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झारखंड चुनाव में बिखर रही हैं गंठबंधन की गांठें

ओमप्रकाश अश्क

रांची .झारखंड में गठबंधन की गांठें इतनी ढीली पड़ गयी हैं कि कब गांठ खुल कर बिखर जाये, कहा नहीं जा सकता. हालांकि अगले तीन दिन गठबंधनों के लिए अधिक महत्वपूर्ण हैं. पांच चरणों में होने वाले विधानसभा चुनाव के पहले चरण के नामांकन की प्रक्रिया 6 नवंबर से शुरू हो चुकी है. 12 नवंबर नामांकन का आखिरी दिन है और 30 नवंबर को पहले चरण का मतदान होना है. झारखंड में दो गठबंधन फिलवक्त दिख रहे हैं. पहला- भाजपा और आजसू पार्टी को मिला कर बना एनडीए और दूसरा जेएमएम, कांग्रेस और आरजेडी को मिला कर बना महागठबंधन. महागठबंधन में पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की पार्टी झारखंड विकास मोरचा और वाम दलों को भी शामिल होना था, लेकिन बाबूलाल मरांडी ने पहले ही अपने को उपेक्षित मानते हुए अपनी पार्टी के अकेले चुनाव मैदान में जाने की घोषमा कर दी है. वाम दल भी अपने उम्मीदवार अलग-अलग उतारेंगे, यह भी तय है. रही बात भाजपानीत एनडीए की तो उसमें भी कम पेंच नजर नहीं आते.

भाजपा चुनाव समिति की दो दिनों की मैराथन मीटिंग का नतीजा यह निकला है कि पार्टी ने सभी 81 सीटों पर अपने उम्मीदवारों के नाम तय किये हैं. उसने अपने सहयोगी आजसू के लिए कोई स्पेस नहीं छोड़ा है. आजसू 26 सीटों की मांग कर रही है, जबकि पिछले चुनाव में भाजपा ने उसे 6 सीटें दी थीं और 5 पर आजसू को विजय मिली थी. कुछ दिन पहले ही झारखंड भाजपा के अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुवा ने साफ कर दिया था कि आजसू को पिछले पैटर्न पर ही सीटें मिलेंगी. इस पर आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो बिदक गये और यहां तक कह दिया कि गिलुवा तो पिछली बार अध्यक्ष थे ही नहीं, इसलिए उनकी बात को वे कोई तवज्जो नहीं देते. आजसू और भाजपा के बीच पेंच सिर्फ सीटों की संख्या को लेकर ही नहीं फंसा है, बल्कि तीन ऐसी सीटें हैं, जिन पर आजसू दावा कर रही है और भाजपा उसे छोड़ने के लिए तैयार नहीं है. 

भाजपा के गले की हड्डी साबित हो रहे हैं विपक्षी दलों को छोड़ कर भगवाधारी बने वे पांच विधायक, जिन्हें उनकी सीटों पर खपाना पार्टी की मजबूरी है. इसमें एक सीट है लोहरदगा में सुखदेव भगत की. सुखदेव कांग्रेस छोड़ कर आये हैं और वे कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं. आजसू उसी सीट पर दावा कर रही है. जाहिर है कि भाजपा के लिए यह सीट छोड़ना आसान नहीं. दूसरी सीट है बोकारो जिले में पड़ने वाली चंदनक्यारी. यहां से पिछली बार भाजपा का उम्मीदवार जीता था और मंत्री भी है. उस सीट के लिए आजसू प्रबल दावेदार बन कर खड़ी है. तीसरी विवादी सीट है हजारीबाग, जहां से आजसू के उम्मीदवार जीत कर रघुवर दास की सरकार में मंत्री बने, लेकिन लोकसभा चुनाव में उन्होंने किस्मत आजमायी और सांसद बन गये. आजसू का दावा है कि वह उसकी सीट है, इसलिए किसी भी हाल में उसे ही मिलनी चाहिए. भाजपा ने उस पर दावा ठोंका है और चर्चा है कि रघुवर दास अपने लिए उस सीट को रखना चाहते हैं. यानी आजसू के साथ भाजपा के पेंच दो मोरचों पर फंसे हैं. अव्वल तो सीटों की संख्या और दूसरा, मनचाही सीटों पर दावेदारी. इस पेंच को सुलझा पाना थोड़ा मुश्किल है.

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