्म का एक हिस्सा धुंध से घिर जाता .यह नीले डब्बे की पूरी ट्रेन होती थी .लंबी दूरी की इस ट्रेन में बैठने वालों की भी भीड़ कम नहीं थी .

एपी मिश्र 

दीपावली का आज दूसरा दिन है और कल ही गांव आ गया था . सोचा कि ६०-६२ साल पहले की स्मृतियों को सजीव किया जाय तो ड्राइवर को कहा गाड़ी निकालो और गोंडा रेलवे स्टेशन पहुंच गया .सुरेंद्र मिश्रा को फ़ोन कर दिया था तो ३० रुपये  में तीन टिकट लेकर उनका आदमी पहले से ही स्टेशन के बाहर मिल गया .यही तीन टिकट अगर बचपन में लिया होता तो डेढ़ रुपया लगता .बचपन में जब गोंडा रेलवे स्टेशन से गांव  के लिए चलता तो स्टेशन के उत्तर पूर्व किनारे बहराइच के लिए गाड़ी मिलती थी .अब ये लोकेशन उसी दिशा में और दूर हो गया है .बचपन में जब उस प्लेटफार्म पर पहुंचता  तो तो एक बड़े से साइनबोर्ड  पर लिखा दिखाई देता था -यहां  गाड़ी की मुफ़्त सफ़ाई होती है .

इसका मतलब ना तब समझ पाया था ना अब .जब सब व्यवस्था सरकारी है तो मुफ़्त सफ़ाई का क्या मतलब .आज जब ६०-६२ साल बाद गोंडा रेलवे स्टेशन देखता हूं तो बड़ा बदलाव नजर आता है . अब वहाँ सीढ़ी ही नहीं एस्कलेटर भी है और लिफ़्ट भी . सुखद आश्चर्य हुआ जब एक अधेड़ ग्रामीण और उसकी पत्नी एस्कलेटर से प्लेटफार्म  पर आते दिखे .जिस मेमु ट्रेन के आकर्षण में आया था आज उसकी जगह पर सामान्य डिब्बों वाली गाड़ी दिखी .आगे के डिब्बों में भीड़ तो नहीं थी लेकिन खिड़की वाली सीट भरी थी तो आकर सबसे पीछे डिब्बे में बैठ गया .घड़ी की सुई ने १२ बजाए और ट्रेन स्टार्ट . ग़ज़ब ।जब कि अभी कल ही गोरखपुर लखनऊ से डेढ़ घंटे देर से चली थी .रास्ते में तीन लैंड्मार्क थे जिन्हें ट्रेन से देखना चाहता था ।एक नाले पर बना घघौवा पुल जिसे बचपन में ट्रेन के क्रॉस करते समय हमेशा डरता था कि ट्रेन कहीं ऐसा ना हो कि इसी में गिर जाय .

दूसरा मेरे मौसी का गांव  हरीलालपुरवा जहां ६ से ९ दर्जे में क़स्बायी स्कूल कौड़िया में पढ़ते समय जितना अपने घर नहीं जाता था उससे अधिक मौसी के घर पहुँच जाता था और तीसरा लैंड मार्क मेरे मामा का गांव  था कालूपुरवा.

रास्ते में गांव का रेलवे स्टेशन बनगाईं भी एक बड़े आकर्षण का केंद्र था .गांव गांव फ़ोन हो जाने का फ़ायदा ये हुआ कि मौसी और मामा के गांव के तमाम लोगों को बता दिया कि अमुक ट्रेन से आ रहा हूँ तो मेरे कई ममेरे और मौसेरे भाई मुझे अपने गाँव के सामने हाथ हिलाते दिखे .गोण्डा से अगला स्टेशन तब बनगाईं हुआ करता था अब एक नया स्टेशन गंगाधाम और बन गया है .

बनगाईं स्टेशन पर चार पेड़ पाकड के लगे थे जो इन ६०-६२ सालों में और विशाल हो गए हैं .ये पेड़ १०० साल से भी पुराने हैं .बनगाईं रेलवे  स्टेशन पर अब एक के बजाय दो प्लेटफार्म बन गए हैं और ओवरब्रिज  भी बन गया है .ट्रेन पर बैठे बैठे ७-८ किलोमीटर पर बचपन की उन पगडंडियों को खोजता रहा जिन पर ४ साल सुबह शाम चला था ना जाने कहाँ खो गईं . पूछने पर सह यात्रियों ने बताया कि अब लोग पैदल नहीं चलते यहाँ तक की साइकल ही नहीं बल्कि  मोटर साइकल से चलते है .मेरे सहयात्री के रूप में मेरा भतीजा निखिल और मेरे चाचा राम कैलाश मिश्र थे जो मेरे उत्साह को निरन्तर बढ़ाते रहे .बनगाईं से अगला स्टेशन विशसेश्वरगंज था और अंत में पयागपुर आकर अपनी इस यात्रा को समाप्त करता हूं . पूरी यात्रा में मैंने जो कुछ देखा और महशूश किया उससे वर्षों पूर्व धर्मयुग में डॉक्टर विवेकी राय का एक लेख-गांव चला शहरों की ओर 'निरन्तर महसूस होता रहा .लेखक उतर प्रदेश पावर कारपोरेशन के पूर्व एमडी हैं 

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